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मैलानी-भीरा और किशनपुर सेंक्चुरी रेंज में विलुप्त हो चुके हैं चार सींगों वाले हिरन

Wed, 02 Oct 2019 02:36 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Wed, 02 Oct 2019 02:36 AM IST
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बांकेगंज। दुधवा नेशनल पार्क की मैलानी-भीरा और किशनपुर सेंक्चुरी रेंज में एक समय चार सींगों वाले हिरनों की बहुतायत थी। मगर तीन दशक में लगातार घटते-घटते ये अब लगभग विलुप्त हो चुके हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह इन हिरन का अपने आप में खास होने की वजह से शिकारियों की खास पसंद बन जाना रही। कभी ऐसे दो सौ हिरन से संपन्न दुधवा पार्क में अब भी दस से पंद्रह तक संख्या बताई जाती है, मगर दिखते किसी को नहीं हैं। इस वर्ष हुई गणना में एक भी ऐसा हिरन नहीं मिला।
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शिकार के मुद्दे पर इस मामले में टाइगर रिजर्व प्रशासन कुछ भी बोलने से बच रहा है। वन विभाग के अफसर इतना कहकर अपना बचाव करने में लगे हैं कि कुछ समय पहले तक चार सींगों वाले हिरनों के शिकार पर प्रतिबंधित नहीं था। उस समय शिकारियों के हत्थे ज्यादा संख्या में हिरन चढ़ गए। कुछ वन्य जीव विशेषज्ञ जलवायु परिवर्तन और मौसम में बदलाव को भी इनके विलुप्त होने की वजह मान रहे हैं।
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तराई के जंगल खासतौर से किशनुपर सेंक्चुरी से लेकर मैलानी, भीरा, बांकेगंज, जटपुरा, हरदुआ तक चार सींगों वाले हिरनों की भरमार थी। राज्य वन्यजीव सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य डॉ. वीपी सिंह बताते हैं कि सन 1976 में इस क्षेत्र के जंगलों में चार सींगों वाले हिरनों की संख्या 200 से अधिक थी। बाद में इन हिरनों की संख्या में तेजी से कमी आने लगी। अब मैलानी और भीरा रेंज में चार सींगों वाले हिरन दिखाई नहीं देते। हालांकि डॉ. वीपी सिंह का दावा है कि दुधवा की किशनपुर सेंक्चुरी वन रेंज में अब भी 10 से 15 चार सींगों वाले हिरन मौजूद हैं। चार सींगों वाले हिरन किशनपुर सेंक्चुरी से कुलाचे भरते हुए पीलीभीत टाइगर रिजर्व के जंगल में बहुत जल्दी पहुंच जाते हैं। प्रत्येक तीसरे साल होने वाली शाकाहारी वन्यजीवों की गणना के दौरान वर्ष 2010, 2013, 2016 और 2019 में वन्यजीवों की गणना के दौरान चार सींगों वाले एक भी हिरन को रेखांकित नहीं किया गया। वन्य जीव गणना में चार सींगों वाले हिरनों को तराई के जंगलों से लुप्त मान लिया गया।
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कम घने जंगल में हरी घास के मैदान हैं ठिकाने
चार सींगों वाले हिरन कम घने जंगलों, घास के मैदानों और जंगल के बाहरी किनारों पर रहना पसंद करते हैं। चार सींगों वाले हिरन अक्सर जंगल से निकलकर खेतों में भी पहुंच जाते हैं। ये हिरन गेहूं और धान बड़े चाव से खाते हैं। चार सींगों के हिरनों की यही प्रवृति इनके विलुप्त होने की वजह बनी। खेतों में आने वाले चार सींगों वाले हिरन का जंगल के आसपास रहने वाले शिकारियों ने खूब शिकार किया। शिकारी इन हिरनों का शिकार करके इनके सींग, मांस और खाल के लिए करते रहे। वन विभाग इन सब बातों से लंबे समय तक बेखबर रहा। इसका नतीजा यह निकला कि तराई के जंगल से खूबसूरत हिरन पूरी तरह विलुप्त हो गए। वन्य जीव विशेषज्ञ डॉ. वीपी सिंह का कहना है कि विलुप्त होने वाले वन्यजीवों को बचाने के लिए ठोस कार्य योजना बनाए जाने की जरूरत है। यदि वन विभाग 40-50 साल पहले सतर्क होता तो बारहसिंगा, चीतल, पाढ़ा की तरह चार सींगों वाले हिरन भी विलुप्त नहीं होते।
तराई में सात प्रजातियों के मिलते हैं हिरन...
तराई के जंगल में सात प्रजातियों के हिरन पाए जाते हैं। जिसमें पांच प्रजातियां बारहसिंगा, चीतल, पाढ़ा, कांकड़ और सांभर तो बहुतायत में पाए जाते हैं। जबकि जंगल में रहने वाले चौसिंगा हिरन की प्रजाति विलुप्त हो चुकी है। इसके अलावा काला हिरन जंगल के बजाय खेतों में रहना पसंद करते हैं। यह शुष्क जलवायु का प्राणी है। खीरी की धरती दलदली और जलवायु नम होने के कारण यहां इनकी संख्या बहुत कम थी।

टाइगर रिजर्व के दुधवा और बफरजोन में चौसिंगा हिरन लंबे अरसे से दिखाई नहीं दिए हैं। किशनपुर सेंक्चुरी में चौसिंगा हिरनों की मौजूदगी बताई जाती है, लेकिन हाल ही हुई गणना के दौरान नहीं दिखे। इससे पिछले 10 वर्षों में इनकी मौजूदगी का रिकार्ड नहीं है। - संजय पाठक, फील्ड डायरेक्टर, दुधवा टाइगर रिजर्व।
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