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Lakhimpur Kheri News: ढोलक की थाप से मोबाइल फोन स्क्रीन तक सिमटी होली

Fri, 27 Feb 2026 01:46 AM IST
बरेली ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी Updated Fri, 27 Feb 2026 01:46 AM IST
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Holi is confined to mobile phone screens, from the beats of the dholak
वीरेंद्र सिंह यादव।
बिसौली। कभी होली का मतलब केवल रंग नहीं होता था, वह पूरे गांव की धड़कन हुआ करती थी। फाल्गुन लगते ही माहौल बदल जाता था। खेतों में सरसों झूमती थी और गलियों में ढोलक की थाप पर फाग गीत गूंजने लगते थे।
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होली आने से लगभग एक माह पहले ही तैयारियां शुरू हो जाती थीं। महिलाएं घरों की दीवारों पर चीका और पीली मिट्टी से लिपाई-पुताई कर घरों को नया रूप देती थीं।शाम ढलते ही चौपाल सजती थी। बुजुर्ग रसिया छेड़ते, युवक सुर में सुर मिलाते और बच्चे तालियां बजाकर उत्साह बढ़ाते। सुबह प्रभात फेरियां निकलतीं, जिनमें भक्ति और उल्लास का अद्भुत संगम देखने को मिलता था।
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होली आपसी प्रेम और अपनत्व का पर्व थी। देवर-भाभी की नोकझोंक, मित्रों की ठिठोली और बच्चों की शरारतें त्योहार की असली पहचान थीं। युवक होलिका दहन के लिए लकड़ियां इकट्ठा करते और ‘होली बढ़ाने’ की स्वस्थ परंपरा निभाते। कहीं मटकियां बांधकर खेल होते, तो कहीं गुलाल भरी मटकियां फोड़ने की होड़ लगती। पूरा गांव मानो एक परिवार बन जाता था लेकिन समय के साथ तस्वीर बदल गई।
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अब ढोलक की जगह डीजे ने ले ली है और चौपाल की जगह मोबाइल फोन की स्क्रीन ने। शुभकामनाएं गले मिलकर देने की बजाय व्हाट्सएप स्टेटस और सोशल मीडिया पोस्ट के जरिये दी जाती हैं। व्यस्त जीवनशैली और बदलते सामाजिक ढांचे ने सामूहिकता को सीमित कर दिया है। संवाद

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होली जोड़ती थी दिलों को

पहले होली केवल रंगों का नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने का त्योहार थी। लोग वर्षों पुराने गिले-शिकवे भुलाकर गले मिलते थे। रंग के साथ मन का मैल भी धुल जाता था।
--वीरेंद्र सिंह यादव
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पूरा गांव बन जाता था एक परिवार
हर घर में मिलकर पकवान बनते थे। गुझिया और मठरी की खुशबू पूरे मोहल्ले में फैल जाती थी। छोटा-बड़ा का भेद नहीं होता था।
-सुमन लता जौहरी
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फोन ने कम कर दी त्योहारों की आत्मीयता

अब लोग मोबाइल फोन पर संदेश भेजकर ही त्योहार मना लेते हैं। व्यक्तिगत मिलना-जुलना और सामूहिक आयोजन कम हो गए हैं।
-अनिल गुप्ता, व्यापारी
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व्यस्तता में सिमट गए सामूहिक त्योहार
फोटो-20
पहले लोग अपने काम छोड़कर साथ त्योहार मनाते थे। अब जीवन की भागदौड़ में त्योहार भी सीमित समय तक रह गए हैं।
-सुरेश अग्रवाल, व्यापारी
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वीरेंद्र सिंह यादव।

वीरेंद्र सिंह यादव।

वीरेंद्र सिंह यादव।

वीरेंद्र सिंह यादव।

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