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Kushinagar News: 250 वर्ष पुराना है मां बंचरा देवी का धाम, रामनवमी और दशहरे पर लगता है मेला
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रामनवमी और दशहरे पर लगता है विशाल मेला, शारदीय व चैत्र नवरात्र के दौरान श्रद्धालुओं की उमड़ती है भीड़
सुकरौली। क्षेत्र के बंचरा गांव में स्थित मां बंचरा देवी का प्राचीन मंदिर आस्था और परंपरा का प्रमुख केंद्र है। राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे सुकरौली और महुआरी से करीब छह किलोमीटर दक्षिण स्थित इस धाम में शारदीय व चैत्र नवरात्र के दौरान श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। माता के दरबार में शीश नवाकर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
क्षेत्र के बुजुर्गों के अनुसार, मंदिर का इतिहास सैकड़ों वर्ष पुराना है। करीब 250 वर्ष पहले घने जंगल के बीच बाबा मथुरानाथ ने कुटी स्थापित की थी। जनश्रुति है कि बाबा मां की कृपा से बाघ की सवारी करते थे। बाद में बाबा महावीरनाथ ने स्थानीय लोगों के सहयोग से मंदिर का निर्माण कराया। बाबा अवधबिहारी नाथ और बाबा राजेश नाथ के समय यहां प्रतिवर्ष यज्ञ व भंडारे की परंपरा आगे बढ़ी। वर्तमान महंत बाबा दीपक नाथ के नेतृत्व में भी हर साल यज्ञ आयोजित होता है।
समय के साथ स्थानीय लोगों ने आपसी सहयोग से मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। परिसर में मां की मनमोहक प्रतिमा के साथ अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी स्थापित हैं। श्रद्धालु नारियल, चुनरी, सिंदूर और कपूर अर्पित कर मन्नत मांगते हैं। आसपास के जनपदों के अलावा पड़ोसी राज्यों और नेपाल से भी भक्त यहां पहुंचते हैं। रामनवमी व दशहरे पर लगने वाला विशाल मेला इस धार्मिक स्थल की विशेष पहचान है। मंदिर के महंत बाबा दीपक नाथ ने बताया कि मां बंचरा देवी का धाम दशनामी गिरी संप्रदाय से जुड़ा सिद्धपीठ के रूप में प्रसिद्ध है। नवरात्र में भक्तों की संख्या बढ़ जाती है लेकिन वर्षभर श्रद्धालुओं का आवागमन बना रहता है।
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सुकरौली। क्षेत्र के बंचरा गांव में स्थित मां बंचरा देवी का प्राचीन मंदिर आस्था और परंपरा का प्रमुख केंद्र है। राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे सुकरौली और महुआरी से करीब छह किलोमीटर दक्षिण स्थित इस धाम में शारदीय व चैत्र नवरात्र के दौरान श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। माता के दरबार में शीश नवाकर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
क्षेत्र के बुजुर्गों के अनुसार, मंदिर का इतिहास सैकड़ों वर्ष पुराना है। करीब 250 वर्ष पहले घने जंगल के बीच बाबा मथुरानाथ ने कुटी स्थापित की थी। जनश्रुति है कि बाबा मां की कृपा से बाघ की सवारी करते थे। बाद में बाबा महावीरनाथ ने स्थानीय लोगों के सहयोग से मंदिर का निर्माण कराया। बाबा अवधबिहारी नाथ और बाबा राजेश नाथ के समय यहां प्रतिवर्ष यज्ञ व भंडारे की परंपरा आगे बढ़ी। वर्तमान महंत बाबा दीपक नाथ के नेतृत्व में भी हर साल यज्ञ आयोजित होता है।
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समय के साथ स्थानीय लोगों ने आपसी सहयोग से मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। परिसर में मां की मनमोहक प्रतिमा के साथ अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी स्थापित हैं। श्रद्धालु नारियल, चुनरी, सिंदूर और कपूर अर्पित कर मन्नत मांगते हैं। आसपास के जनपदों के अलावा पड़ोसी राज्यों और नेपाल से भी भक्त यहां पहुंचते हैं। रामनवमी व दशहरे पर लगने वाला विशाल मेला इस धार्मिक स्थल की विशेष पहचान है। मंदिर के महंत बाबा दीपक नाथ ने बताया कि मां बंचरा देवी का धाम दशनामी गिरी संप्रदाय से जुड़ा सिद्धपीठ के रूप में प्रसिद्ध है। नवरात्र में भक्तों की संख्या बढ़ जाती है लेकिन वर्षभर श्रद्धालुओं का आवागमन बना रहता है।
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