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दुधवा : पुरखों की धरती पर फिर से आबाद हो रहे गैंडे

Fri, 22 Sep 2023 12:04 AM IST
Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Fri, 22 Sep 2023 12:04 AM IST
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Dudhwa: Rhinos are repopulating their ancestral land.
बच्चे के साथ दुधवा में विचरण करता हैं गैंड़ा-स्त्रोत दुधवा नेशनल पार्क
लखीमपुर खीरी। अपने पुरखों की धरती पर फिर से आबाद हुए गैंडों को दुधवा की आबोहवा बेहद रास आ रही है। वर्ष 1984 में दुधवा नेशनल पार्क में पांच गैंडों से शुरू किए पुनर्वासन में 39 साल के अंदर इनका कुनबा बढ़ कर 46 तक पहुंच गया है। अब इन गैंडों को जंगल में स्वच्छंद विचरण के लिए आजाद किए जाने की तैयारी है।
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वर्ष 1977 में दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना होने के साथ ही गैंडा पुनर्वासन शुरू करने की योजना बनना शुरू हो गई थी। दरअसल कभी तराई का जंगल एक सींग वाले गैंडों का प्राकृतवास हुआ करता था, लेकिन विभिन्न कारणों से हुए शिकार के चलते यहां से गैंडे समाप्त हो गए। वर्ष 1878 में तराई के जंगल में बचे अंतिम गैंडे का शिकार होने की घटना हुई थी। दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना के बाद दुधवा जंगल के वैज्ञानिक अध्ययन में पाया गया कि यहां का वन क्षेत्र गैंडों के लिए बेहद अनुकूल है।
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यहां 14 प्रजातियों की वे वनस्पतियां प्रचुर मात्रा में पाई जाती हैं, जिन्हें गैंडे बेहद चाव से खाते हैं। इसे देखते हुए गैंडों को फिर से उनके पुरखों की धरती पर बसाने के लिए गैंडा पुनर्वासन योजना बनाई गई।
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चार गैंडों के बदले नेपाल को दिए गए थे 16 हाथी
वर्ष 1984 में असम के नौगांव जिले के जंगल से तीन मादा गैंडा पावित्री, सहेली, आशा और दो नर गैंडों बांके व राजू को दुधवा लाया गया। इन्हें एक अप्रैल 1984 को दुधवा के ककरहा जंगल में करीब 28 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के सौर ऊर्जा चालित बाड़ में छोड़ा गया। इनमें दो मादा गैंडा गर्भवती थीं। इनमें सहेली की 12 अप्रैल और आशा की 31 जुलाई 1984 को मौत हो गई। दुधवा में गैंडों की वंशबेल बढ़ाने के लिए अप्रैल 1985 में नेपाल के चितवन नेशनल पार्क से चार मादा गैंडों नारायणी, राप्ती, हिमरानी और स्वयंवरा को लाकर इसी घर में रखा गया। भारत ने इन चार गैंडों के बदले नेपाल को 16 हाथी दिए थे। पिछले 39 साल में इन गैंडों का कुनबा तेजी से बढ़ा है। मंद प्रजनन और कई खतरों के बीच अब यहां इन गैंडों की संख्या 46 हो गई है।

वर्ष 2018 में गैंडा पुनर्वासन योजना फेज-2 को मिला आकार
अंत: प्रजनन से उत्पन्न होने वाले आनुवंशिक दोष और प्रणय संघर्ष के खतरों से निपटने के लिए वर्ष 2018 में गैंडा पुनर्वासन योजना फेज-2 को आकार दिया गया। दरअसल गैंडों में प्रणय संघर्ष की घटनाएं ज्यादा होती हैं। असम से लाया गया नर गैंडा बांके किसी अन्य नर गैंडे को मादा के पास फटकने नहीं देता था। इस गैंडा परिवार के अधिकतर सदस्य बांके की संतान हैं। इससे आनुवंशिक बीमारियों और नस्ल कमजोर होने का खतरा बढ़ रहा था। इसे देखते हुए दुधवा नेशनल पार्क के ही बेलरायां रेंज में 14 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र को सौर उर्जा चालित बाड़ से घेर कर नेपोलियन नाम के नर और तीन मादा गैंडों को इसमें रखा गया। पांच साल में इस घर में गैंडा परिवार में सदस्यों की संख्या चार से बढ़ कर छह हो गई है।

अब सौर उर्जा चालित बाड़ से जंगल में स्वच्छंद विचरण की ओर गैंडे
करीब चालीस साल तक सौर उर्जा चालित बाड़ में रहकर अपनी वंश वृद्धि करने वाले गैंडों को क्रमबद्ध ढंग से जंगल में स्वच्छंद विचरण के लिए आजाद करने की तैयारी शुरू कर दी गई है। पहले चरण में चार गैंडों को रेडियो कॉलर लगाकर जंगल में छोड़ा जाएगा। इसमें एक या दो नर गैंडे और दो मादा गैंडा शामिल होंगी। इसके साथ ही कतर्नियाघाट जंगल में गैंडों को नया घर देने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। गैंडों को जंगल में आजाद करने का काम इसी साल होना है।


दुधवा टाइगर रिजर्व की आबोहवा गैंडों के लिए बेहद अनुकूल है। यही कारण है कि गैंडे अपने पुरखों की धरती पर फल फूल रहे हैं। अब जल्दी ही इन गैंडों को क्रमबद्ध ढंग से सौर ऊर्जा चालित बाड़ से आजाद कर स्वच्छंद विचरण के लिए जंगल में छोड़ा जाएगा। इसके लिए जरूरी तैयारियां शुरू कर दी गई हैं।
-ललित कुमार वर्मा, फील्ड डायरेक्टर, दुधवा टाइगर रिजर्व
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