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शिक्षक बोले- निभानी होगी दोहरी भूमिका, हम गुरु भी बनें और मित्र भी

Sat, 04 Sep 2021 11:26 PM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Sat, 04 Sep 2021 11:26 PM IST
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education
लखीमपुर खीरी। शिक्षा एक ऐसा माध्यम है जो जीवन को नई विचारधारा प्रदान करता है। पिछले कुछ सालों में शिक्षा क्षेत्र में अहम बदलाव आए हैं। शिक्षा का अधिकार कानून अमल में आने से सामाजिक एवं आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ने का अवसर मिला तो उधर, व्यवसायपरक शिक्षा के माध्यम से लोगों को रोजगार से जोड़ने का काम किया जा रहा है। पिछले कुछ सालों में इस तरह के अहम बदलाव ने शिक्षा को नया आयाम दिए हैं। इसके विपरीत अगर हम गुजरे जमाने को देखें तो उस समय शिक्षक पढ़ाई की गुणवत्ता, अनुशासन और समय को लेकर बेहद गंभीर थे। इसी वजह से सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले छात्रों ने देश ही नहीं दुनिया में नाम रोशन किया। पहले के दौर में शिक्षा एक दान थी, लेकिन वर्तमान में व्यवसाय बन गई है।
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पुराने दौर के शिक्षकों का अनुशासन बेहद सख्त था जो आज के दौर में लागू नहीं हो सकता। यदि इसे लागू कर भी कर दिया जाए तो छात्र छात्राएं स्कूल आने से कतराएंगे, क्योंकि पहले के अभिभावक ही कहते थे कि बिना डर के पढ़ाई नहीं होती। मगर, आज के भौतिकवादी युग में कई अभिभावक बच्चों के लिए ऐशोआराम वाला स्कूल ढूंढते हैं। पुराने और वर्तमान समय की शिक्षक पद्धति एवं शिक्षकों के व्यवहार को आज के कुछ शिक्षक सही मानते हैं तो कुछ इसके विरोध में हैं।
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सनातन धर्म बालिका इंटर कॉलेज की प्रधानाचार्य शिप्रा बाजपेई बताती हैं कि पुराने समय के शिक्षकों का छात्रों के साथ आत्मीय संबंध होता था। वह किताबी ज्ञान के साथ व्यवहारिक शिक्षा देकर अनुशासन में रखकर संस्कार सिखाते थे, जिससे छात्र छात्राएं उसी के अनुरूप व्यवहार करना सीखते थे। जो वर्तमान में कोसों दूर हैं। उन्होंने बताया कि पुराने शिक्षकों का अनुशासन के मामले में अधिक कठोर होना आज के दौर में सही नहीं होगा, क्योंकि अत्यधिक कठोर अनुशासन भी कहीं न कहीं छात्र छात्रा के सफलता में बाधक बनेगा।
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एलपीएस के प्रधानाचार्य विजय सचदेवा बताते हैं कि मौजूदा शिक्षा व्यवस्था में नई टेक्नोलॉजी, कंप्यूटर, इंटरनेट आदि का समावेश ही इसकी सबसे बड़ी अच्छाई है अब छात्र सिर्फ पुस्तक और क्लासरूम तक ही सीमित नहीं हैं। तकनीकी युग में घर पर बैठकर बेहतर पढ़ाई कर सकते हैं। वहीं कई विषयों में प्रैक्टिकल की कमी वर्तमान शिक्षा की सबसे बड़ी खामी है, क्योंकि प्रैक्टिकल के माध्यम से छात्र बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। वहीं मौजूदा माहौल में छात्र समझने से ज्यादा रटने में यकीन करते हैं। इसी कारण दौड़ में तो आगे रहते हैं लेकिन ज्ञान के मामले में काफी पीछे।
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आर्यकन्या डिग्री कॉलेज की प्रोफेसर विमलेश बताती हैं कि पुराने शिक्षकों की कार्य करने की परंपरागत शैली को आज के युग में अपनाया नहीं जा सकता है। क्योंकि आधुनिक युग में शिक्षण कार्य को डिजिटल प्लेटफॉर्म एवं व्यवहारिक ज्ञान से जोड़कर उसे आधुनिक बनाने का प्रयास कर छात्रों को उपयोगी एवं व्यवहारिक शिक्षा प्रदान कराने की जरूरत है। पुराने शिक्षकों का छात्रों के साथ संबंध कठोर होता था, जिससे छात्र डरते थे। मगर, वर्तमान में इस तरह का संबंध न छात्र के हित में हैं और न ही शिक्षक के। शिक्षक मार्गदर्शक न बन कर छात्रों का शुभचिंतक व सहयोगी बनें। इसके लिए मित्रवत व्यवहार की जरूरत है। तभी छात्र शिक्षक से अपनी समस्या बता पाएगा। तभी शिक्षक उनका प्रभावी ढंग से समाधान कर सकेंगे। शिक्षकों को अपना व्यवहार लचीला रखकर बदलते समय के साथ अपनी कार्यशैली को बदलकर इस वैश्विक युग में छात्रों के लिए उपयोगी बनना होगा।
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आर्य कन्या डिग्री कॉलेज की प्रोफेसर सविता साहू बताती हैं कि आज के छात्र अनुशासन को अपने जीवन में महत्व नहीं देते, जो परम आवश्यक है। छात्रों में गुरुजनों के प्रति सम्मान भाव नहीं है, जिसे बदलने की आवश्यकता है। छात्रों को अपने उद्देश्य के प्रति सजग रहकर धैर्य शीलता बनाए रखनी चाहिए। आज के छात्र अधिक ऊर्जावान हैं, लेकिन छात्रों को अपनी यह उर्जा सही दिशा में लगानी चाहिए, क्योंकि छात्रों का समाज में सबसे बड़ा योगदान। छात्र नए नए आविष्कार कर अपने साथ समाज का भी कल्याण कर सकते हैं।
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प्राथमिक विद्यालय रोशननगर की शिक्षका प्रीति गंगवार बताती हैं कि पुराने समय के शिक्षक अपने काम, समय आदि को लेकर प्रतिबद्ध थे। छात्रों को अनुशासन में रखकर संस्कारवान बनाते थे। यदि उस दौर की तरह शिक्षक आज भी छात्रों को अनुशासन में रखने लगें तो न ही बच्चे स्कूल आएंगे और न ही अभिभावक भेजेंगे। वहीं बदलते समय के साथ शिक्षा भी व्यवसाय बनकर रह गई है। पहले हर तबके का बच्चा सरकारी स्कूलों में ही पढ़ने के लिए आता था, लेकिन आज जो बच्चे पढ़ने के लिए आ रहे हैं उनमें से कई के घरों में पढ़ाई का माहौल ही नहीं है।
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बालिका हाईस्कूल संसारपुर की शिक्षिका प्रतिमा यादव का कहना है कि पुरानी पीढ़ी के शिक्षकों से उनकी कर्तव्यनिष्ठा, कुशल नेतृत्व आज के शिक्षकों को सीखना चाहिए। नवा चारों और पुरानी पीढ़ी के शिक्षकों के आदर्शों के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है आज के वैज्ञानिक युग में विद्यार्थियों के हाथ में कागज पेंसिल के साथ मोबाइल, कंप्यूटर है। नई पीढ़ी के शिक्षकों को नवा चारों के साथ आदर्शों की परंपरा भी कायम रखनी होगी।

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कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय संसारपुर की शिक्षिका संध्या पांडे का कहना है कि पुरानी पीढ़ी के शिक्षक अपने कार्य के प्रति सजग और निष्ठावान होते थे। वह सादा जीवन उच्च विचार को चरितार्थ करते थे। परंतु वर्तमान में शिक्षकों सादगी छोड़ दी है और पश्चिमी सभ्यता को अपनाने के लिए अग्रसर हो गए हैं। पुरानी पीढ़ी के शिक्षकों की शिक्षा पद्धति कटवाने पर ज्यादा जोर देती थी परंतु अब के शिक्षक मनोवैज्ञानिक शिक्षा पद्धति के अनुसार शिक्षण कराते हैं। आज की तकनीकी प्रधान शिक्षा की सबसे बड़ी जरूरत है।
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