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इंसानों से ज्यदा तो खतरे में हैं तराई के बाघ....
Updated Mon, 05 Nov 2018 06:52 PM IST
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इंसानों से ज्यादा तो खतरे में हैं तराई के बाघ
बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष के बीच बाघों की सुरक्षा बनी चुनौती
वन विभाग न चेता तो भविष्य में हो सकते हैं गंभीर परिणाम
अमर उजाला ब्यूरो
बांकेगंज। दुधवा टाइगर रिजर्व और दक्षिण खीरी वन प्रभाग में मानव-वन्यजीव संघर्ष की बढ़ती घटनाओं के बीच एक साल के अंदर बाघ पर हमले की दो घटनाओं से तराई के बाघ खतरे में नजर आ रहे हैं। चलतुआ में रविवार किसान को मारने वाले बाघ को गुस्साई भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला। इस घटना से वन्यजीव प्रेमी और और बाघ संरक्षण में लगा वन विभाग सकते में है। इसमें कहीं न कहीं वनाधिकारियों की अनुभवहीनता और लापरवाही भी जाहिर होती है।
तराई इलाके में गन्ने का उत्पादन बढ़ने के साथ ही बाघों का जंगल से निकलकर खेतों में आने का जो सिलसिला शुरू हुआ है, उससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हुई है। किशनपुर सेंक्चुरी जंगल के अंदर चलतुआ गांव के पास मारा गया बाघ पिछले दस दिनों से सक्रिय था। वन विभाग लगातार उसकी निगरानी में लगा था, लेकिन 26 अक्टूबर को चलतुआ गांव से सटे गन्ने खेत में छिपे बैठे बाघ द्वारा 24 वर्षीय युवक पर हमले के बाद वन विभाग उसकी लोकेशन ही ट्रेस करता रह गया और रविवार दोपहर बाघ के दूसरे हमले में किसान देवानंद की मौत से गुस्साए ग्रामीणों ने उसे न केवल ढूंढ निकाला बल्कि गांव से सटे जंगल की झाड़ियों में छिपे बैठे बाघ को पीट-पीटकर मार भी डाला। इससे पहले भी दुधवा टाइगर रिजर्व बफरजोन के दक्षिण निघासन रेंज में सहतेपुरवा गांव में भी एक बाघिन ग्रामीणों के गुस्से का शिकार हुई थी। ग्रामीणों ने उसे पीट-पीटकर अधमरा कर दिया था। हालांकि बाद में उसे किसी तरह बचा लिया गया।
इंसेट.....
...तो और भी बाघ हो सकते हैं ग्रामीणों के गुस्से का शिकार
बाघों की सुरक्षा के प्रति वन विभाग का यही लापरवाह रवैया रहा तो दक्षिण खीरी वन प्रभाग के मोहम्मदी रेंज, पलिया-संपूर्णानगर रोड पर मंहगापुर, भीरा-किशनुपर सेंक्चुरी बार्डर के शीशमबोझी इलाके में आबादी के निकट सक्रिय बाघ भी खतरे में पड़ सकते हैं। मोहम्मदी रेंज में तो हाल ही में बाघ हमले के बाद ग्रामीणों का गुस्सा फूट चुका है। वहां बाघ तो ग्रामीणों के हत्थे नहीं चढ़ा लेकिन पांच वनकर्मी ग्रामीणों के गुस्से का शिकार हुए। गुस्साए ग्रामीणों ने मोहम्मदी रेंज कार्यालय में भारी तोड़फोड़ करने के बाद उसमें आग लगा दी थी।
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इंसेट.....
बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष का कारण खोजने की जरूरत
राज्य वन्यजीव सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य और वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. वीपी सिंह का कहना हैँ कि मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने के लिए सबसे पहले मौजूदा परिस्थितियों और कारणों को समझना होगा। मानव और वन्यजीवों के बीच कम हो रही मैत्री भावना आपसी सामंजस्य फिर से स्थापित करने की जरूरत है। जंगल कम होना, बाघों का प्राकृतिक आवास और जंगल से सट कर हो रही गन्ने की खेती से बाघों के स्वभाव आ रहे बदलाव के अध्ययन की जरूरत है। इसके लिए रिटायर्ड और अनुभवी वनाधिकारियों और वन कर्मियों की मदद ली जानी चाहिए।
वर्जन.....
चलतुआ गांव में बाघ के सक्रिय होते ही उसकी निगरानी कराई गई। लगातार यह प्रयास किए गए कि बाघ आबादी की तरफ न बढ़ने पाए। बाघ लगातार निगरानी टीमों को चकमा देता रहा। इंसानों और बाघ की सुरक्षा के प्रयासों में कहीं कोई लापरवाही नहीं बरती गई। चलतुआ गांव किशनपुर सेंक्चुरी के कोर जोन के पास बसा है। वहां बाघों की गतिविधियां अस्वाभाविक नहीं है।
महावीर कौजलगि, उपनिदेशक, दुधवा नेशनल पार्क
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बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष के बीच बाघों की सुरक्षा बनी चुनौती
वन विभाग न चेता तो भविष्य में हो सकते हैं गंभीर परिणाम
अमर उजाला ब्यूरो
बांकेगंज। दुधवा टाइगर रिजर्व और दक्षिण खीरी वन प्रभाग में मानव-वन्यजीव संघर्ष की बढ़ती घटनाओं के बीच एक साल के अंदर बाघ पर हमले की दो घटनाओं से तराई के बाघ खतरे में नजर आ रहे हैं। चलतुआ में रविवार किसान को मारने वाले बाघ को गुस्साई भीड़ ने पीट-पीट कर मार डाला। इस घटना से वन्यजीव प्रेमी और और बाघ संरक्षण में लगा वन विभाग सकते में है। इसमें कहीं न कहीं वनाधिकारियों की अनुभवहीनता और लापरवाही भी जाहिर होती है।
तराई इलाके में गन्ने का उत्पादन बढ़ने के साथ ही बाघों का जंगल से निकलकर खेतों में आने का जो सिलसिला शुरू हुआ है, उससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हुई है। किशनपुर सेंक्चुरी जंगल के अंदर चलतुआ गांव के पास मारा गया बाघ पिछले दस दिनों से सक्रिय था। वन विभाग लगातार उसकी निगरानी में लगा था, लेकिन 26 अक्टूबर को चलतुआ गांव से सटे गन्ने खेत में छिपे बैठे बाघ द्वारा 24 वर्षीय युवक पर हमले के बाद वन विभाग उसकी लोकेशन ही ट्रेस करता रह गया और रविवार दोपहर बाघ के दूसरे हमले में किसान देवानंद की मौत से गुस्साए ग्रामीणों ने उसे न केवल ढूंढ निकाला बल्कि गांव से सटे जंगल की झाड़ियों में छिपे बैठे बाघ को पीट-पीटकर मार भी डाला। इससे पहले भी दुधवा टाइगर रिजर्व बफरजोन के दक्षिण निघासन रेंज में सहतेपुरवा गांव में भी एक बाघिन ग्रामीणों के गुस्से का शिकार हुई थी। ग्रामीणों ने उसे पीट-पीटकर अधमरा कर दिया था। हालांकि बाद में उसे किसी तरह बचा लिया गया।
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...तो और भी बाघ हो सकते हैं ग्रामीणों के गुस्से का शिकार
बाघों की सुरक्षा के प्रति वन विभाग का यही लापरवाह रवैया रहा तो दक्षिण खीरी वन प्रभाग के मोहम्मदी रेंज, पलिया-संपूर्णानगर रोड पर मंहगापुर, भीरा-किशनुपर सेंक्चुरी बार्डर के शीशमबोझी इलाके में आबादी के निकट सक्रिय बाघ भी खतरे में पड़ सकते हैं। मोहम्मदी रेंज में तो हाल ही में बाघ हमले के बाद ग्रामीणों का गुस्सा फूट चुका है। वहां बाघ तो ग्रामीणों के हत्थे नहीं चढ़ा लेकिन पांच वनकर्मी ग्रामीणों के गुस्से का शिकार हुए। गुस्साए ग्रामीणों ने मोहम्मदी रेंज कार्यालय में भारी तोड़फोड़ करने के बाद उसमें आग लगा दी थी।
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इंसेट.....
बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष का कारण खोजने की जरूरत
राज्य वन्यजीव सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य और वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ. वीपी सिंह का कहना हैँ कि मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने के लिए सबसे पहले मौजूदा परिस्थितियों और कारणों को समझना होगा। मानव और वन्यजीवों के बीच कम हो रही मैत्री भावना आपसी सामंजस्य फिर से स्थापित करने की जरूरत है। जंगल कम होना, बाघों का प्राकृतिक आवास और जंगल से सट कर हो रही गन्ने की खेती से बाघों के स्वभाव आ रहे बदलाव के अध्ययन की जरूरत है। इसके लिए रिटायर्ड और अनुभवी वनाधिकारियों और वन कर्मियों की मदद ली जानी चाहिए।
वर्जन.....
चलतुआ गांव में बाघ के सक्रिय होते ही उसकी निगरानी कराई गई। लगातार यह प्रयास किए गए कि बाघ आबादी की तरफ न बढ़ने पाए। बाघ लगातार निगरानी टीमों को चकमा देता रहा। इंसानों और बाघ की सुरक्षा के प्रयासों में कहीं कोई लापरवाही नहीं बरती गई। चलतुआ गांव किशनपुर सेंक्चुरी के कोर जोन के पास बसा है। वहां बाघों की गतिविधियां अस्वाभाविक नहीं है।
महावीर कौजलगि, उपनिदेशक, दुधवा नेशनल पार्क