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राजा बेन की सात कन्याओं के नाम होता है कन्या भोज
Updated Thu, 28 Sep 2017 12:12 AM IST
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राजा बेन की सात कन्याओं के नाम होता है कन्या भोज
- फोटो : लखीमपुर खीरी, अमर उजाला
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बिजुआ/लखीमपुर खीरी।
तराई क्षेत्र प्राचीन काल से शक्ति उपासना का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां नवरात्र में सात कन्याओं को कुमारी भोज कराने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। आम तौर से देवी के नौ स्वरूपों की पूजा होती है, लेकिन सात ही कन्याओं को भोज कराने की परंपरा है। इसके पीछे की कथा इस जिले से जुड़ी हुई है। इस प्राचीन परंपरा को महाभारत कालीन राजा बेन की सात कन्याओं से जोड़ा जाता है, जो देवी के रूप में तराई क्षेत्र के विभिन्न स्थानों पर स्थापित और पूजित हैं।
महाभारत कालीन राजा बेन का साम्राज्य नेपाल से लेकर पीलीभीत जिले के देहुआ नदी के बाएं किनारे से गोमती नदी के बाएं किनारे के समस्त भूभाग और सीताप्ुर जिले हरगांव तक फैला था। खीरी जिले का डिस्ट्रिक्ट गजेटियर भी इस बात की पुष्टि करता है। राजा बेन के सात पुत्रियां और पुत्र विराट हुए। पांडवों ने 12 वर्ष के वनवास के बाद एक वर्ष का अज्ञातवास राजा विराट के साम्राज्य में बिताया था। इसके प्रमाण मोहम्मदी तहसील के बलमियां बरखर में मिलते हैं। वहां महाभारत कालीन टीले, सरोवर और मंदिर पांडवों के अज्ञातवास के साक्षी हैं।
राजा बेन की पत्नी मां भगवती की परम भक्त थीं। उनकी भक्ति और उपासना से प्रसन्न होकर देवी ने उनके यहां सात कन्याओं के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया था। कालांतर में रानी के गर्भ से सात कन्याओं का जन्म हुआ। यह कन्याएं देवी रूप में तराई क्षेत्र के विभिन्न स्थानों पर स्थापित होकर देवी के रूप में पूजित हैं।
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लखीमपुर में संकटादेवी, शीतला देवी, वंकटा देवी, नैमिषारण्य की ललिता देवी, गोला की मंगला देवी और उत्तराखंड की मां मंसा देवी, मां पूर्णागिरि देवी राजा बेन की ही देवी स्वरूपा कन्याएं मानी जाती हैं और इन्हीं के नाम से सात कन्याओं को भोजन कराने की परंपरा प्रचलित है।
खीरी जिले के ब्लॉक बिजुआ में शाहपुर नामक गांव के पास महाभारत कालीन राजा बेन का महल और किला था। राजा बेन ने अपने महल/किले के पास ही सुंदर और विशाल सरोवर बनवाया था। सरोवर के बीच मुख्य मंदिर था, जो क्षरित हो चुका है उसके खंभे और अवशेष आज भी इधर-उधर बिखरे पड़े हैं। मान्यता है कि राजा बेन ने अपनी पुत्रियों के स्नान के लिए इस मंदिर का निर्माण कराया था। जिस सरोवर में कभी असंख्य कमल खिला करते थे उसमें अब जलकुंभी फैली नजर आती है। सरोवर के बड़े हिस्से पर अवैध कब्जे हो चुका है।
तालाब किनारे एक छोटा सा देवी मंदिर है। बताते हैं कि कभी यहां भव्य मंदिर था। इसके क्षरित होने के बाद स्थानीय लोगों ने उसी जगह एक छोटा सा मंदिर बना दिया है। सरोवर के पूरब में एक ऊंचा टीला है, जो गइाईनाथ मंदिर और सरोवर के बीच पड़ता है। बताते हैं कि इसी टीले के नीचेे राजा बेन के महल के खंडहर दबे हुए हैं। सरोवर के पूरब दो पुराने मठ और चबूतरे बने हुए हैं, जिन्हें राजा बेन और उनकी रानी की समाधियां कहा जाता है। वर्ष 1998 में तालाब तक जाने के लिए बाबा भिखारी लाल राना ने एक पुल बनवाया था। तालाब में एक कुंआ भी है, जो जलकुंभी के कारण अब दिखाई नहीं देता।
टीले का रूप ले चुके राजा बेन के महल और किले के खंडहर अब शारदा नदी की कटान की जद में आ चुके हैं। शारदा इस टीले और सरोवर से महज 200 मीटर की दूरी तक पहुंच गई है। यदि शारदा के कटान की यही गति रही तो आने वाले समय में महाभारत काल के राजा बेन के अवशेष शारदा में समा जाएंगे।
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तराई क्षेत्र प्राचीन काल से शक्ति उपासना का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां नवरात्र में सात कन्याओं को कुमारी भोज कराने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। आम तौर से देवी के नौ स्वरूपों की पूजा होती है, लेकिन सात ही कन्याओं को भोज कराने की परंपरा है। इसके पीछे की कथा इस जिले से जुड़ी हुई है। इस प्राचीन परंपरा को महाभारत कालीन राजा बेन की सात कन्याओं से जोड़ा जाता है, जो देवी के रूप में तराई क्षेत्र के विभिन्न स्थानों पर स्थापित और पूजित हैं।
महाभारत कालीन राजा बेन का साम्राज्य नेपाल से लेकर पीलीभीत जिले के देहुआ नदी के बाएं किनारे से गोमती नदी के बाएं किनारे के समस्त भूभाग और सीताप्ुर जिले हरगांव तक फैला था। खीरी जिले का डिस्ट्रिक्ट गजेटियर भी इस बात की पुष्टि करता है। राजा बेन के सात पुत्रियां और पुत्र विराट हुए। पांडवों ने 12 वर्ष के वनवास के बाद एक वर्ष का अज्ञातवास राजा विराट के साम्राज्य में बिताया था। इसके प्रमाण मोहम्मदी तहसील के बलमियां बरखर में मिलते हैं। वहां महाभारत कालीन टीले, सरोवर और मंदिर पांडवों के अज्ञातवास के साक्षी हैं।
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राजा बेन की पत्नी मां भगवती की परम भक्त थीं। उनकी भक्ति और उपासना से प्रसन्न होकर देवी ने उनके यहां सात कन्याओं के रूप में जन्म लेने का वरदान दिया था। कालांतर में रानी के गर्भ से सात कन्याओं का जन्म हुआ। यह कन्याएं देवी रूप में तराई क्षेत्र के विभिन्न स्थानों पर स्थापित होकर देवी के रूप में पूजित हैं।
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लखीमपुर में संकटादेवी, शीतला देवी, वंकटा देवी, नैमिषारण्य की ललिता देवी, गोला की मंगला देवी और उत्तराखंड की मां मंसा देवी, मां पूर्णागिरि देवी राजा बेन की ही देवी स्वरूपा कन्याएं मानी जाती हैं और इन्हीं के नाम से सात कन्याओं को भोजन कराने की परंपरा प्रचलित है।
खीरी जिले के ब्लॉक बिजुआ में शाहपुर नामक गांव के पास महाभारत कालीन राजा बेन का महल और किला था। राजा बेन ने अपने महल/किले के पास ही सुंदर और विशाल सरोवर बनवाया था। सरोवर के बीच मुख्य मंदिर था, जो क्षरित हो चुका है उसके खंभे और अवशेष आज भी इधर-उधर बिखरे पड़े हैं। मान्यता है कि राजा बेन ने अपनी पुत्रियों के स्नान के लिए इस मंदिर का निर्माण कराया था। जिस सरोवर में कभी असंख्य कमल खिला करते थे उसमें अब जलकुंभी फैली नजर आती है। सरोवर के बड़े हिस्से पर अवैध कब्जे हो चुका है।
तालाब किनारे एक छोटा सा देवी मंदिर है। बताते हैं कि कभी यहां भव्य मंदिर था। इसके क्षरित होने के बाद स्थानीय लोगों ने उसी जगह एक छोटा सा मंदिर बना दिया है। सरोवर के पूरब में एक ऊंचा टीला है, जो गइाईनाथ मंदिर और सरोवर के बीच पड़ता है। बताते हैं कि इसी टीले के नीचेे राजा बेन के महल के खंडहर दबे हुए हैं। सरोवर के पूरब दो पुराने मठ और चबूतरे बने हुए हैं, जिन्हें राजा बेन और उनकी रानी की समाधियां कहा जाता है। वर्ष 1998 में तालाब तक जाने के लिए बाबा भिखारी लाल राना ने एक पुल बनवाया था। तालाब में एक कुंआ भी है, जो जलकुंभी के कारण अब दिखाई नहीं देता।
टीले का रूप ले चुके राजा बेन के महल और किले के खंडहर अब शारदा नदी की कटान की जद में आ चुके हैं। शारदा इस टीले और सरोवर से महज 200 मीटर की दूरी तक पहुंच गई है। यदि शारदा के कटान की यही गति रही तो आने वाले समय में महाभारत काल के राजा बेन के अवशेष शारदा में समा जाएंगे।