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पालननाथ मंदिर : मनौती पूरी होने पर यहां भगवान भोलेनाथ को चढ़ाए जाते हैं झाड़ू और बैंगन; ये है मान्यता

Sun, 20 Aug 2023 04:33 PM IST
मुकेश कुमार संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी Published by: मुकेश कुमार Updated Sun, 20 Aug 2023 04:33 PM IST
सार

लखीमपुर खीरी जिले में महाभारत काल के कई ऐतिहासिक और पौराणिक शिव मंदिर है। ऐसे शिव मंदिरों में एक है पालननाथ शिव मंदिर। ऐतिहासिक गांव बड़खर से करीब पांच किलोमीटर दूर स्थित इस प्राचीन मंदिर का निर्माण महाभारत काल में पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान कराया था।

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Devotees offer broom and brinjal to Lord Shiva in Palannath temple in Lakhimpur Kheri
पालननाथ मंदिर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

महाभारत की गाथा का एक महत्वपूर्ण अंश लखीमपुर खीरी से भी जुड़ा है। पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान यहां कई शिवलिंग स्थापित किए। इनमें से पालगांव में स्थित पालननाथ शिवलिंग भी है। पालगांव में होने के कारण इस प्राचीन शिवलिंग का नाम पालननाथ शिव मंदिर पड़ा। मनौती पूरी होने पर यहां श्रद्धालु भगवान भोलनाथ को झाड़ू और बैंगन अर्पित करते हैं। 

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कौरवों से जुए में हारने के बाद पांडवों को 12 वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास भोगना पड़ा था। पांडवों ने अपना अज्ञातवास राजा विराट के राज्य में बिताया था। आज का बड़खर गांव महाभारतकाल में राजा विराट के साम्राज्य का हिस्सा हुआ करता था। इसका नाम विराटनगर था, जो बिगड़ते-बिगड़ते बड़खर हो गया। 
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अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने यहां कई शिवलिंग स्थापित किए। ऐतिहासिक पालननाथ शिवलिंग भी पांडवों ने स्थापित किया था। मंदिर पहले छोटी ककई ईंट का बना हुआ। वर्ष 2000 में मोहम्मदी के ओमकार पुरी ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था।

Devotees offer broom and brinjal to Lord Shiva in Palannath temple in Lakhimpur Kheri
पालननाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग - फोटो : अमर उजाला

आज भी मौजूद हैं प्राचीन खंडहर, तालाब 

पालगांव में मंदिर बना होने के कारण इसका नाम पालननाथ मंदिर पड़ा है। यहां से पांच किमी दूर बड़खर गांव है जहां राजा विराट की नगरी होने के प्रमाण मिलते हैं। वहां महाभारत काल के खंडहर, तालाब, पोखर आज भी मौजूद हैं। किवदंती है कि विराटनगर के निकट आकर पांडवों ने एक कुंए के निकट स्थित पेड़ पर अपने अस्त्र-शस्त्र टांग दिए इसके बाद पांडवों ने शिव का ध्यान कर नगर में प्रवेश किया।

अज्ञातवास पूर्ण होने पर यहां स्थित एक सरोवर में अपने अस्त्र शस्त्र धोए। मंदिर के पुजारी प्रमोद गिरी कहते हैं पहले हमारे पिता पूजा अर्चना करते थे। उनके निधन के बाद वह जिम्मेदारी संभाले हुए हैं। वह कहते हैं कि कभी किसी का पशु बीमार होता है तो मंदिर के ताक पर नमक रख देते हैं अगले दिन बीमार पड़े पशु को नमक खिलाने से पशु ठीक हो जाता है। 

मोहम्मदी बरवर मार्ग पर चार किलोमीटर दूर स्थित इस प्राचीन मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहां मनौती मानने से मस्से ठीक हो जाते हैं। मनौती पूरी होने पर श्रद्धालु अमावस्या को मंदिर में आकर झाड़ू और बैंगन चढ़ाते हैं। 

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