{"_id":"5762c917a3ffc87b7eafa05493373140","slug":"neither-staff-nor-resources-to-fight-malaria-hindi-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"न स्टाफ, न संसाधन कैसे लड़ें मलेरिया से ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
न स्टाफ, न संसाधन कैसे लड़ें मलेरिया से
लखीमपुर खीरी।
Updated Mon, 21 Sep 2015 05:07 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जेई, एईएस, बुखार और मलेरिया से जिला तप रहा है। बीमारियों पर नियंत्रण पाने के लिए स्वास्थ्य विभाग जुटा हुआ है, लेकिन स्टाफ और संसाधनों की कमी इस लड़ाई पर भारी पड़ रही है। हालत यह है कि जिले के अस्पतालों में न तो पर्याप्त डॉक्टर हैं और न ही रोकथाम के पूरे संसाधन। मलेरिया विभाग भी संसाधनों की कमी से बुरी तरह जूझ रहा है। ऐसे में बीमारियों की रोकथाम मलेरिया विभाग के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है।
जिले का अधिकतर हिस्सा बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में आता है। इसके अलावा शहरी क्षेत्रों में गंदे पानी के निकास की भी समुचित व्यवस्था नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां जगह-जगह गंदे पानी का भराव है वहीं शहरी क्षेत्रों के बाहरी मोहल्लों में खाली प्लाट गंदे पानी के भराव से तालाब का रूप ले चुके हैं। गंदे पानी का भराव मच्छरों के पनपने का सबसे अच्छा माध्यम हैं। जिले में एईएस, जेई और से 11 ब्लाक और 40 गांव प्रभावित हैं। इस दौरान मलेरिया विभाग की जांच में लगभग 125 लोगों में मलेरिया की पुष्टि भी हुई है। ऐसा इसीलिए है, क्योंकि जिले में दवा का छिड़काव ठीक से नहीं हो पाता। कारण यह है कि मलेरिया विभाग के पास स्टाफ की बहुत कमी है। मलेरिया विभाग के संसाधनों पर नजर डालें तो सहायक मलेरिया अधिकारी एक ही है। बॉयोलोजिस्ट का एक पद स्वीकृत है जो खाली है। फाइलेरिया निरीक्षक तीन होने चाहिए जोकि एक भी नहीं है। मैकेनिक का भी एक पद है लेकिन वह भी रिक्त है। जिन 40 गांवों में बीमारियों से पीड़ित लोग मिले हैं, वहां भी दवा का छिड़काव कराने में मलेरिया विभाग के पसीने छूट रहे हैं।
--
बजट का भी है अभाव
मलेरिया विभाग को जिन 40 गांवों में बीमारियों से पीड़ित लोग मिले हैं। इसमें फॉगिंग होनी चाहिए, इनमें फॉगिंग कराने के लिए लगभग 47,520 हजार रुपये चाहिए लेकिन विभाग के पास 30,000 का ही बजट उपलब्ध है। ऐसे में प्रभावित गांवों में फॉगिंग कराना भी विभाग के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है।
विज्ञापन
--
सीमित संसाधनों के बावजूद छिड़काव और फॉगिंग कराई जा रही है। अभी तक 25,364 रक्त पट्टिकाएं बनाई गई हैं। जिन लोगों में मलेरिया के लक्षण मिलें हैं उन्हें दवाएं वितरित कराई गई हैं। सभी पीड़ित गांवों में टीमें भेजकर छिड़काव कराया जा रहा है।
-एसके वर्मा, जिला मलेरिया अधिकारी।
विज्ञापन
जिले का अधिकतर हिस्सा बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में आता है। इसके अलावा शहरी क्षेत्रों में गंदे पानी के निकास की भी समुचित व्यवस्था नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां जगह-जगह गंदे पानी का भराव है वहीं शहरी क्षेत्रों के बाहरी मोहल्लों में खाली प्लाट गंदे पानी के भराव से तालाब का रूप ले चुके हैं। गंदे पानी का भराव मच्छरों के पनपने का सबसे अच्छा माध्यम हैं। जिले में एईएस, जेई और से 11 ब्लाक और 40 गांव प्रभावित हैं। इस दौरान मलेरिया विभाग की जांच में लगभग 125 लोगों में मलेरिया की पुष्टि भी हुई है। ऐसा इसीलिए है, क्योंकि जिले में दवा का छिड़काव ठीक से नहीं हो पाता। कारण यह है कि मलेरिया विभाग के पास स्टाफ की बहुत कमी है। मलेरिया विभाग के संसाधनों पर नजर डालें तो सहायक मलेरिया अधिकारी एक ही है। बॉयोलोजिस्ट का एक पद स्वीकृत है जो खाली है। फाइलेरिया निरीक्षक तीन होने चाहिए जोकि एक भी नहीं है। मैकेनिक का भी एक पद है लेकिन वह भी रिक्त है। जिन 40 गांवों में बीमारियों से पीड़ित लोग मिले हैं, वहां भी दवा का छिड़काव कराने में मलेरिया विभाग के पसीने छूट रहे हैं।
विज्ञापन
--
बजट का भी है अभाव
मलेरिया विभाग को जिन 40 गांवों में बीमारियों से पीड़ित लोग मिले हैं। इसमें फॉगिंग होनी चाहिए, इनमें फॉगिंग कराने के लिए लगभग 47,520 हजार रुपये चाहिए लेकिन विभाग के पास 30,000 का ही बजट उपलब्ध है। ऐसे में प्रभावित गांवों में फॉगिंग कराना भी विभाग के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है।
विज्ञापन
--
सीमित संसाधनों के बावजूद छिड़काव और फॉगिंग कराई जा रही है। अभी तक 25,364 रक्त पट्टिकाएं बनाई गई हैं। जिन लोगों में मलेरिया के लक्षण मिलें हैं उन्हें दवाएं वितरित कराई गई हैं। सभी पीड़ित गांवों में टीमें भेजकर छिड़काव कराया जा रहा है।
-एसके वर्मा, जिला मलेरिया अधिकारी।