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लोकरंग के बहाने परम्पराओं को सहेजने की कोशिश
कुश्ाीनगर (ब्यूरो)
Updated Fri, 13 Apr 2018 12:06 AM IST
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दीवार पर भित्ति चित्र बनाते कलाकार।
- फोटो : कुश्ाीनगर ब्यूरो
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तुर्कपट्टी। विलुप्त हो रही भारतीय संस्कृति और परम्परा को पश्चिमीकरण तथा फूहड़पन से बचाने की जद्दोजहद करता लोकरंग कार्यक्रम शुक्रवार की रात जोगिया गांव में शुरू हो जाएगा। इस बार भोजपुरी के क्रांतिकारी कवि रमाकांत द्विवेदी रमता की जन्मशती के बहाने उनके सामाजिक और राजनीतिक चेतना को चिंतन के लिए चुना गया है। वहीं मुंशी प्रेमचंद के नाटक बड़े भाईसाहब के जरिए किशोर वय बच्चों की शिक्षा, भतृत्व प्रेम और जिम्मेदारी के साथ अंग्रेजियत और अनुशासन को रेखांकित करने का प्रयास होगा।
भारतीय संस्कृति को आदिकाल से जीवंत बनाए रखने में यहां की लोक कलाओं का बड़ा योगदान है। बीते दस वर्षों से इन विलुप्त हो रही लोक कलाओं के संरक्षण और भारतीय संस्कृति के क्षरण को अपना विषय मानने वाले जोगिया के लोकरंग महोत्सव में इस बार भोजपुरी के कवि रमता के गीत ऽराजनीति सबके बुझे बुझावे के परी , हमरी देशवा के नया रचइया होऽ के बहाने सामाजिक सरोकार और भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य को रेखांकित करेगा। लोकरंग के बहाने भारतीय परम्परा के सबसे मजबूत स्तम्भ संयुक्त परिवार की परिकल्पना पर भी बात होगी। इसके अलावा अपनी कहानियों के लिए हिंदी साहित्य के शिरोमणि कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद का एक अप्रचलित नाटक बड़े भाई साहब का मंचन होगा। इस नाटक का एक किशोर अपने भाई की अंग्रेजी शिक्षा, बड़े भाई के अधिकार और शिक्षा की अनिवार्यता को प्रदर्शित करेगा।
भारतीय सभ्यता, संयुक्त परिवार, अनुशासन, शिक्षा और बढ़ती अंग्रेजियत के केन्द्र बिंदु में विलुप्त हो रही भारतीय संस्कृति को ढूंढने की कोशिश होगी। विलुप्त हो रहे कठपुतली नृत्य, राजस्थान का भवई , घूमर और बणमारी नृत्य, मालवा और वर्षा नृत्य को पुनर्जीवित करने की कोशिश भी दिखेगी। इतिहास के पन्नों में समाहित हो चुके बिहार का सुप्रसिद्ध गोउठा नृत्य के बहाने भोजपुरी फूहड़ गीत और नृत्य को खारिज करने के लिए कलाकार अपनी प्रस्तुति देंगे। भारतीय संस्कृति के प्रमुख अंग रहा लोकगायन कार्यक्रम को ऊंचाई देगा। लोकगायन से ही कार्यक्रम का आगाज कर कहीं न कहीं तेज म्यूजिक के मुकाबले लोकगायकी के मिठास की बात की जाएगी। शायद यही कारण है कि कार्यक्रम में निर्गुण के साथ सूफी कौव्वाली को भी स्थान दिया गया है। गिरमिटिया गायन, नेटुआ गायन, राजस्थानी लोक गायन, फकीरी गायन आदि विलुप्त हो रही गायन परम्परा को आयोजित कर नई पीढ़ी को भारतीय लोक परम्पराओं से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा । बढ़ती वैचारिक भिन्नता और संवाद को लेकर इस बार का लोकरंग खासा चिंतित है। देश के कोने कोने से जुट रहे रंगकर्मी, साहित्यकार सामाजिकता के निर्माण में लोक नाट्यों की भूमिका के विचार मंथन से यह बताने की कोशिश करेंगे कि हमारी लोक नाट्य परंपरा देश की परंपरा और संस्कृति से कितनी प्रभावित थी।
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भारतीय संस्कृति को आदिकाल से जीवंत बनाए रखने में यहां की लोक कलाओं का बड़ा योगदान है। बीते दस वर्षों से इन विलुप्त हो रही लोक कलाओं के संरक्षण और भारतीय संस्कृति के क्षरण को अपना विषय मानने वाले जोगिया के लोकरंग महोत्सव में इस बार भोजपुरी के कवि रमता के गीत ऽराजनीति सबके बुझे बुझावे के परी , हमरी देशवा के नया रचइया होऽ के बहाने सामाजिक सरोकार और भारतीय राजनीति के वर्तमान परिदृश्य को रेखांकित करेगा। लोकरंग के बहाने भारतीय परम्परा के सबसे मजबूत स्तम्भ संयुक्त परिवार की परिकल्पना पर भी बात होगी। इसके अलावा अपनी कहानियों के लिए हिंदी साहित्य के शिरोमणि कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद का एक अप्रचलित नाटक बड़े भाई साहब का मंचन होगा। इस नाटक का एक किशोर अपने भाई की अंग्रेजी शिक्षा, बड़े भाई के अधिकार और शिक्षा की अनिवार्यता को प्रदर्शित करेगा।
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भारतीय सभ्यता, संयुक्त परिवार, अनुशासन, शिक्षा और बढ़ती अंग्रेजियत के केन्द्र बिंदु में विलुप्त हो रही भारतीय संस्कृति को ढूंढने की कोशिश होगी। विलुप्त हो रहे कठपुतली नृत्य, राजस्थान का भवई , घूमर और बणमारी नृत्य, मालवा और वर्षा नृत्य को पुनर्जीवित करने की कोशिश भी दिखेगी। इतिहास के पन्नों में समाहित हो चुके बिहार का सुप्रसिद्ध गोउठा नृत्य के बहाने भोजपुरी फूहड़ गीत और नृत्य को खारिज करने के लिए कलाकार अपनी प्रस्तुति देंगे। भारतीय संस्कृति के प्रमुख अंग रहा लोकगायन कार्यक्रम को ऊंचाई देगा। लोकगायन से ही कार्यक्रम का आगाज कर कहीं न कहीं तेज म्यूजिक के मुकाबले लोकगायकी के मिठास की बात की जाएगी। शायद यही कारण है कि कार्यक्रम में निर्गुण के साथ सूफी कौव्वाली को भी स्थान दिया गया है। गिरमिटिया गायन, नेटुआ गायन, राजस्थानी लोक गायन, फकीरी गायन आदि विलुप्त हो रही गायन परम्परा को आयोजित कर नई पीढ़ी को भारतीय लोक परम्पराओं से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा । बढ़ती वैचारिक भिन्नता और संवाद को लेकर इस बार का लोकरंग खासा चिंतित है। देश के कोने कोने से जुट रहे रंगकर्मी, साहित्यकार सामाजिकता के निर्माण में लोक नाट्यों की भूमिका के विचार मंथन से यह बताने की कोशिश करेंगे कि हमारी लोक नाट्य परंपरा देश की परंपरा और संस्कृति से कितनी प्रभावित थी।
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