{"_id":"57a0e3034f1c1b5a7b2ba03a","slug":"is-on-the-verge-of-disappearing-existence-of-mirth-purav","type":"story","status":"publish","title_hn":" मिटने की कगार पर है हुलासपुरवा का वजूद ","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मिटने की कगार पर है हुलासपुरवा का वजूद
अमर उजाला ब्यूरो ईसानगर।
Updated Tue, 02 Aug 2016 11:44 PM IST
विज्ञापन
बर्बादी
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
क्षेत्र में घाघरा का कटान तेज, बेघर हुए ग्रामीण
अपने ही हाथों घरों को तोड़ कर पलायन कर रहे लोग
घाघरा की विनाशलीला से चारों ओर बर्बादी का मंजर है। हुलासपुरवा गांव में कटान से बचे घरों को भी घाघरा ने एक-एक कर निगलना शुरू कर दिया है। यहां के तमाम किसानों के खेतों को फसलों समेत पहले ही नदी लील चुकी है। हर तरफ मातम जैसा माहौल है। तिनका-तिनका जोड़ कर बनाए अपने घरों को अपनी आंखों के सामने नदी में समाते देखने को मजबूर हैं।
ब्लाक ईसानगर के रुद्रपुर ग्रामसभा के मजरा हुलासपुरवा में घाघरा नदी ने गांव के बचे आशियनों को फिर निगलना शुरू कर दिया है। अब यहां चारों तरफ तबाही का मंजर है। बीते साल घाघरा ने यहां के कई बाशिंदों के खेत फसलों सहित निगल लिए थे। इस वर्ष जुलाई माह से फिर घाघरा ने गांव की तरफ रुख कर लिया है। अब तक घाघरा 25 घरों के 80 परिवारों को बेघर कर चुकी है।
सोमवार से घाघरा की लहरों ने फिर तांडव करना शुरू कर दिया। जिसके चलते बचे रामभजन, प्रेम कुमार, बाबू राम, रामदास, जहूर, इस्माइल, मुस्तफा के घरों को कटना शुरू कर दिया है। यह लोग आनन फानन अपने घरों को तोड़ कर मलवा और सामान ट्रैक्टर, ट्रालियों में भरकर सुरक्षित स्थानों पर ले जा रहे हैं। सात घरों के करीब 35 परिवार चकमार्गो पर खुले आसमान के नीचे आ गए हैं। बचे हुए घरों के नदी में समाने के साथ ही हुलासपुरवा का अस्तित्व खत्म हो रहा है। पीड़ितों के चेहरों से उनकी बेबसी का दर्द साफ झलक रहा है। अपने ही हाथों अपने मकानों पर हथौड़ा चला रहे लोग मानों अपने दिल पर हथौड़ा चला रहे हों। बेबस गांव वाले अपनी बची खुची गृहस्थी के साथ मकानों के मलवे को बैलगाड़ियों में भर कर नदी से दूर चकमार्ग और सड़क के किनारे खुले आसमान के नीचे रहने को विवश हैं।
विज्ञापन
प्रयास होता तो बेघर न होते लोग
तहसील प्रशासन अगर गंभीरता दिखाता तो हुलासपुरवा का वजूद बच सकता था। लोगों ने बताया कि कटान शुरू होने पर तो बड़े बड़े अधिकारी आए और बड़ी-बड़ी बातें कर चले गए। जिम्मेदार सिंचाई विभाग के अधिकारी काम कम कटान का इंतजार ज्यादा करते थे। डीएम के सख्त निर्देशों के बाद भी कुछ सार्थक काम नहीं हो सका। अगर सिंचाई विभाग के कार्यों की समीक्षा की जाती करीब 20 दिनों में दो बम्बू कैरेट की जगह कुछ और काम होता और बचे करीब 35 परिवार बेघर न होते।
विज्ञापन
अपने ही हाथों घरों को तोड़ कर पलायन कर रहे लोग
घाघरा की विनाशलीला से चारों ओर बर्बादी का मंजर है। हुलासपुरवा गांव में कटान से बचे घरों को भी घाघरा ने एक-एक कर निगलना शुरू कर दिया है। यहां के तमाम किसानों के खेतों को फसलों समेत पहले ही नदी लील चुकी है। हर तरफ मातम जैसा माहौल है। तिनका-तिनका जोड़ कर बनाए अपने घरों को अपनी आंखों के सामने नदी में समाते देखने को मजबूर हैं।
ब्लाक ईसानगर के रुद्रपुर ग्रामसभा के मजरा हुलासपुरवा में घाघरा नदी ने गांव के बचे आशियनों को फिर निगलना शुरू कर दिया है। अब यहां चारों तरफ तबाही का मंजर है। बीते साल घाघरा ने यहां के कई बाशिंदों के खेत फसलों सहित निगल लिए थे। इस वर्ष जुलाई माह से फिर घाघरा ने गांव की तरफ रुख कर लिया है। अब तक घाघरा 25 घरों के 80 परिवारों को बेघर कर चुकी है।
विज्ञापन
सोमवार से घाघरा की लहरों ने फिर तांडव करना शुरू कर दिया। जिसके चलते बचे रामभजन, प्रेम कुमार, बाबू राम, रामदास, जहूर, इस्माइल, मुस्तफा के घरों को कटना शुरू कर दिया है। यह लोग आनन फानन अपने घरों को तोड़ कर मलवा और सामान ट्रैक्टर, ट्रालियों में भरकर सुरक्षित स्थानों पर ले जा रहे हैं। सात घरों के करीब 35 परिवार चकमार्गो पर खुले आसमान के नीचे आ गए हैं। बचे हुए घरों के नदी में समाने के साथ ही हुलासपुरवा का अस्तित्व खत्म हो रहा है। पीड़ितों के चेहरों से उनकी बेबसी का दर्द साफ झलक रहा है। अपने ही हाथों अपने मकानों पर हथौड़ा चला रहे लोग मानों अपने दिल पर हथौड़ा चला रहे हों। बेबस गांव वाले अपनी बची खुची गृहस्थी के साथ मकानों के मलवे को बैलगाड़ियों में भर कर नदी से दूर चकमार्ग और सड़क के किनारे खुले आसमान के नीचे रहने को विवश हैं।
विज्ञापन
प्रयास होता तो बेघर न होते लोग
तहसील प्रशासन अगर गंभीरता दिखाता तो हुलासपुरवा का वजूद बच सकता था। लोगों ने बताया कि कटान शुरू होने पर तो बड़े बड़े अधिकारी आए और बड़ी-बड़ी बातें कर चले गए। जिम्मेदार सिंचाई विभाग के अधिकारी काम कम कटान का इंतजार ज्यादा करते थे। डीएम के सख्त निर्देशों के बाद भी कुछ सार्थक काम नहीं हो सका। अगर सिंचाई विभाग के कार्यों की समीक्षा की जाती करीब 20 दिनों में दो बम्बू कैरेट की जगह कुछ और काम होता और बचे करीब 35 परिवार बेघर न होते।