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Lakhimpur Kheri News: कौए घटे तो पितरों के भोग की परंपरा भी बदली
Sun, 04 Oct 2026 11:12 PM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
Updated Sun, 04 Oct 2026 11:12 PM IST
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अनीता मिश्रा। संवाद।
बांकेगंज। पितृपक्ष आते ही घरों की मुंडेर पर नजरें कौओं को तलाशने लगती हैं। मान्यता है कि श्राद्ध का भोग कौए को खिलाने से पितरों तक पहुंचता है, लेकिन इस बार भी कई घरों की मुंडेर पर कांव-कांव सुनाई नहीं दे रही।
कौए कम हुए तो लोगों ने भी पितरों का भोग गाय और कुत्तों को देना शुरू कर दिया है। पर्यावरणविद् भी कौओं की घटती संख्या को लेकर चिंतित हैं। पितृपक्ष में श्राद्ध के दौरान गाय, कुत्ते और कौए का भाग निकालने की परंपरा आदि काल से चली आ रही है।
ज्योतिषाचार्य पं. रामेदव मिश्र शास्त्री ने बताया कि कौए को भोग लगाने की परंपरा प्राचीन धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी है। पिछले कुछ वर्षों में कौवों की संख्या कम हुई है, लेकिन इससे लोगों की आस्था और परंपरा प्रभावित नहीं हुई है।
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पर्यावरणविद् एवं पूर्व रेंजर अशोक कुमार कश्यप ने बताया कि कौआ प्रकृति में गिद्ध के बाद दूसरी श्रेणी का सफाई कर्मी माना जाता है। यह हानिकारक कीड़े-मकोड़े खाता है और शाकाहारी व मांसाहारी दोनों है। पिछले दो दशक में इनकी संख्या में काफी गिरावट आई है। पक्षी वैज्ञानिकों के अनुसार, इस अवधि में कौवों की संख्या करीब 70 फीसदी कम हुई है। संवाद
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घरों में चूहेमार दवा से कौवों की भी शामत
डीटीआर के पशु चिकित्सक एवं पक्षी विशेषज्ञ डॉ. दयाशंकर ने बताया कि घरों में चूहों को मारने के लिए चूहेमार दवा का इस्तेमाल होता है। मरने के बाद चूहों को सड़क या कूड़े के ढेर में फेंक दिया जाता है। इन्हीं मृत चूहों का मांस खाने से कौवे भी मर रहे हैं। उनका कहना है कि पर्यावरण संतुलन में कौवों की विशेष भूमिका है।
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पितृपक्ष में पितरों के लिए निमित्त भोजन निकालती हूं। कौए कम दिख रहे हैं। इसलिए अब यह भोजन गाय और कुत्ते को देना पड़ता है।
-अनीता मिश्रा, बांकेगंज
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अब कौए दिखाई ही नहीं देते। ऐसे में पितरों का भोजन छत पर रख देती हैं, ताकि कोई पक्षी, चींटी या जीव-जंतु उसे खा सके।
-बिटोला देवी, अमीननगर
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कौवों का पर्यावरण संतुलन में विशेष महत्व है। यह गिद्धों की भांति प्रकृति का सफाई कर्मी माना जाता है। इनकी संख्या में गिरावट के चलते कौवों के संरक्षण और संवर्धन के हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं।
-डॉ. एच राजामोहन, एफडी, दुधवा टाइगर रिजर्व
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कौए कम हुए तो लोगों ने भी पितरों का भोग गाय और कुत्तों को देना शुरू कर दिया है। पर्यावरणविद् भी कौओं की घटती संख्या को लेकर चिंतित हैं। पितृपक्ष में श्राद्ध के दौरान गाय, कुत्ते और कौए का भाग निकालने की परंपरा आदि काल से चली आ रही है।
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ज्योतिषाचार्य पं. रामेदव मिश्र शास्त्री ने बताया कि कौए को भोग लगाने की परंपरा प्राचीन धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी है। पिछले कुछ वर्षों में कौवों की संख्या कम हुई है, लेकिन इससे लोगों की आस्था और परंपरा प्रभावित नहीं हुई है।
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पर्यावरणविद् एवं पूर्व रेंजर अशोक कुमार कश्यप ने बताया कि कौआ प्रकृति में गिद्ध के बाद दूसरी श्रेणी का सफाई कर्मी माना जाता है। यह हानिकारक कीड़े-मकोड़े खाता है और शाकाहारी व मांसाहारी दोनों है। पिछले दो दशक में इनकी संख्या में काफी गिरावट आई है। पक्षी वैज्ञानिकों के अनुसार, इस अवधि में कौवों की संख्या करीब 70 फीसदी कम हुई है। संवाद
घरों में चूहेमार दवा से कौवों की भी शामत
डीटीआर के पशु चिकित्सक एवं पक्षी विशेषज्ञ डॉ. दयाशंकर ने बताया कि घरों में चूहों को मारने के लिए चूहेमार दवा का इस्तेमाल होता है। मरने के बाद चूहों को सड़क या कूड़े के ढेर में फेंक दिया जाता है। इन्हीं मृत चूहों का मांस खाने से कौवे भी मर रहे हैं। उनका कहना है कि पर्यावरण संतुलन में कौवों की विशेष भूमिका है।
पितृपक्ष में पितरों के लिए निमित्त भोजन निकालती हूं। कौए कम दिख रहे हैं। इसलिए अब यह भोजन गाय और कुत्ते को देना पड़ता है।
-अनीता मिश्रा, बांकेगंज
अब कौए दिखाई ही नहीं देते। ऐसे में पितरों का भोजन छत पर रख देती हैं, ताकि कोई पक्षी, चींटी या जीव-जंतु उसे खा सके।
-बिटोला देवी, अमीननगर
कौवों का पर्यावरण संतुलन में विशेष महत्व है। यह गिद्धों की भांति प्रकृति का सफाई कर्मी माना जाता है। इनकी संख्या में गिरावट के चलते कौवों के संरक्षण और संवर्धन के हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं।
-डॉ. एच राजामोहन, एफडी, दुधवा टाइगर रिजर्व

अनीता मिश्रा। संवाद।

अनीता मिश्रा। संवाद।