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खीरी जिले की दो विधानसभा सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों का रहा दबदबा
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धौरहरा में पांच बार और निघासन में दो बार बने निर्दलीय विधायक
धौरहरा में तीन दिग्गज कांग्रेसी नेता कभी कांग्रेस से तो कभी निर्दलीय चुनाव जीते
लखीमपुर खीरी। जिले के दो विधानसभा क्षेत्रों में निर्दलीय उम्मीदवारों का कई बार दबदबा रहा है। धौरहरा से पांच बार और निघासन से दो बार निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव जीतकर विधानसभा में पहुंचे हैं। धौरहरा से चुने गए एक निर्दलीय विधायक उत्तर प्रदेश विधानसभा के डिप्टी स्पीकर बने, जबकि धौरहरा और निघासन के अलावा जिले की अन्य किसी विधानसभा सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव परिणामों पर कोई खास असर डालने में भी कामयाब नहीं हो सके। हालांकि सभी चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवारों ने अपनी उपस्थिति जरूर दर्ज कराई।
धौरहरा को जिले में सबसे ज्यादा राजनीतिक उठापटक वाली सीट मानी जाती है। यहां के मतदाताओं ने एक दो बार को छोड़ हर बार अपने विधायक बदले हैं। यहां जो विधायक दोबारा रिपीट भी हुए हैं वह या तो पार्टी बदलकर या निर्दलीय लड़कर चुनाव जीतने में कामयाब हो पाए हैं। धौरहरा विधानसभा क्षेत्र में आजादी के बाद से अब तक पांच बार निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव जीत कर विधायक बने हैं। यहीं नहीं विधानसभा में वह प्रभावशाली भी रहे।
वर्ष 1967 के विधानसभा चुनाव में धौरहरा क्षेत्र से बाबू जगन्नाथ प्रसाद निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़े और कांग्रेस प्रत्याशी तेज नारायन त्रिवेदी को पराजित कर विधायक बने। 1974 के चुनाव में राजा सरस्वती प्रताप सिंह ने निर्दलीय चुनाव लड़कर कांग्रेस उम्मीदवार को हराया। 1977 में जगन्नाथ प्रसाद फिर निर्दलीय चुनाव लड़कर विधायक बने। 1980 के चुनाव में तेज नारायन त्रिवेदी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़े और कांग्रेस उम्मीदवार जगन्नाथ प्रसाद को हराकर विधायक बने।
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1985 के चुनाव में सरस्वती प्रताप सिंह निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीत कर विधायक बने उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार तेज नारायन त्रिवेदी को हराया था। 1996 में वह लोकतांत्रिक कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते और प्रदेश मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री भी बने। इस तरह धौरहरा सीट से तीन नेता पांच बार निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीत कर विधायक बनने में कामयाब हुए।
मूल रूप से कांग्रेसी थे धौरहरा से चुने गए सभी निर्दलीय विधायक
आजादी के बाद करीब पांच दशकों तक धौरहरा की राजनीति जगन्नाथ प्रसाद, तेज नारायण त्रिवेदी और सरस्वती प्रताप सिंह इन तीन नेताओं के इर्द गिर्द घूमती रही। यह तीनों नेता मूल रूप से कांग्रेसी थे। इनमें से जब किसी को कांग्रेस का टिकट मिलता तो दूसरे नेताजी उसके मुकाबले निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में ताल ठोंक देते थे। निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतने के बाद वे प्राय: फिर कांग्रेस में शामिल हो जाते थे। हालांकि निर्दलीय विधायक के रूप में ही जगन्नाथ प्रसाद को डिप्टी स्पीकर बनने का मौका मिला था।
निघासन से एक ही नेता दो बार चुने गए निर्दलीय विधायक
धौरहरा से सटी विधानसभा सीट निघासन से एक ही नेता लगातार दो बार निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीत कर विधायक बने। 1989 के चुनाव में त्रिकोलिया गांव के निरवेंद्र कुमार मिश्र मुन्ना निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़े। वह इस चुनाव में कांग्रेस से दो बार विधायक रहे सतीश अजमानी को हराकर विधायक बने। 1991 के चुनाव में भी निरवेंद्र कुमार मिश्र मुन्ना भाजपा उम्मीदवार रामआसरे शुक्ल को हराकर दूसरी बार विधायक बने। 1993 का चुनाव उन्होंने सपा के टिकट पर चुनाव लड़ा। इस चुनाव में उन्होंने इसी क्षेत्र से तीन बार विधायक रहे भाजपा के दिग्गज नेता रामचरन शाह को हराकर हैट्रिक बनाई।
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धौरहरा में तीन दिग्गज कांग्रेसी नेता कभी कांग्रेस से तो कभी निर्दलीय चुनाव जीते
लखीमपुर खीरी। जिले के दो विधानसभा क्षेत्रों में निर्दलीय उम्मीदवारों का कई बार दबदबा रहा है। धौरहरा से पांच बार और निघासन से दो बार निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव जीतकर विधानसभा में पहुंचे हैं। धौरहरा से चुने गए एक निर्दलीय विधायक उत्तर प्रदेश विधानसभा के डिप्टी स्पीकर बने, जबकि धौरहरा और निघासन के अलावा जिले की अन्य किसी विधानसभा सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव परिणामों पर कोई खास असर डालने में भी कामयाब नहीं हो सके। हालांकि सभी चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवारों ने अपनी उपस्थिति जरूर दर्ज कराई।
धौरहरा को जिले में सबसे ज्यादा राजनीतिक उठापटक वाली सीट मानी जाती है। यहां के मतदाताओं ने एक दो बार को छोड़ हर बार अपने विधायक बदले हैं। यहां जो विधायक दोबारा रिपीट भी हुए हैं वह या तो पार्टी बदलकर या निर्दलीय लड़कर चुनाव जीतने में कामयाब हो पाए हैं। धौरहरा विधानसभा क्षेत्र में आजादी के बाद से अब तक पांच बार निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव जीत कर विधायक बने हैं। यहीं नहीं विधानसभा में वह प्रभावशाली भी रहे।
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वर्ष 1967 के विधानसभा चुनाव में धौरहरा क्षेत्र से बाबू जगन्नाथ प्रसाद निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़े और कांग्रेस प्रत्याशी तेज नारायन त्रिवेदी को पराजित कर विधायक बने। 1974 के चुनाव में राजा सरस्वती प्रताप सिंह ने निर्दलीय चुनाव लड़कर कांग्रेस उम्मीदवार को हराया। 1977 में जगन्नाथ प्रसाद फिर निर्दलीय चुनाव लड़कर विधायक बने। 1980 के चुनाव में तेज नारायन त्रिवेदी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़े और कांग्रेस उम्मीदवार जगन्नाथ प्रसाद को हराकर विधायक बने।
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1985 के चुनाव में सरस्वती प्रताप सिंह निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव जीत कर विधायक बने उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार तेज नारायन त्रिवेदी को हराया था। 1996 में वह लोकतांत्रिक कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते और प्रदेश मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री भी बने। इस तरह धौरहरा सीट से तीन नेता पांच बार निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीत कर विधायक बनने में कामयाब हुए।
मूल रूप से कांग्रेसी थे धौरहरा से चुने गए सभी निर्दलीय विधायक
आजादी के बाद करीब पांच दशकों तक धौरहरा की राजनीति जगन्नाथ प्रसाद, तेज नारायण त्रिवेदी और सरस्वती प्रताप सिंह इन तीन नेताओं के इर्द गिर्द घूमती रही। यह तीनों नेता मूल रूप से कांग्रेसी थे। इनमें से जब किसी को कांग्रेस का टिकट मिलता तो दूसरे नेताजी उसके मुकाबले निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में ताल ठोंक देते थे। निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतने के बाद वे प्राय: फिर कांग्रेस में शामिल हो जाते थे। हालांकि निर्दलीय विधायक के रूप में ही जगन्नाथ प्रसाद को डिप्टी स्पीकर बनने का मौका मिला था।
निघासन से एक ही नेता दो बार चुने गए निर्दलीय विधायक
धौरहरा से सटी विधानसभा सीट निघासन से एक ही नेता लगातार दो बार निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीत कर विधायक बने। 1989 के चुनाव में त्रिकोलिया गांव के निरवेंद्र कुमार मिश्र मुन्ना निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़े। वह इस चुनाव में कांग्रेस से दो बार विधायक रहे सतीश अजमानी को हराकर विधायक बने। 1991 के चुनाव में भी निरवेंद्र कुमार मिश्र मुन्ना भाजपा उम्मीदवार रामआसरे शुक्ल को हराकर दूसरी बार विधायक बने। 1993 का चुनाव उन्होंने सपा के टिकट पर चुनाव लड़ा। इस चुनाव में उन्होंने इसी क्षेत्र से तीन बार विधायक रहे भाजपा के दिग्गज नेता रामचरन शाह को हराकर हैट्रिक बनाई।