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सामूहिक हत्याकांड में तीन आरो पियो को उम्रकैद
अमर उजाला ब्यूरो लखीमपुर खीरी।
Updated Mon, 21 Aug 2017 10:56 PM IST
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- फोटो : अमर उजाला
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18 साल बाद फैसला, दो आरोपी को पांच-पांच साल का कठोर कारावास
दलित मां बेटे की ताबड़तोड़ गोलियां चलाकर हत्या करने के मामले में अपर जिला जज लालता प्रसाद ने तीन हत्याभियुक्तों को दोषसिद्ध पाते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। जबकि दो हत्याभियुक्तों को मारपीट बलवा और हंगामा करने के मामले में दोषसिद्ध करते हुए पांच-पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई है।
अभियोजन पक्ष रखते हुए सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता कफील अहमद अंसारी ने बताया कि ईसानगर थाना क्षेत्र के हसनपुर कटौली के मजरा मक्कापुरवा में 25 जुलाई 1999 की रात साढ़े नौ बजे गांव के ही मलखान सिंह अपने साथियों के साथ अद्धी और बंदूक से लैस होकर राधेश्याम पासी के मकान के पास बने मंदिर के पास बवाल कर रहे थे। सामूहिक रूप से गालियां देने के साथ ही यह लोग फायरिंग भी कर रहे थे, जिसके छर्रे पास पड़ोस में भी गिर रहे थे। आरोप है जब पड़ोसी मुखिया पासी ने विरोध किया तो मलखान सिंह, मालदार सिंह और सुरेश पंडित ने उसे गालियां देने के बाद गोली मार दी, मुखिया गिर कर तड़पने लगा। इस बीच बेटे को बचाने के लिए उसकी मां महदेई आई तो हत्यारों ने महदेई को भी गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया। दोहरे हत्याकांड के बाद जब ग्रामीण आक्रोशित होने लगे तो अभियुक्तों ने राधेश्याम के मकान के पास गली को घेर लिया और उस दौरान जो भी निकला उसकी लाठी डंडों से पिटाई की और जातिसूचक गालियां दीं।
18 साल बाद आया फैसला
अपर जिला जज लालता प्रसाद ने मामले की बारीकी से सुनवाई करते हुए शनिवार को ही पांचों हत्यारोपियों को न्यायिक अभिरक्षा में ले लिया था, सोमवार को सजा के बिंदु पर सुनवाई के बाद अपना फैसला सुनाया जिसमें मलखान, मालदार सिंह और सुरेश पंडित को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है जबकि उनका साथ देने वाले कनछेद सिंह, और राजकिशोर सिंह को मारपीट बलवा और दलित उत्पीडन के मामले में दोषी पाते हुए पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है।
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फरार हो गया था हत्यारोपी
25 जुलाई 1999 में हुई इस संगीन वारदात की सुनवाई के लिए जब पांचों हत्यारोपियों के खिलाफ सुनवाई शुरू हुई थी इसी बीच हत्यारोपियों को हाईकोर्ट से जमानत मिल गई थी, बताते है कि इसी दौरान जब खिलाफ गवाही पड़ने लगी तो एक हत्यारोपी फरार हो गया था जिसके बाद फाइल की सुनवाई अटक गई, आखिरकार अदालत ने सरकार बनाम राजकिशोर और सरकार बनाम मलखान सिंह के नाम से फाइल अलग कर सुनवाई शुरू की, लेकिन कुछ सालों बाद जब फरार हत्यारोपी पुलिस की हिरासत में पहुंचा तो फिर से गवाही शुरू हो गई, लिहाजा दो बार गवाही पड़ने के कारण साल दर साल गुजरते चले गए।
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दलित मां बेटे की ताबड़तोड़ गोलियां चलाकर हत्या करने के मामले में अपर जिला जज लालता प्रसाद ने तीन हत्याभियुक्तों को दोषसिद्ध पाते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। जबकि दो हत्याभियुक्तों को मारपीट बलवा और हंगामा करने के मामले में दोषसिद्ध करते हुए पांच-पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई है।
अभियोजन पक्ष रखते हुए सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता कफील अहमद अंसारी ने बताया कि ईसानगर थाना क्षेत्र के हसनपुर कटौली के मजरा मक्कापुरवा में 25 जुलाई 1999 की रात साढ़े नौ बजे गांव के ही मलखान सिंह अपने साथियों के साथ अद्धी और बंदूक से लैस होकर राधेश्याम पासी के मकान के पास बने मंदिर के पास बवाल कर रहे थे। सामूहिक रूप से गालियां देने के साथ ही यह लोग फायरिंग भी कर रहे थे, जिसके छर्रे पास पड़ोस में भी गिर रहे थे। आरोप है जब पड़ोसी मुखिया पासी ने विरोध किया तो मलखान सिंह, मालदार सिंह और सुरेश पंडित ने उसे गालियां देने के बाद गोली मार दी, मुखिया गिर कर तड़पने लगा। इस बीच बेटे को बचाने के लिए उसकी मां महदेई आई तो हत्यारों ने महदेई को भी गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया। दोहरे हत्याकांड के बाद जब ग्रामीण आक्रोशित होने लगे तो अभियुक्तों ने राधेश्याम के मकान के पास गली को घेर लिया और उस दौरान जो भी निकला उसकी लाठी डंडों से पिटाई की और जातिसूचक गालियां दीं।
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18 साल बाद आया फैसला
अपर जिला जज लालता प्रसाद ने मामले की बारीकी से सुनवाई करते हुए शनिवार को ही पांचों हत्यारोपियों को न्यायिक अभिरक्षा में ले लिया था, सोमवार को सजा के बिंदु पर सुनवाई के बाद अपना फैसला सुनाया जिसमें मलखान, मालदार सिंह और सुरेश पंडित को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है जबकि उनका साथ देने वाले कनछेद सिंह, और राजकिशोर सिंह को मारपीट बलवा और दलित उत्पीडन के मामले में दोषी पाते हुए पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है।
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फरार हो गया था हत्यारोपी
25 जुलाई 1999 में हुई इस संगीन वारदात की सुनवाई के लिए जब पांचों हत्यारोपियों के खिलाफ सुनवाई शुरू हुई थी इसी बीच हत्यारोपियों को हाईकोर्ट से जमानत मिल गई थी, बताते है कि इसी दौरान जब खिलाफ गवाही पड़ने लगी तो एक हत्यारोपी फरार हो गया था जिसके बाद फाइल की सुनवाई अटक गई, आखिरकार अदालत ने सरकार बनाम राजकिशोर और सरकार बनाम मलखान सिंह के नाम से फाइल अलग कर सुनवाई शुरू की, लेकिन कुछ सालों बाद जब फरार हत्यारोपी पुलिस की हिरासत में पहुंचा तो फिर से गवाही शुरू हो गई, लिहाजा दो बार गवाही पड़ने के कारण साल दर साल गुजरते चले गए।