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लखीमपुर खीरी: काशी विश्वनाथ के बाद प्रदेश का सबसे बड़ा शिवधाम है गोला गोकर्णनाथ

Tue, 14 Feb 2023 11:59 PM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Tue, 14 Feb 2023 11:59 PM IST
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Gola Gokarnath is the biggest Shivdham of the state after Kashi Vishwanath.
गोला गोकर्णनाथ का प्राचीन शिव मंदिर
- छोटी काशी कॉरिडोर के जरिए भव्य धाम बनाने की कवायद, पुराणों में मिलती है गोकर्णनगरी की कथा
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गोला गोकर्णनाथ। उत्तर प्रदेश में काशी विश्वनाथ के बाद गोला गोकर्णनाथ एक ऐसा शिवधाम है जहां सावन और महाशिवरात्रि पर दूरदराज से लाखों श्रद्घालु जुटते हैं।
गोला गोकर्ण छोटी काशी के नाम से भी प्रसिद्घ है, इसलिए इस बार यहां पर काशी विश्वनाथ की तर्ज पर छोटी काशी कॉरिडोर बनवाया जा रहा है। कई चरणों में इसकी कवायद भी शुरु हुई है। उधर, 18 फरवरी को होने वाले महाशिवरात्र पर लाखों श्रद्घालुओं का सैलाब उमड़ने की उम्मीद है। इसके लिए मंदिर कमेटी और प्रशासन ने जरूरी तैयारियां शुरू कर दी हैं। छोटी काशी कॉरिडोर बनने से मंदिर का स्वरूप भव्य हो जाएगा, इससे पौराणिक मंदिर की कीर्ति और यशगाथा दूर दूर तक पहुंचेगी, जबकि श्रद्धालुओं को भी भगवान भूतभावन के सहज, सरल और सुलभ दर्शन हो सकेंगे।
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पौराणिक महत्व : छोटी काशी में मृग रूप में घूमे थे भगवान शिव
छोटी काशी कही जाने वाली गोला गोकर्णनाथ नगरी का पुराणों में भी वर्णन है। वराह पुराण में कथा है कि भगवान शंकर वैराग्य उत्पन्न होने पर यहां के वन क्षेत्र में भ्रमण करने आए थे और सुंदर स्थान देखकर यही रम गए। ब्रह्मा विष्णु और इंद्र को चिंता हुई। वह उन्हें ढूंढने के लिए निकले तो इस वन प्रांत में विशाल मृग को सोते देखकर, यही शिव हैं, ऐसा विचार कर निकट गए तो आहट पाकर मृग भागा। देवताओं ने उनका पीछा कर उनके सींग पकड़ लिए। सींग दो-तीन टुकड़ों में बंट गया। उनमें से सींग का मूल भगवान विष्णु ने यहां स्थापित किया, जो गोकर्णनाथ के नाम से प्रसिद्ध है। यहां के शिव का वर्णन शिव पुराण वामन, पुराण, कूर्म पुराण, पद्म पुराण और स्कंद पुराण में मिलता है। इसके एक और किवदंती है कि भगवान शिव लंकापति रावण की तपस्या से प्रसन्न हुए और रावण भगवान शिव को अपने साथ लंका ले जाने लगा। जब रावण गोला गोकर्णनाथ के पास पहुंचा तो उसे लघुशंका हुई। रावण शिवलिंग रूप में भगवान शिव को एक चरवाहे को देकर इस हिदायत के साथ देकर लघुशंका गया कि वह शिवलिंग भूमि पर नहीं रखेगा। काफी देर तक वापस न आने पर चरवाहे ने भगवान शिव को भूमि पर रख दिया। जब रावण शिव को नहीं उठा सका तो गुस्से में अपने अंगूठे से शिवलिंग को भूमि में दबा दिया। अंगूठे से दबने के कारण शिवलिंग गाय के कान के आकार का हो गया। इसके चलते यह शिवलिंग गोकर्णनाथ के नाम से प्रसिद्घ हुआ।
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धूमधाम से होता है शिव विवाह, निकलती है शोभायात्रा
पौराणिक शिव मंदिर में भगवान भोलेनाथ और माता पार्वती के विवाह का भव्य आयोजन सदियों से होता आ रहा है। रात के चारों पहर शिव भक्त भजन कीर्तन, नाचते, गाते, अबीर गुलाल उड़ाते भगवान शिव का पूजन एवं शृंगार करते हैं और भगवान शिव पार्वती के विवाह का उत्सव मनाते हैं। मंदिर कमेटी अध्यक्ष जनार्दन गिरि ने बताया कि 18 फरवरी की शाम महाशिवरात्रि पर भगवान भोलेनाथ की बारात धूमधाम से निकाली जाएगी।


नीलकंठ मैदान में होता है भव्य पार्थिव शिवलिंग महा रुद्राभिषेक
गोकर्ण तीर्थ के निकट नीलकंठ मैदान में महा रुद्राभिषेक की शुरु हुई परंपरा निरंतर भव्य होती जा रही है। आयोजक पंडित रामदेव मिश्रा शास्त्री ने बताया कि इस बार भी वैश्विक कल्याण हेतु 151 पार्थिव शिवलिंग के साथ महा रुद्राभिषेक का आयोजन की योजना बन चुकी है। यह 11 वां आयोजन है।

गोला गोकर्णनाथ का प्राचीन शिव मंदिर

गोला गोकर्णनाथ का प्राचीन शिव मंदिर

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