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छोटे से जंगल में बढ़ रहे बाघ, खेत बन रहे निवास

Thu, 21 Jun 2018 12:37 AM IST
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,लखीमपुर खीरी
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,लखीमपुर खीरी Updated Thu, 21 Jun 2018 12:37 AM IST
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Now farms becoming habitat for tigers
दक्षिण खीरी वन प्रभाग के मोहम्मदी रेंज के सुंदरपुर गांव में 35 वर्षीय किसान बालकराम की बाघ हमले में मौत के बाद ग्रामीणों का गुस्सा और वनकर्मियों पर जानलेवा हमले की घटना को देखते हुए रेंजर मोहम्मदी एसएन यादव ने मानव-वन्यजीव संघर्ष के मद्देनजर बाघ को पकड़े जाने की संस्तुति डीएफओ को भेजी है। रेंजर ने अपने पत्र में पिछले एक साल के अंदर इस क्षेत्र में हुईं घटनाओं का हवाला भी दिया है। डीएफओ साउथ समीर वर्मा ने भी रेंजर की रिपोर्ट पर बाघ पकड़े जाने की सिफारिश आगे बढ़ाने की बात कही है।
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करीब 2200 हेक्टेयर क्षेत्रफल के मोहम्मदी रेंज जंगल का फैलाव कुछ इस तरह है कि साहबगंज समेत कई गांव पूरी तरह जंगल से घिरे हुए हैं। चारों तरफ जंगल से सटकर खेती हो रही है। इस छोटे से जंगल मेें पांच से छह बाघों की मौजूदगी की पुष्टि हो रही है। एक बाघ को अपनी टेरीटरी बनाने के लिए कम से कम 10 वर्ग किलोमीटर की जगह चाहिए। बाघ का होम रेंज इससे बड़ा क्षेत्र होता है। ऐसे में बाघों का जंगल से निकलकर गन्ने के खेतों में अपनी टेरीटरी बनाना स्वाभाविक है। आंवला जंगल से होकर बहने वाली कठिना नदी जहां किसानों की लाइफ लाइन है, वहीं वन्यजीवों की प्यास बुझाने का भी एक मात्र जरिया है। ऐसे में कठिना नदी किनारे बाघों की सक्रियता पूरे साल बनी रहती है।
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मोहम्मदी रेंज के इस जंगल में बाघों के भोजन के रूप में हिरन, जंगली सुअर आदि शाकाहारी वन्यजीवों की संख्या भी पर्याप्त नहीं है। ऐसे में बाघों को आवारा जानवरों और नीलगायों पर आश्रित रहना पड़ रहा है, जो उन्हें खेतों में ही उपलब्ध हैं। इसके चलते मोहम्मदी जंगल के बाहर खेतों में अधिक बाघ दिखाई पड़ते हैं जो ग्रामीणों के लिए दहशत का सबब बनें हैं।
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मोहम्मदी जंगल में सबसे ज्यादा होती है घुसपैठ
मोहम्मदी रेंज के इस जंगल में सबसे ज्यादा इंसानी दखलंदाजी है। घास, फूस, जलौनी लकड़ी और छप्पर के लिए थुनिया थंबर जुटाने के लिए लोग जंगल का सहारा लेते हैं। इसके अलावा मवेशी चराने, जंगल से शहद निकालने के लिए भी लोग जंगल में जाते हैं। इससे बाघों और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास में खलल पड़ता है।

शिकार की घटनाओं से खत्म होते जा रहें हैं वन्यजीव
जंगल के किनारे बसे गांव के लोग अवैध शराब बनाने का भी धंधा करते हैं। मौका पाकर वे हिरन, खरगोश आदि वन्यजीवों को मारकर उसका मांस खा जाते हैं। इससे शाकाहारी वन्यजीवों की संख्या यहां खत्म होती जा रही है। हालात यह बनते जा रहे हैं कि भविष्य में बाघ और इंसानों के बीच संघर्ष की घटनाओं में और इजाफा हो सकता है।

कठिना का कछार रहा है बाघों का सैरगाह
कठिना का किनारा हमेशा से बाघों का सैरगाह रहा है। यहां 1980 के लगभग कठिना नदी किनारे सक्रिय एक बाघिन ने कई लोगों को निवाला बनाया था। जिसके बाद उसे आदमखोर घोषित कर दिया गया था और उसे गोली मारी गई थी। इसके बाद काफी दिनों तक लोगों को बाघ हमलों की घटनाओं से राहत मिली थी। अब पिछले दो साल से इस नदी के किनारे के क्षेत्र में ही बाघ पांच लोगों को अपना निवाला बना चुका है।


मोहम्मदी रेंजर ने बाघों के बढ़ते हमलों और ग्रामीणों में बढ़ती नाराजगी को देखते हुए बाघ पकड़वाने की संस्तुति की है। मै अपनी संस्तुति के साथ इसे विभागाध्यक्ष को भेज रहा हूं। उनके निर्णय के अनुसार कार्रवाई की जाएगी। कैमरों के जरिए भी बाघ की लोकेशन पर नजर रखी जा रही है। - समीर कुमार वर्मा, डीएफओ, साउथ खीरी
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