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यहां राग भैरवी से शुरूआत, राग यमन गाकर होता है विश्राम

Tue, 27 Mar 2018 11:53 PM IST
कुश्ाीनगर (ब्यूरो)
कुश्ाीनगर (ब्यूरो) Updated Tue, 27 Mar 2018 11:53 PM IST
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Raga begins with Bhairavi, the rhythm begins to sing Yaman relaxation.
तबला बजाते। - फोटो : कुश्ाीनगर ब्यूरो
पडरौना।  शहर से महज सात किमी दूर बसा गांव हरका गुलेलहा। यहां का मलिक परिवार पडरौना राजदरबार के गवैया था। राजशाही के जमाने में राज कृपा से सारे सुख भोगने के चलते मलिक उपाधि मिली थी। राजदरबार की ठाट तो खत्म हो गई लेकिन इस परिवार के लोगों ने सुर की साधना नहीं छोड़ी। सात पीढ़ियों बाद भी यहां बच्चे तक ध्रुवपद गायन में काबिलियत रखते हैं तो महिलाएं तबले पर थाप देती हैं। हारमोनियम तो ऐसे बजता है जैसे आज के वक्त में लोग मोबाइल के कीबोर्ड पर उंगलियां फिराते हैं। सुर की साधना में लीन इन परिवारों की सुबह आज भी राग भैरवी (सुबह गाया जाने वाला गीत) और शाम राग यमन (रात्रि विश्राम का गीत) से होती है। 
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पडरौना शहर के नौका टोला मुहल्ले में संगीत महाविद्यालय चलाने वाले शंभू मलिक बताते हैं कि उन लोगों के पूर्वज कोई 400 साल पहले राजदरबार में बने राधा कृष्ण मंदिर में भजन गायन के लिए बुलाए गए थे। शिवलाल बिहार प्रांत के सीवान से तो जमुना बेतिया राजघराने से से आए। रामप्रसाद और भागवत भी दूसरी जगह से आए। हरका गुलेलहा गांव में इन लोगों को एक जगह बसाया गया। शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में ग्वालियर और बनारस घराने से ताल्लुक रखने वाले इन लोगों ने अपनी अगली पीढ़ी को भी संगीत की शिक्षा दी। बाद में यह परम्परा इनके घरों में इतनी गहरी हो गई कि बिना संगीत के इनका कोई कार्य होता ही नहीं। 
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हरका गुलेलहा में मलिक लोगों का 14 घर है। इन घरों के नौजवान तो संगीत की शिक्षा लेकर कहीं न कहीं नौकरी में लग गए हैं और उनके बच्चे अपने बुजुर्गों से संगीत सीख रहे हैं। यहां के ऋषभ, प्रखर, सुधांशु, शिखर, स्मृति, रितू, श्रेया, शिवम आदि बच्चों ने बताया कि हर घर में हारमोनियम, तबला, ढोलक आदि वाद्य यंत्र रखे हैं। सुबह-शाम घर के बुजुर्ग उन्हें अपने साथ गायन व वादन की शैली का अभ्यास कराते हैं। दिन में अगर कभी मौका मिला तो खुद से ही अभ्यास करते हैं। अक्सर शाम को बड़े बुजुर्ग बच्चों को बैठाकर आपस में कंप्टीशन कराते हैं। नियमित अभ्यास के साथ-साथ मौका मिलने पर मंचों पर भी कार्यक्रम प्रस्तुत करते रहते हैं। 
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ध्रुव पद (भजन गाने की विधा), धमार (होली गीत) और ख्याल गायकी में गुलेलहा के मलिक परिवारों के बच्चे भी पारंगत हैं। यहां के शिव गोविंद मतवाला और पंडित हरेराम मलिक बताते हैं कि चूंकि पडरौना राजदरबार के मंदिर से गायन शुरू हुआ इसलिए भजन गायन को प्रमुखता दी गई। हालांकि इसके अलावा ठुमरी, कजरी, चैता आदि विधाओं में भी ये लोग समान अधिकार रखते हैं। कुबेरस्थान रोड के किनारे शिवलाल प्रखर शिखर एकेडमी चलाने वाली अरुणा मिश्रा दूरदर्शन और आकाशवाणी की कलाकार हैं। इसी परिवार की मीना मिश्रा चूल्हा-चौका का कार्य करते हुए भी लोकगीत के अलावा लता मंगेशकर व आशा भोंसले के गाए गीत गुनगुनाती रहती हैं। 

बीएचयू से संगीत में परास्नातक की डिग्री लेने के बाद शंभू मलिक से गायन व वादन की शिक्षा ले रही कृतिका पांडेय मलिक परिवारों के इतिहास पर ही शोध कर रही हैं। इस शोध छात्रा ने बताया कि पडरौना राजदरबार से जुड़े लोगों को संगीत सिखाने वाले इस परिवार के संबंध बिरजू महराज, छन्नू महराज और गुदई (शामता प्रसाद मिश्र) महराज से जुड़े रहे हैं। सुर सम्राज्ञी लता मंगेशकर भी बचपन में एक बार सुरैया के साथ राजदरबार में आयोजित कार्यक्रम में पहुंचीं थीं तब इस परिवार के बुजुर्गों ने उन्हें संगीत के विषय में जानकारी दी थी। राजदरबार और मलिक परिवार के अलावा बनारस व इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मिले इनपुट के आधार पर कृतिका अपना शोध पत्र तैयार कर रही हैं। 


शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में स्तम्भ बन चुके इस परिवार के सारे सदस्य भोजपुरी गीतों में बढ़ती अश्लीलता से चिंतित हैं। कई टीवी चैनलों के रियल्टी शो में जज रह चुके शंभू मलिक हों या फिर उत्तर प्रदेश संगीत नाट्य एकेडमी से पद्म श्री पुरस्कार के लिए प्रस्तावित किए जा चुके शिव गोविंद मतवाला या फिर नई पीढ़ी के ऋषभ, प्रखर, शिखर आदि बच्चे, सब एक सुर में भोजपुरी में बढ़ती अश्लीलता से चिंतित हैं। इनका कहना है कि भोजपुरी संगीत वास्तव में शास्त्रीय संगीत का अहम हिस्सा है। इसके गीत में आरोह-अवरोह भी शास्त्रीय संगीत जैसा ही है। इसमें शब्द की जगह भाव की प्रधानता है परंतु भोजपुरी के नए गायक सस्ती लोकप्रियता के चक्कर में गायन की इस प्रमुख शैली केे इतना फूहड़ बना चुके हैं कि अब भोजपुरी गीत का नाम सुनते ही अच्छे लोग किनारा कसने लगते हैं। 
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