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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Kushinagar News ›   There is no need to drive the vehicle on trial track, pay five thousand rupees, get the certificate.

Kushinagar News: ट्रायल ट्रैक न वाहन चलाने की है जरूरत, पांच हजार रुपये दीजिए, प्रमाणपत्र लीजिए

Tue, 03 Oct 2023 01:36 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर Updated Tue, 03 Oct 2023 01:36 AM IST
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There is no need to drive the vehicle on trial track, pay five thousand rupees, get the certificate.
घर और दुकान में चल रहा है कार ड्राइविंग ट्रेनिंग स्कूल
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ट्रैक न वाहन प्रशिक्षण देने का तय है कोई रूट, कागज में चल रहे चार स्कूल

संवाद न्यूज एजेंसी

सिद्धार्थनगर। प्रशिक्षित हाथों में वाहन की स्टेयरिंग हो और बढ़ते हुए सड़क हादसे रुकें। इसके लिए परिवहन विभाग की ओर से ड्राइविंग ट्रेनिंग स्कूल चलाने के लिए लाइसेंस दिया गया है। जिससे प्रशिक्षित व्यक्ति ही वाहन चलाए। लेकिन इन स्कूलों में प्रशिक्षण देने के बजाए डिग्री बांटी जा रही है। बस आपको रुपये देने की जरूरत है। कार से लेकर पोखलेंड तक का प्रमाणपत्र मिल जाएगा। सोमवार को जब ट्रेनिंग स्कूलों की पड़ताल की गई तो चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई। न तो स्कूल दिखा और न ही ट्रायल के लिए
कोई निश्चित स्थान। दुकान और मकान में यह संचालित होते हुए पाए गए। तीन स्थानों पर देखा गया, जहां दो के पास बोर्ड लिखा हुुआ मिला। जबकि एक तो जनसेवा केंद्र में संचालित होता हुआ पाया गया। यहां पर बोर्ड भी नहीं मिले। अब यहां से प्रशिक्षित होने का प्रमाणपत्र लेकर जाने वाले वाहन की स्टेयरिंग पकड़ेंगे तो क्या होगा। यह आसानी से समझ सकते हैं। कुल मिलाकर रुपये का खेल है। रुपये दीजिए और प्रमाणपत्र लीजिए। लोगों का कहना है कि यह अप्रत्यक्ष रूप से परिवहन विभाग के वसूली का अड्डा है। क्योंकि प्रमाणपत्र के हिसाब से धनराशि तय होती है।
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चार पहिया वाहन का स्टेयरिंग पकड़ने से पहले ही व्यक्ति प्रशिक्षित हो, इसके लिए शासन की ओर से व्यवस्था की गई है कि वाहन ट्रेनिंग स्कूल खोला जाए। जहां पर वाहन चलाने में चालक पारंगत हो जाए। उसे कुशल चालक का प्रमाणपत्र दिया जाए। ड्राइविंग ट्रेनिंग स्कूल के संचालन के लिए लाइसेंस देने की जिम्मेदारी परिवहन विभाग के जिम्मे सौंपा गया है। लेकिन यहां प्रशिक्षण कम प्रमाणपत्र जारी करने का खेल खूब चल रहा है। न तो स्कूल है और न ही ट्रायल के लिए ट्रैक, लेकिन कागज की गाड़ी दौड़ रही और उस पर सवार होकर लोग प्रशिक्षित हो रहे हैं। आरटीओ में किसी दलाल से मिलिए वह आपके काम को आसान बना देगा। बस चढ़ावा चढ़ाने की जरूरत है। यह गलत नहीं सोलह आना सच है। क्योंकि पड़ताल में यह हकीकत सामने आई।
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बर्डपुर बाजार के पास चलने वाले एक ड्राइविंग ट्रेनिंग स्कूल के संचालक से एक युवक ने पूछा कि वाहन चलाने का प्रशिक्षण कितने दिन में पूरा होगा और कितनी फीस देनी पड़ेगी। इस संचालक ने कहा कि कार का 20 दिन 3500 रुपये, जेसीबी एक माह 10 हजार और पोखलैंड एक माह 25 हजार रुपये लगेगा। तब युवक ने कहा कि अगर बिना प्रशिक्षण के प्रमाणपत्र लेना हो तो। तक संचालक बोला कि आधारकार्ड औैर दो फोटो दीजिए, एक सप्ताह में प्रमाणपत्र ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड हो जाएगा। इसके बाद जानकारी मिली की कस्बे में एक और ड्राइविंग ट्रेनिंग स्कूल संचालित हो रहा है। ढूंढते हुए वहां पहुंचे तो एक दुकान पर बोर्ड लगा हुआ था। दुकान पर बैठे संचालक से बात हुई तो उसने पहले वाले की तरह रेट बताया। जब ट्रैक के बारे में सवाल किया गया तो बोला सड़क पर सुबह चलवाते हैं। अगर नहीं चलाना है तो मात्र दो हजार रुपये में एक सप्ताह में लाइसेंस मिल जाएगा। यह थी दो स्कूलों की हकीकत। जहां चालक की मर्जी के ऊपर सब है। वह चाहे तो चलाए। अगर नहीं चाहता है तो रुपये दे और प्रमाण पत्र लेकर जाए। अब सवाल यह है कि विभाग इससे अनजान है या फिर सबकुछ उसकी जानकारी में चल रहा है।
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बोर्ड न सामने गाड़ी, कमरे में चल रहा स्कूल

नगर के कलक्ट्रेट के पास एक ड्राइविंग ट्रेनिंग स्कूल के संचालित होने की जानकारी थी। ढूंढते हुए किसी प्रकार से वहां तक पहुंचे तो यहां पर न तो बोर्ड लगा हुआ था और न ही प्रशिक्षण के लिए कोई गाड़ी दिखी। पूछने पर संचालक ने बताया कि केवल चार पहिया का प्रशिक्षण देते हैं। जेल के सामने ग्राउंड में सुबह बुलाते हैं। 15 दिन प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके एवज में पांच हजार रुपये शुल्क है। रुपये के साथ आधार कार्ड और फोटो चाहिए, काम हो जाएगा। जब यह पूछा गया कि अगर बिना चलाए प्रमाणपत्र की जरूरत हो
तो। फिर बोला पहले तैयार होकर आओ सबकी व्यवस्था है। वहीं बांसी कस्बे में भी एक पंजीकृत है।
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एक स्कूल लाइसेंस के रिन्यूअल में ठप

पहले से संचालित होने वाला एक स्कूल लाइसेंस रिन्यूअल न होने के कारण ठप पड़ा हुआ है। वह पिछले कई साल से संचालित हो रहा था। जेल रोड स्थित ग्राउंड में कार से लोगों को प्रशिक्षित कर रहा था। लेकिन स्कूल कहां खुला था और कैसे संचालित होता था। इसके बारे में किसी को पता नहीं चला। लोग एआरटीओ में दलाली करने वालों से नंबर पाते थे, उन्हीं के जरिए संपर्क होता था। लेकिन वह बंद चल रहा है।
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भारी वाहनों के लाइसेंस में होता है खेल

चार पहिया वाहन अगल की बात है, लेकिन भारी वाहनों के लाइसेंस में बड़ा खेल होता है। जिस कार्य के लिए शुल्क १००० एक रुपये है। उसके लिए 8000-10000 हजार रुपये तक ग्राहक का अदा करना पड़ता है। यह दलाल लेते हैं, उन्हीं के जरिये ऊपर से नीचे तक सब काम होता है। उनके बिना संपर्क में आए, गांव देहात का व्यक्ति चक्कर काटता रह जाता है। उसे सही जानकारी ही नहीं मिलती है।
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हाईवे पर होता है प्रशिक्षण

विभाग के मुताबिक वाहन चलाने का प्रशिक्षण ऐसी जगह पर होना चाहिए, जहां लोगों का आवागमन न हो रहा हो। क्योंकि प्रशिक्षण के दौरान गाड़ी पलटने और टकरा जाने का खतरा रहता है। क्योंकि सामने वाला सीख रहा होता है। जिससे हादसे न हो। लेकिन यहां पर कोई मानक नहीं है। अप्रशिक्षित चालक को हाईवे पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है। ऐसे में बड़ा हादसा होने से इनकार नहीं किया जा सकता है।
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बोले ट्रांसपोटर
बिना अनुभव की जानकारी हुए किसी को गाड़ी नहीं सौंपते हैं। क्योंकि एक बार हादसा हो गया तो सबकुछ चला जाएगा। नुकसान होने के साथ ही जमापूंजी चली जाएगी और केस ऊपर से झेलना पड़ेगा। इसलिए लाइसेंस, ड्राइविंग प्रशिक्षण प्रमाणपत्र और दूसरों के माध्यम से जानकारी लेने के बाद ही वाहन देते हैं।
-अब्बास रिजवी, मेल कानपुर ट्रांसपोर्टर

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मैं गाड़ियों को बुकिंग में चलवाने का काम करता हूं। कई गाड़ियां लखनऊ, कानपुर और लोकल में चलती हैं। लेकिन चालक के बारे में जानकारी होने के बाद ही उसे स्टेयरिंग देते हैं। क्योंकि अप्रशिक्षित व्यक्ति को गाड़ी देना जान जोखिम में डालने के बराबर है। कई बार फंसते-फंसते बचे हैं। इसलिए लाइसेंस, अनुभव प्रमाणपत्र और अन्य लोगों से कार्यकुशलता जान लेने के बाद ही वाहन चलाने के लिए देते हैं।

-सतीश रस्तोगी, बुकिंग पर गाड़ी चलवाने वाले संचालक

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समय-समय पर स्कूलों की जांच की जाती है। उनके रजिस्टर और कौन साधन रखने हैं। किस प्रकार से प्रशिक्षण देते हैं। इसके बारे में जांच की जाती है। खामियां मिलने पर सुधारने का निर्देश दिया जाता है।
-सुरेश कुमार, एआरटीओ सिद्धार्थनगर
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