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Lakhimpur Kheri News: किताबों से बढ़ रही दूरी... मोबाइल में खो रहा बचपन
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दुकान पर रखी बाल साहित्य
लखीमपुर खीरी। पिछले एक दशक में टेक्नोलॉजी ने इस कदर हर किस के जीवन पर असर डाला है कि इससे बच्चे तक अछूते नहीं हैं। बदलते परिवेश में बच्चों के हाथों में बाल साहित्य की जगह मोबाइल ने ली है। पहले जहां बच्चे चंदामामा, नंदन, चंपक आदि पुस्तकों के दीवाने हुुआ करते थे, आज इनके नाम तक नहीं जानते। बच्चों की यह पत्रिकाएं गायब होती जा रही हैं।
कुछ दशक पहले तक बच्चों से लेकर किशोरों के हाथ में चंदमामा, नंदन, चंपक, दादा-दादी की कहानियां सहित तमाम साहित्यिक किताबें दिखा करती थी, लेकिन बदलते परवेश में किताबों की जगह मोबाइल और वीडियो गेम का रिमोट दिखता है। यही वजह है कि बाल साहित्य की पुस्तकें बच्चों के हाथ से लेकर दुकानों तक से गायब हो रही हैं। किताबों के माध्यम से बच्चों को सच्चाई, साहस, बलिदान एवं परिश्रम जैसे जीवन मूल्यों की जानकारी मिलती थी।
मोबाइल पर खेल रहे हिंसक वीडियो गेम
सुगंध लुटाते फूल, छुट्टी के दिन आए व शोभा है बसंत की न्यारी जैसी बाल रचनाएं लिखने वाले गोला निवासी बाल साहित्यकार संत कुमार बाजपेई बताते हैं कि बाल साहित्य पढ़ने की उम्र में बच्चे मोबाइल पर हिंसक गेम खेल रहे, रील बना रहे हैं। अधिकांश समय मोबाइल चलाने में बिता रहे हैं। इससे बच्चों में अपनापन को मन-मस्तिष्क में बिठाने की क्षमता खत्म हो रही है। जबकि बाल साहित्य बच्चों में पढ़ने लिखने से लेकर बोलने में सुधार होने के साथ बुद्धिमत्ता बढ़ाने में सहायक हैं।
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मोबाइल से जुड़ रहा बच्चों का रिश्ता
बाल साहित्यकार एवं हिंदी प्रवक्ता सुरेश सौरभ बताते हैं कि इंटरनेट और मोबाइल ने किताबों को बच्चों से दूर कर दिया है। इसका एक कारण पढ़ाई भी मोबाइल पर होना है। इसी वजह से बच्चों में किताबों के प्रति लगाव निरंतर कम हो रहा है। तरह तरह के गेम्स मनोरंजन का साधन हो गए हैं। जबकि पहले बाल साहित्य हुआ करता था। मगर, ज्ञान किताबों में ही है। इसलिए माता-पिता बच्चों को किताब पढ़ने की आदत डालें। ज्ञान किताबों में है न कि मोबाइल और गेम्स में।
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कुछ दशक पहले तक बच्चों से लेकर किशोरों के हाथ में चंदमामा, नंदन, चंपक, दादा-दादी की कहानियां सहित तमाम साहित्यिक किताबें दिखा करती थी, लेकिन बदलते परवेश में किताबों की जगह मोबाइल और वीडियो गेम का रिमोट दिखता है। यही वजह है कि बाल साहित्य की पुस्तकें बच्चों के हाथ से लेकर दुकानों तक से गायब हो रही हैं। किताबों के माध्यम से बच्चों को सच्चाई, साहस, बलिदान एवं परिश्रम जैसे जीवन मूल्यों की जानकारी मिलती थी।
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मोबाइल पर खेल रहे हिंसक वीडियो गेम
सुगंध लुटाते फूल, छुट्टी के दिन आए व शोभा है बसंत की न्यारी जैसी बाल रचनाएं लिखने वाले गोला निवासी बाल साहित्यकार संत कुमार बाजपेई बताते हैं कि बाल साहित्य पढ़ने की उम्र में बच्चे मोबाइल पर हिंसक गेम खेल रहे, रील बना रहे हैं। अधिकांश समय मोबाइल चलाने में बिता रहे हैं। इससे बच्चों में अपनापन को मन-मस्तिष्क में बिठाने की क्षमता खत्म हो रही है। जबकि बाल साहित्य बच्चों में पढ़ने लिखने से लेकर बोलने में सुधार होने के साथ बुद्धिमत्ता बढ़ाने में सहायक हैं।
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मोबाइल से जुड़ रहा बच्चों का रिश्ता
बाल साहित्यकार एवं हिंदी प्रवक्ता सुरेश सौरभ बताते हैं कि इंटरनेट और मोबाइल ने किताबों को बच्चों से दूर कर दिया है। इसका एक कारण पढ़ाई भी मोबाइल पर होना है। इसी वजह से बच्चों में किताबों के प्रति लगाव निरंतर कम हो रहा है। तरह तरह के गेम्स मनोरंजन का साधन हो गए हैं। जबकि पहले बाल साहित्य हुआ करता था। मगर, ज्ञान किताबों में ही है। इसलिए माता-पिता बच्चों को किताब पढ़ने की आदत डालें। ज्ञान किताबों में है न कि मोबाइल और गेम्स में।