{"_id":"5d7fcc4e8ebc3e01830a0e17","slug":"jungal-lakhimpur-news-bly3764597105","type":"story","status":"publish","title_hn":"आर्गेनोफॉस्फेट से मर रहे मोर और दूसरे पक्षी भी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
आर्गेनोफॉस्फेट से मर रहे मोर और दूसरे पक्षी भी
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बांकेगंज। ‘आर्गेनोफॉस्फेट’ जहर से बाघिन की मौत से साबित हो गया है कि वन्यजीव सुरक्षित नहीं हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि दस जुलाई को गोला रेंज में बिझौली गांव के पास बड़ी नहर के पानी में उतराती मिली बाघिन को शिकारियों ने योजनाबद्ध तरीके से मारा। अब पता चल रहा है कि शिकारी इसी जहर (कीटनाशक) के जरिए राष्ट्रीय पक्षी मोर व अन्य पक्षियों का भी शिकार आए दिन करते हैं। एक दिन पहले रविवार को बफरजोन की भीरा रेंज में जंगल गश्त कर रही वन कर्मियों की टीम ने मोर का शिकार कर ले जा रहे एक शिकारी को गिरफ्तार भी किया था, जबकि उसका साथी भाग गया था। इसी वजह से बागों में अब पक्षियों की आवाजें पहले जैसे नहीं सुनाई देतीं। वन विभाग पक्षियों की सुरक्षा भी नहीं कर पा रहा है। दुधवा टाइगर रिजर्व के दुधवा नेशनल पार्क, बफरजोन के अलावा कतर्निया घाट डिवीजन में वन्यजीव सुरक्षित नहीं हैं।
जंगल से सटे इलाके में शिकारी मोर पंख और मांस खाने के लिए मोरों का शिकार करते हैं। इसके अलावा जंगल से सटे खेतों में कीटनाशक दवाओं के प्रभाव से भी मोरों की मौत हो रही है। यह स्थिति चिंताजनक है। चार दिसंबर 2016 को बफरजोन की मैलानी रेंज के सुआबोझ वन ब्लॉक के जमुनिया ताल के उत्तर-पश्चिम जंगल के किनारे राष्ट्रीय पक्षी मोर के 14 शव मिले थे। तब वन विभाग ने बगैर पोस्टमार्टम कराए दफना दिया था। हालांकि पशु चिकित्सकों और पक्षी विशेषज्ञों ने इन मोरों की मौत कीटनाशक दवाओं से होना बताया था। इस मामले में वन विभाग लगातार लीपापोती करता रहा। मगर अब बाघिन का मामला सामने आने के बाद माना जा रहा है कि उन मोरों को भी शिकारियों ने ‘आर्गेनोफॉस्फेट’ कीटनाशक देकर मारा।
वन्यजीवों की सुरक्षा के प्रति विभाग गंभीर है। मोर का शिकार वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत जघन्य अपराध है। वन विभाग लगातार इस पर काम कर रहा है। - दिलीप श्रीवास्तव, उपप्रभागीय वनाधिकारी, दुधवा टाइगर रिजर्व बफरजोन।
विज्ञापन
विज्ञापन
जंगल से सटे इलाके में शिकारी मोर पंख और मांस खाने के लिए मोरों का शिकार करते हैं। इसके अलावा जंगल से सटे खेतों में कीटनाशक दवाओं के प्रभाव से भी मोरों की मौत हो रही है। यह स्थिति चिंताजनक है। चार दिसंबर 2016 को बफरजोन की मैलानी रेंज के सुआबोझ वन ब्लॉक के जमुनिया ताल के उत्तर-पश्चिम जंगल के किनारे राष्ट्रीय पक्षी मोर के 14 शव मिले थे। तब वन विभाग ने बगैर पोस्टमार्टम कराए दफना दिया था। हालांकि पशु चिकित्सकों और पक्षी विशेषज्ञों ने इन मोरों की मौत कीटनाशक दवाओं से होना बताया था। इस मामले में वन विभाग लगातार लीपापोती करता रहा। मगर अब बाघिन का मामला सामने आने के बाद माना जा रहा है कि उन मोरों को भी शिकारियों ने ‘आर्गेनोफॉस्फेट’ कीटनाशक देकर मारा।
विज्ञापन
वन्यजीवों की सुरक्षा के प्रति विभाग गंभीर है। मोर का शिकार वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत जघन्य अपराध है। वन विभाग लगातार इस पर काम कर रहा है। - दिलीप श्रीवास्तव, उपप्रभागीय वनाधिकारी, दुधवा टाइगर रिजर्व बफरजोन।
विज्ञापन