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बालिकाएं बीच में ही छोड़ रहीं पढ़ाई
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लखीमपुर खीरी। बालिकाओं को समान अवसर और शिक्षा देने के वादे तो बहुत हैं, लेकिन हालात अब भी सुधरे नहीं हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में बालिकाएं कक्षा आठ के बाद पढ़ाई छोड़ने को विवश हैं। ये बातें मितौली और बेहजम ब्लॉक क्षेत्र में बालिकाओं के स्कूल छोड़ने के विषय पर कराए गए सर्वे में सामने आई। इस सर्वे को शनिवार को जिला शिक्षा प्रशिक्षण संस्थान (डायट) में हुई एक गोष्ठी में सामने रखा गया। गोष्ठी में यह बात सामने आई कि लखीमपुर खीरी जिले में स्कूल न जाने वाली 16 हजार बालिकाएं चिन्हित की गई थीं। हालांकि महिला बाल कल्याण विभाग का दावा है कि अब 3500 बालिकाएं ही स्कूल नहीं जा रही हैं।
एम ट्रस्ट और चाइल्ड राइट्स एंड यू (सीआरवाई) की ओर से आयोजित इस गोष्ठी में ‘राइट टू एजूकेशन फोरम’ के राष्ट्रीय संयोजक अम्बरीश राय ने बताया कि बच्चों के स्कूल छोड़ने के पीछे उनके माता-पिता का निरक्षर होना भी है। सालाना 20 हजार से नीचे आमदनी वाले परिवारों के बच्चे भी पढ़ाई छोड़ रहे हैं। एम ट्रस्ट के सर्वे के बारे में संजय राय ने बताया कि मितौली और बेहजम ब्लाक के बच्चे आठवीं के बाद विद्यालय छोड़ देते हैं, क्योंकि गांव-स्कूल के 10 किमी के दायरे से बाहर हैं। जो प्राइवेट स्कूल नजदीक हैं भी, उनकी महंगी फीस के चलते अभिभावक अपने बच्चों को पढ़ा नहीं पाते हैं। इसलिए जरूरी है कि पांच किमी की परिधि में 12वीं तक पढ़ाई के लिए माध्यमिक स्कूल होना चाहिए, तभी बालिकाएं पढ़ाई कर सकेंगी। ग्राम सुधार समिति के समन्वयक जनार्दन मिश्रा ने कहा कि बालिकाओं की शिक्षा में घर से स्कूल की अधिक दूरी बाधा डाल रही है। इसके अलावा जनपद में बाढ़ प्रभावित इलाके में जल जीवों के खतरे से भी बच्चे स्कूल नहीं जा पाते या पढ़ाई छोड़ देते हैं। रास्ते में बालिकाओं से छेड़खानी की घटनाओं से भी पढ़ाई छोड़ने के मामले सामने आते रहे हैं। गोष्ठी में प्राचार्य डॉ. ओपी गुप्ता, वाईडी कालेज के प्रोफेसर डॉ. संजय कुमार ने जानकारियां दीं।
केस स्टडी में उभरा बालिकाओं का दर्द
संस्था ने मितौली और बेहजम ब्लॉक में सर्वे के दौरान कुछ केस स्टडी किए, जिनमें ज्यादातर बालिकाएं स्कूल न जा पाने से मायूस हैं। वह पढ़ाई करके अपने सपनों को साकार करना चाहती हैं, लेकिन गांव के आसपास माध्यमिक स्कूल न होने पढ़ाई नहीं कर पा रही हैं।
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एम ट्रस्ट और चाइल्ड राइट्स एंड यू (सीआरवाई) की ओर से आयोजित इस गोष्ठी में ‘राइट टू एजूकेशन फोरम’ के राष्ट्रीय संयोजक अम्बरीश राय ने बताया कि बच्चों के स्कूल छोड़ने के पीछे उनके माता-पिता का निरक्षर होना भी है। सालाना 20 हजार से नीचे आमदनी वाले परिवारों के बच्चे भी पढ़ाई छोड़ रहे हैं। एम ट्रस्ट के सर्वे के बारे में संजय राय ने बताया कि मितौली और बेहजम ब्लाक के बच्चे आठवीं के बाद विद्यालय छोड़ देते हैं, क्योंकि गांव-स्कूल के 10 किमी के दायरे से बाहर हैं। जो प्राइवेट स्कूल नजदीक हैं भी, उनकी महंगी फीस के चलते अभिभावक अपने बच्चों को पढ़ा नहीं पाते हैं। इसलिए जरूरी है कि पांच किमी की परिधि में 12वीं तक पढ़ाई के लिए माध्यमिक स्कूल होना चाहिए, तभी बालिकाएं पढ़ाई कर सकेंगी। ग्राम सुधार समिति के समन्वयक जनार्दन मिश्रा ने कहा कि बालिकाओं की शिक्षा में घर से स्कूल की अधिक दूरी बाधा डाल रही है। इसके अलावा जनपद में बाढ़ प्रभावित इलाके में जल जीवों के खतरे से भी बच्चे स्कूल नहीं जा पाते या पढ़ाई छोड़ देते हैं। रास्ते में बालिकाओं से छेड़खानी की घटनाओं से भी पढ़ाई छोड़ने के मामले सामने आते रहे हैं। गोष्ठी में प्राचार्य डॉ. ओपी गुप्ता, वाईडी कालेज के प्रोफेसर डॉ. संजय कुमार ने जानकारियां दीं।
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केस स्टडी में उभरा बालिकाओं का दर्द
संस्था ने मितौली और बेहजम ब्लॉक में सर्वे के दौरान कुछ केस स्टडी किए, जिनमें ज्यादातर बालिकाएं स्कूल न जा पाने से मायूस हैं। वह पढ़ाई करके अपने सपनों को साकार करना चाहती हैं, लेकिन गांव के आसपास माध्यमिक स्कूल न होने पढ़ाई नहीं कर पा रही हैं।
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