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Lakhimpur Kheri News: सालाना समागम में किया गुरु की महिमा का बखान
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संत समागम में मौजूद दूर-दूर से आए हुए संत। संवाद
बिजुआ। संत बाबा ईशर सिंह जी की बरसी के उपलक्ष्य में पड़रिया तुला के ठाठ नानकसर गुरुद्वारा साहिब में चल रहा तीन दिवसीय सालाना समागम बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया गया। समागम के अंतिम दिन कार्यक्रम में हजारों की संख्या में लोग उमड़े। दीवान के सामने मत्था टेक गुरुवाणी का श्रवण किया।
अंतिम दिन सालाना समागम का शुभारंभ दीवान सजाने के साथ किया गया। इसके बाद डेरा प्रमुख संत बाबा सुखदेव सिंह की अगुवाई और ठाठ नानकसर गुरुद्वारा साहिब के सेवक बाबा गुरुमीत सिंह की देखरेख में संत बाबा सुखदेव सिंह के डेरे भूच्चोंकलां भटिंडा पंजाब से आए हजूरी जत्थे ने अपनी वाणी से गुरु महिमा का बखान किया। इसमें के बाबा मानवीर सिंह व बाबा मलकीत सिंह, संत बाबा सुखचैन सिंह शामिल रहे।
बाबा गुरुमीत सिंह ने बाबा ईशर सिंह की जीवनी पर प्रकाश डालते हुए बताया की बाबा ईशर सिंह का जन्म पंजाब के गांव झोरड़ा में 26 मार्च 1923 को हुआ था। वह कम आयु में ही पंजाब के पूज्य महापुरुष बाबा आनंद सिंह कालेरा वालों से मिले। जिन्होंने ईश्वर का गुणगान करने की प्रेरणा दी।
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इसके बाद सारा जीवन गुरु ग्रंथ साहब व सिख धर्म को अर्पित कर दिया। इन्होंने अपना शरीर 1963 में त्यागा। तभी से हर वर्ष उनकी जगह-जगह बरसी मनाई जाती है। इसके अलावा कई अन्य प्रांतों से आए रागी, कविशरी जत्थे व कथा वाचकों ने भी हाजिरी भरते हुए अपनी अपनी वाणी व शबद कीर्तन से संगत को निहाल किया।
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अंतिम दिन सालाना समागम का शुभारंभ दीवान सजाने के साथ किया गया। इसके बाद डेरा प्रमुख संत बाबा सुखदेव सिंह की अगुवाई और ठाठ नानकसर गुरुद्वारा साहिब के सेवक बाबा गुरुमीत सिंह की देखरेख में संत बाबा सुखदेव सिंह के डेरे भूच्चोंकलां भटिंडा पंजाब से आए हजूरी जत्थे ने अपनी वाणी से गुरु महिमा का बखान किया। इसमें के बाबा मानवीर सिंह व बाबा मलकीत सिंह, संत बाबा सुखचैन सिंह शामिल रहे।
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बाबा गुरुमीत सिंह ने बाबा ईशर सिंह की जीवनी पर प्रकाश डालते हुए बताया की बाबा ईशर सिंह का जन्म पंजाब के गांव झोरड़ा में 26 मार्च 1923 को हुआ था। वह कम आयु में ही पंजाब के पूज्य महापुरुष बाबा आनंद सिंह कालेरा वालों से मिले। जिन्होंने ईश्वर का गुणगान करने की प्रेरणा दी।
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इसके बाद सारा जीवन गुरु ग्रंथ साहब व सिख धर्म को अर्पित कर दिया। इन्होंने अपना शरीर 1963 में त्यागा। तभी से हर वर्ष उनकी जगह-जगह बरसी मनाई जाती है। इसके अलावा कई अन्य प्रांतों से आए रागी, कविशरी जत्थे व कथा वाचकों ने भी हाजिरी भरते हुए अपनी अपनी वाणी व शबद कीर्तन से संगत को निहाल किया।