1857 की क्रांति का गवाह है औरंगाबाद का स्मृति स्तंभ
औरंगाबाद-बरबर मार्ग पर क्रांतिकारियों ने दमनकारी अंग्रेजों को मौत के घाट उतारा
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ब्रिटिश सरकार की बनवाई इस इमारत में वर्तमान में ईसाई समुदाय करता है प्रार्थना
लखीमपुर खीरी। मितौली तहसील के अंतर्गत औरंगाबाद-बरबर मार्ग पर स्थिति स्मृति स्तंभ 1857 की क्रांति का महत्वपूर्ण गवाह है। पांच जून 1857 को यहीं पर क्रांतिकारियों ने 16 अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया था। मारे गए अंग्रेज अधिकारियों की याद में ब्रिटिश सरकार ने इस स्तंभ का निर्माण कराया था। ईसाई समुदाय के लोग आज भी यहां प्रार्थना करते हैं।
मेरठ से चले क्रांतिकारियों ने जब 30 मई 1857 को शाहजहांपुर पर कब्जा कर लिया था तो मोहम्मदी में रह रहे अंग्रेज डर गए थे और वह चार जून 1857 को मोहम्मदी से भाग कर सीतापुर की ओर रवाना हुए थे। पहली रात उन्होंने बरबर में गुजारी, लेकिन पांच जून 1857 की सुबह जब वह बरबर से सीतापुर की ओर चले तो देश को स्वतंत्र करवाने के लिये प्रतिज्ञाबद्ध क्रांतिकारी अपने को नहीं रोक सके। औरंगाबाद के पास 16 अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया था। मारे गए अंग्रेज अधिकारियों नाम स्मृति स्तंभ पर आज भी अंकित हैं। आज भी ब्रिटेन से लोग यहां पर अपने पूर्वजों की याद ताजा करने के लिए आते हैं।
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जिला मुख्यालय से करीब 47 किलोमीटर दूर औरंगाबाद का यह स्मारक ऑर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) द्वारा संरक्षित है।
19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में बना था स्मारक
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय बनवाया गया यह स्मृति स्तंभ काफी खूबसूरत और साफ सुथरा है। यहां भरपूर हरियाली भी है। स्मारक चौड़ी पक्की ईंटों से बना है, जिसका प्रवेश द्वार पूर्वोत्तर दिशा में है। सामने एक गेट है, जिससे 20 मीटर बायीं और बाग है, जिसमें क्रॉस का चिन्ह बना हुआ है। दाहिनी ओर ईसाई मतावलंबियों के निवास स्थान हैं। प्रवेश द्वार के बाद 15 फुट पक्के पथ पर चलने के पश्चात यह स्मारक है। इसका वास्तुशिल्प आकर्षक है। तीन सीढ़ियां चढ़ने के बाद 6 फुट लंबा और 6 फुट चौड़ा वर्गाकार पक्का चबूतरा है, जिस पर इसका निर्माण हुआ है। यहां बीच-बीच में चूड़ीदार गोल पक्के घेरे बने हुए हैं, जिन पर यहां मारे गए अंग्रेजों के नाम लिखे हैं।
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16 अंग्रेजों को क्रांतिकारियों को उतारा था मौत के घाट
स्मृति स्तंभ पर जिन मारे गए अंग्रेज सैनिकों के नाम लिखे हैं, उनमें जेम्सवांट थॉमसन, चार्ल्स जॉन जेकिंग्स, हेनरी बिलडर लेंब, स्नेडू कॉ
र्निलियस, लेसाट, श्रीमती लेसाट, मनी सेलमेन लेंट सिसेशियर, श्रीमती परेय और उनके बच्चे, मिस्टर विलियम विलवेट, शेयर जॉर्ज विलियम, रदर फार्ड, थॉमस जॉन केरे, स्पेनेड, ईसी स्मार्ट, बवाटर मास्टर सार्जंट, ग्रांट अलैक्जेंडर के, मेरी के कॉलिन, अलेक्जैंड रॉबर्टसन, चॉर्ल्स के डेरिक स्कॉट, श्रीमती स्कॉर्ट और कुमारी स्कॉर्ट शामिल हैं। ये लोग यहां दफन हैं। स्मारक की वास्तु शिल्प को थो और स्टे नाम के वास्तुशिल्पियों ने तैयार की थी।
स्रोत - आजादी के बाद सूचना एवं जनसंपर्क विभाग उत्तर प्रदेश द्वारा प्रकाशित पुस्तक स्वाधीनता संग्राम में जिला खीरी के योगदान में क्रांतिकारियों द्वारा अंग्रेजों के मारे जाने और यहां पर स्मारक बनाए जाने का उल्लेख किया गया है।
स्मारक के केयरटेकर हैरिसन विक्टर बताते हैं कि वर्ष में एक बार यहां कैथेड्रेल चर्च से लोग आते हैं। तब यहां मारे गए सैनिकों की याद में चर्च में प्रार्थना की जाती है।
हमारे दादा-परदादा बताया करते थे कि यहां पर अंग्रेज अधिकारी परिवार सहित निकल रहे थे, जिनको क्रांतिकारियों ने घेरकर मौत के घाट उतार दिया था और उनका खजाना लूट ले गए थे। यहां पर अंग्रेज आते हैं, लेकिन दिन पर दिन उनकी संख्या अब कम होती जा रही है। कारण यह है कि मारे गए अंग्रेजों की तीसरी, चौथी या पांचवीं पीढ़ी इन दिनों दुनिया में होगी, जिसे न तो अपने पुरखों की याद होगी और न ही उन्हें उसके इतिहास की कोई जानकारी। - पीटर, केयरटेकर
औरंगाबाद स्मृति स्तंभ एएसआई के द्वारा 22 दिसंबर 1920 से संरक्षित और स्वामित्व में है। इसे इस साल और विकसित करने की योजना है। प्रोटेक्शन नोटिस बोर्ड वहां पहले से ही लगा है। कल्चरल नोटिस बोर्ड बनाया जा रहा है, इससे लोग इसके बारे में अधिक जान सकेंगे और पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। डायरेक्शन बोर्ड लगाकर सड़क मार्ग से ही पर्यटन के लिए लोगों को आकर्षित करने की योजना है। - राम वृक्ष, कनिष्ठ संरक्षण सहायक, एएसआई, लखनऊ मंडल
ब्रिटिश सरकार की बनवाई इस इमारत में वर्तमान में ईसाई समुदाय करता है प्रार्थना लखीमपुर खीरी। मितौली तहसील के अंतर्गत औरंगाबाद-बरबर मार्ग पर स्थिति स्मृति स्तंभ 1857 की क्रांति का महत्वपूर्ण गवाह है। पांच जून 1857 को यहीं पर क्रांतिकारियों ने 16 अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया था। मारे गए अंग्रेज अधिकारियों की याद में ब्रिटिश सरकार ने इस स्तंभ का निर्माण कराया था। ईसाई समुदाय के लोग आज भी यहां प्रार्थना करते हैं।
मेरठ से चले क्रांतिकारियों ने जब 30 मई 1857 को शाहजहांपुर पर कब्जा कर लिया था तो मोहम्मदी में रह रहे अंग्रेज डर गए थे और वह चार जून 1857 को मोहम्मदी से भाग कर सीतापुर की ओर रवाना हुए थे। पहली रात उन्होंने बरबर में गुजारी, लेकिन पांच जून 1857 की सुबह जब वह बरबर से सीतापुर की ओर चले तो देश को स्वतंत्र करवाने के लिये प्रतिज्ञाबद्ध क्रांतिकारी अपने को नहीं रोक सके। औरंगाबाद के पास 16 अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया था। मारे गए अंग्रेज अधिकारियों नाम स्मृति स्तंभ पर आज भी अंकित हैं। आज भी ब्रिटेन से लोग यहां पर अपने पूर्वजों की याद ताजा करने के लिए आते हैं।
जिला मुख्यालय से करीब 47 किलोमीटर दूर औरंगाबाद का यह स्मारक ऑर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) द्वारा संरक्षित है।
19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में बना था स्मारक
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के समय बनवाया गया यह स्मृति स्तंभ काफी खूबसूरत और साफ सुथरा है। यहां भरपूर हरियाली भी है। स्मारक चौड़ी पक्की ईंटों से बना है, जिसका प्रवेश द्वार पूर्वोत्तर दिशा में है। सामने एक गेट है, जिससे 20 मीटर बायीं और बाग है, जिसमें क्रॉस का चिन्ह बना हुआ है। दाहिनी ओर ईसाई मतावलंबियों के निवास स्थान हैं। प्रवेश द्वार के बाद 15 फुट पक्के पथ पर चलने के पश्चात यह स्मारक है। इसका वास्तुशिल्प आकर्षक है। तीन सीढ़ियां चढ़ने के बाद 6 फुट लंबा और 6 फुट चौड़ा वर्गाकार पक्का चबूतरा है, जिस पर इसका निर्माण हुआ है। यहां बीच-बीच में चूड़ीदार गोल पक्के घेरे बने हुए हैं, जिन पर यहां मारे गए अंग्रेजों के नाम लिखे हैं।16 अंग्रेजों को क्रांतिकारियों को उतारा था मौत के घाट
स्मृति स्तंभ पर जिन मारे गए अंग्रेज सैनिकों के नाम लिखे हैं, उनमें जेम्सवांट थॉमसन, चार्ल्स जॉन जेकिंग्स, हेनरी बिलडर लेंब, स्नेडू कॉर्निलियस, लेसाट, श्रीमती लेसाट, मनी सेलमेन लेंट सिसेशियर, श्रीमती परेय और उनके बच्चे, मिस्टर विलियम विलवेट, शेयर जॉर्ज विलियम, रदर फार्ड, थॉमस जॉन केरे, स्पेनेड, ईसी स्मार्ट, बवाटर मास्टर सार्जंट, ग्रांट अलैक्जेंडर के, मेरी के कॉलिन, अलेक्जैंड रॉबर्टसन, चॉर्ल्स के डेरिक स्कॉट, श्रीमती स्कॉर्ट और कुमारी स्कॉर्ट शामिल हैं। ये लोग यहां दफन हैं। स्मारक की वास्तु शिल्प को थो और स्टे नाम के वास्तुशिल्पियों ने तैयार की थी।
स्रोत - आजादी के बाद सूचना एवं जनसंपर्क विभाग उत्तर प्रदेश द्वारा प्रकाशित पुस्तक स्वाधीनता संग्राम में जिला खीरी के योगदान में क्रांतिकारियों द्वारा अंग्रेजों के मारे जाने और यहां पर स्मारक बनाए जाने का उल्लेख किया गया है।
स्मारक के केयरटेकर हैरिसन विक्टर बताते हैं कि वर्ष में एक बार यहां कैथेड्रेल चर्च से लोग आते हैं। तब यहां मारे गए सैनिकों की याद में चर्च में प्रार्थना की जाती है।
हमारे दादा-परदादा बताया करते थे कि यहां पर अंग्रेज अधिकारी परिवार सहित निकल रहे थे, जिनको क्रांतिकारियों ने घेरकर मौत के घाट उतार दिया था और उनका खजाना लूट ले गए थे। यहां पर अंग्रेज आते हैं, लेकिन दिन पर दिन उनकी संख्या अब कम होती जा रही है। कारण यह है कि मारे गए अंग्रेजों की तीसरी, चौथी या पांचवीं पीढ़ी इन दिनों दुनिया में होगी, जिसे न तो अपने पुरखों की याद होगी और न ही उन्हें उसके इतिहास की कोई जानकारी। - पीटर, केयरटेकर
औरंगाबाद स्मृति स्तंभ एएसआई के द्वारा 22 दिसंबर 1920 से संरक्षित और स्वामित्व में है। इसे इस साल और विकसित करने की योजना है। प्रोटेक्शन नोटिस बोर्ड वहां पहले से ही लगा है। कल्चरल नोटिस बोर्ड बनाया जा रहा है, इससे लोग इसके बारे में अधिक जान सकेंगे और पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। डायरेक्शन बोर्ड लगाकर सड़क मार्ग से ही पर्यटन के लिए लोगों को आकर्षित करने की योजना है। - राम वृक्ष, कनिष्ठ संरक्षण सहायक, एएसआई, लखनऊ मंडल