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Lakhimpur Kheri News: अब भी न चेते तो तराई इलाके से भी गायब हो जाएगी तरावट

Mon, 10 Jun 2024 03:58 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Mon, 10 Jun 2024 03:58 AM IST
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If we are not careful even now, Taravat will disappear from the Terai area too.
बांकेगंज के निकट नगरिया झील।
बांकेगंज। नदियों, झीलों और तालाबों की बहुलता वाले तराई क्षेत्र से भी तरावट गायब हो रही है। हमेशा पानी और परिंदों से भरी रहने वाली सेमरई और नगरिया झीलें जून में ही सूखने लगी हैं। मैनहन गांव के कबुलहा ताल में पानी सूख जाने से तलहटी नजर आने लगी है। रमियाबेहड़ की झील में भी पानी कम हो गया है। मनरेगा के तहत खोदे गए अमृत सरोवर सूखकर बच्चों के खेल का मैदान बन गए हैं।
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सरकारी रिकॉर्ड में भले ही जिले में 2223 वेटलैंड हैं लेकिन तराई की धरती से तरावट गुम होती जा रही है। खीरी जिले में भी पानी का संकट गहराने लगा है। ये हाल तब है, जब इस जिले में 188 नदी-नाले हैं। दो हजार से अधिक छोटे-बड़े जलाशय हैं। तालाब-पोखर सूख जाने और नदियों का जलस्तर घटने से पशु-पक्षियों के लिए पानी का संकट पैदा होने लगा है। भूगर्भ जलस्तर नीचे हो जाने से हैंडपंपों और ट्यूबवेलों की बोरिंग फेल हो रही हैं। सिंचाईं के लिए किसानों को गहरा गड्ढा खोदकर उसमें इंंजन रखना पड़ रहा है।
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भूजल स्तर सामान्य रूप से तीन से चार मीटर नीचे होना चाहिए, जबकि खीरी जिले के बांकेगंज, पसगवां मोहम्मदी, बेहजम, मितौली आदि में जलस्तर पांच मीटर से नीचे पहुंच गया है, जोकि खतरे का संकेत है। ग्राउंड वाटर डिपार्टमेंट लखनऊ के एक्सईएन अनुपम श्रीवास्तव ने बताया कि केंद्रीय भूजल बोर्ड की गाइड लाइन के मुताबिक यदि किसी क्षेत्र में भूजल दोहन 70 फीसदी से कम है, तो सुरक्षित माना जाता है।
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70 से 90 फीसदी दोहन क्रिटिकल श्रेणी में माना जाता है। 90 से 100 फीसदी और ज्यादा चिंताजनक माना जाता है। अच्छी बात यह है कि अब तक जिले में किसी भी ब्लॉक के डार्क जोन में जाने की स्थिति नहीं आई है, लेकिन जल संरक्षण के लिए जागरूकता जरूरी है।


जलाशयों पर अतिक्रमण से गिर रहा भूगर्भ जलस्तर
तालाबों, झीलों और नदियों में अतिक्रमण, उनमें खेती और आबादी बस जाने से भूगर्भ जलस्तर में गिरावट आ रही है। यह अतिक्रमण बाढ़ का कारण भी बन रहा है। पहले बरसात के मौसम में जब बड़ी नदियों का जलस्तर बढ़ता था, तो उनका पानी सहायक नदियों, नालों और तालाबों में जाता था। जिससे बाढ़ का असर कम हो जाता था। अब सहायक नदियों-नालों का अस्तित्व खत्म होने से बाढ़ का पानी खेतों में फैल जाता है और फसलें बर्बाद होती हैं।
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