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निर्माण के लिए वस्तु, निर्वाण के लिए चित्त का परिवर्तन जरूरी : मोरारी बापू
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निर्माण के लिए वस्तु, निर्वाण के लिए चित्त का परिवर्तन जरूरी : मोरारी बापू
- रामकथा के आठवें दिन मानस निर्वाण की व्याख्या करते हुए कथा व्यास ने कहा, गृहस्थ को भी निर्वाण मिलता है और संन्यासी को भी
अमर उजाला ब्यूरो
कसया (कुशीनगर)। जब भी हम कोई नया निर्माण करते हैं तो उसके लिए नई-नई वस्तुओं की जरूरत होती है। वहीं निर्वाण के लिए वस्तु नहीं चित्त में परिवर्तन होना जरूरी है। जब यह महसूस होने लगे कि किसी वस्तु की आवश्यकता महसूस नहीं हो रही है तो वह निर्वाण की यात्रा है। गृहस्थ को भी निर्वाण मिलता है और संन्यासी को भी। यह भी संभव है दोनों को नहीं मिल भी मिल सकता है। यह निर्भर करता है विचारों में आए परिवर्तन पर।
ये बातें कुशीनगर में चल रही रामकथा के आठवें दिन कथा वाचक मोरारी बापू ने मानस निर्वाण की व्याख्या करते हुए कहीं। निर्वाण के लिए चित्त में परिवर्तन को जरूरी बताते हुए कथावाचक ने कहा कि जब तक मन में वस्तु के प्रति मोह है जैसे कि घर अच्छा हो, भोजन अच्छा हो आदि तब तक निर्वाण नहीं मिल सकता। अनुभव और अनुभूति के अंतर को समझना होगा। जब मन में इन भौतिक वस्तुओं की इच्छा खत्म होने लगे। जब भोजन केवल जीवन के लिए जरूरी लगे, तो समझना कि निर्वाण मिल सकता है। भगवान बुद्ध का उदाहरण सुनाते हुए मोरारी बापू ने कहा कि लंबे समय तक तपस्या के बाद भगवान बुद्ध ने भिक्षुणी सुजाता के घर खीर खाई थी। भक्तों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि भगवान ने खीर खाई लेकिन यह खीर के प्रति बुद्ध की आसक्ति नहीं थी। वे भोजन को केवल जीवन के लिए ईश्वर का प्रसाद मानकर ग्रहण करते थे। एक भक्त की चिट्ठी का उल्लेख करते हुए कहा कि लोग पूछते हैं कि गृहस्थ को निर्वाण कैसे मिलेगा।
इसका जवाब यह है कि गृहस्थ को सेवा करने से निर्वाण प्राप्त होगा। गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी जिसके मन में वैराग्य का भाव हो उसे निर्वाण मिलेगा। महर्षि वशिष्ठ और राजा जनक भी गृहस्थ आश्रम में थे लेकिन वे मन से वैरागी थे। वानप्रस्थी को वासना से मुक्त होने पर निर्वाण मिलेगा। न कर्म और न संख्या केवल त्याग से आत्मा में परिवर्तन आता है। भीड़ में भी तन्हाई और तन्हाई में भी भीड़ का अहसास साधु ही कर सकता है। तन्हाई भी एक प्रकार की साधना है। कुछ देर के लिए तन्हाई में बैठकर देखें। असीम शांति और आनंद की अनुभूति होगी। खुद को जानने का इससे बेहतर कोई माध्यम नहीं है। आदि गुरु शंकराचार्य ने भी द्वैत व अद्वैत की बात कही थी। रामचरित मानस में भी कहा गया कि जहां द्वैत है वहीं समस्याएं शुरू होती हैं। ओशो कहते हैं कि मंजिल पाने के बाद भी आगे बढ़ना गड्ढे में गिरने के समान है। जब मन में वैराग्य का भाव आता है तो व्यक्ति सार तत्व के समीप बैठता है। संस्कृत के एक श्लोक जिक्र करते हुए कहा कि जब लाभ-हानि, शुद्ध-अशुद्ध, द्वैत-अद्वैत का भेद मिट जाए और स्वर्ण भी मिट्टी समान प्रतीत होने लगे तो यह स्थिति निर्वाण की है।
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- रामकथा के आठवें दिन मानस निर्वाण की व्याख्या करते हुए कथा व्यास ने कहा, गृहस्थ को भी निर्वाण मिलता है और संन्यासी को भी
अमर उजाला ब्यूरो
कसया (कुशीनगर)। जब भी हम कोई नया निर्माण करते हैं तो उसके लिए नई-नई वस्तुओं की जरूरत होती है। वहीं निर्वाण के लिए वस्तु नहीं चित्त में परिवर्तन होना जरूरी है। जब यह महसूस होने लगे कि किसी वस्तु की आवश्यकता महसूस नहीं हो रही है तो वह निर्वाण की यात्रा है। गृहस्थ को भी निर्वाण मिलता है और संन्यासी को भी। यह भी संभव है दोनों को नहीं मिल भी मिल सकता है। यह निर्भर करता है विचारों में आए परिवर्तन पर।
ये बातें कुशीनगर में चल रही रामकथा के आठवें दिन कथा वाचक मोरारी बापू ने मानस निर्वाण की व्याख्या करते हुए कहीं। निर्वाण के लिए चित्त में परिवर्तन को जरूरी बताते हुए कथावाचक ने कहा कि जब तक मन में वस्तु के प्रति मोह है जैसे कि घर अच्छा हो, भोजन अच्छा हो आदि तब तक निर्वाण नहीं मिल सकता। अनुभव और अनुभूति के अंतर को समझना होगा। जब मन में इन भौतिक वस्तुओं की इच्छा खत्म होने लगे। जब भोजन केवल जीवन के लिए जरूरी लगे, तो समझना कि निर्वाण मिल सकता है। भगवान बुद्ध का उदाहरण सुनाते हुए मोरारी बापू ने कहा कि लंबे समय तक तपस्या के बाद भगवान बुद्ध ने भिक्षुणी सुजाता के घर खीर खाई थी। भक्तों को बड़ा आश्चर्य हुआ कि भगवान ने खीर खाई लेकिन यह खीर के प्रति बुद्ध की आसक्ति नहीं थी। वे भोजन को केवल जीवन के लिए ईश्वर का प्रसाद मानकर ग्रहण करते थे। एक भक्त की चिट्ठी का उल्लेख करते हुए कहा कि लोग पूछते हैं कि गृहस्थ को निर्वाण कैसे मिलेगा।
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इसका जवाब यह है कि गृहस्थ को सेवा करने से निर्वाण प्राप्त होगा। गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी जिसके मन में वैराग्य का भाव हो उसे निर्वाण मिलेगा। महर्षि वशिष्ठ और राजा जनक भी गृहस्थ आश्रम में थे लेकिन वे मन से वैरागी थे। वानप्रस्थी को वासना से मुक्त होने पर निर्वाण मिलेगा। न कर्म और न संख्या केवल त्याग से आत्मा में परिवर्तन आता है। भीड़ में भी तन्हाई और तन्हाई में भी भीड़ का अहसास साधु ही कर सकता है। तन्हाई भी एक प्रकार की साधना है। कुछ देर के लिए तन्हाई में बैठकर देखें। असीम शांति और आनंद की अनुभूति होगी। खुद को जानने का इससे बेहतर कोई माध्यम नहीं है। आदि गुरु शंकराचार्य ने भी द्वैत व अद्वैत की बात कही थी। रामचरित मानस में भी कहा गया कि जहां द्वैत है वहीं समस्याएं शुरू होती हैं। ओशो कहते हैं कि मंजिल पाने के बाद भी आगे बढ़ना गड्ढे में गिरने के समान है। जब मन में वैराग्य का भाव आता है तो व्यक्ति सार तत्व के समीप बैठता है। संस्कृत के एक श्लोक जिक्र करते हुए कहा कि जब लाभ-हानि, शुद्ध-अशुद्ध, द्वैत-अद्वैत का भेद मिट जाए और स्वर्ण भी मिट्टी समान प्रतीत होने लगे तो यह स्थिति निर्वाण की है।
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