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पापों से मुक्ति दिलाता है ऋषि पंचमी व्रत आज
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पं रामदेव मिश्र शास्त्री।
- फोटो : LAKHIMPUR
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गोला गोकर्णनाथ। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष पंचमी तिथि (रविवार) को ऋषि पंचमी का त्योहार विधि-विधान से मनाया जाएगा। हरतालिका के दूसरे दिन होने वाला ऋषि पंचमी को सप्तर्षियों की पूजा करने से महिलाओं को रजस्वला दोष और पापों से मुक्ति मिलती है।
ज्योतिषाचार्य पंडित रामदेव मिश्र शास्त्री ने बताया कि इस बार पंचमी की तिथि 22 अगस्त की शाम 7:57 पर लग रही है यह तिथि 23 अगस्त को शाम 5:04 बजे तक रहेगी। वहीं पूजन का मुहूर्त 23 अगस्त को सुबह 11:06 से दोपहर 1:41 तक रहेगा। महिलाएं सरोवर, नदी, तीर्थ पर स्नान कर पूजा करती हैं। मान्यता है कि महाभारत काल में उत्तरा के गर्भ पर अश्वत्थामा के प्रहार से उसका गर्भ नष्ट हो गया था इस कारण उत्तरा द्वारा इस व्रत को किया गया जिसके बाद उसका गर्भ पुन: जीवित हुआ। हस्तिनापुर को राजा परीक्षित के रूप में उत्तराधिकारी मिला। राजा परीक्षित अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र थे उन्हें जन्म मिलने के कारण गर्भ में ही द्विज कहा जाता है। इस प्रकार इस व्रत को करने से उत्तरा गर्भपात के दोष से मुक्त हो गई थी। यह पर्व महिलाओं को संतान एवं सुख, सौभाग्य प्रदान करने वाला है। साथ ही महिलाएं रजस्वला दोष से भी मुक्त होती है।
पूजन विधि
महिलाएं सप्तर्षियों की मूर्ति बनाकर ऋषि पंचमी की पूजा करती हैं। पहले श्री गणेश की पूजा की जाती है उसके बाद महिलाएं ऋषि पंचमी की कथा का श्रवण कर ब्राह्मणों को दान दक्षिणा देकर व्रत का पारण करती हैं। इस पर्व पर साफ-सफाई और पवित्रता का पूरा ध्यान रखा जाता है।
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ज्योतिषाचार्य पंडित रामदेव मिश्र शास्त्री ने बताया कि इस बार पंचमी की तिथि 22 अगस्त की शाम 7:57 पर लग रही है यह तिथि 23 अगस्त को शाम 5:04 बजे तक रहेगी। वहीं पूजन का मुहूर्त 23 अगस्त को सुबह 11:06 से दोपहर 1:41 तक रहेगा। महिलाएं सरोवर, नदी, तीर्थ पर स्नान कर पूजा करती हैं। मान्यता है कि महाभारत काल में उत्तरा के गर्भ पर अश्वत्थामा के प्रहार से उसका गर्भ नष्ट हो गया था इस कारण उत्तरा द्वारा इस व्रत को किया गया जिसके बाद उसका गर्भ पुन: जीवित हुआ। हस्तिनापुर को राजा परीक्षित के रूप में उत्तराधिकारी मिला। राजा परीक्षित अभिमन्यु और उत्तरा के पुत्र थे उन्हें जन्म मिलने के कारण गर्भ में ही द्विज कहा जाता है। इस प्रकार इस व्रत को करने से उत्तरा गर्भपात के दोष से मुक्त हो गई थी। यह पर्व महिलाओं को संतान एवं सुख, सौभाग्य प्रदान करने वाला है। साथ ही महिलाएं रजस्वला दोष से भी मुक्त होती है।
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पूजन विधि
महिलाएं सप्तर्षियों की मूर्ति बनाकर ऋषि पंचमी की पूजा करती हैं। पहले श्री गणेश की पूजा की जाती है उसके बाद महिलाएं ऋषि पंचमी की कथा का श्रवण कर ब्राह्मणों को दान दक्षिणा देकर व्रत का पारण करती हैं। इस पर्व पर साफ-सफाई और पवित्रता का पूरा ध्यान रखा जाता है।
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