{"_id":"617840123371a12bf92c2b77","slug":"problam-sloved-to-je-desiese-kushinagar-news-gkp4143404146","type":"story","status":"publish","title_hn":"दूर हुई इंसेफेलाइटिस के रोगियों की परेशानी, दस से बढ़कर 25 बेड का हुआ पीआईसीयू","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
दूर हुई इंसेफेलाइटिस के रोगियों की परेशानी, दस से बढ़कर 25 बेड का हुआ पीआईसीयू
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
दूर हुई इंसेफेलाइटिस के रोगियों की परेशानी, दस से बढ़कर 25 बेड का हुआ पीआईसीयू
- जेई के लिहाज से अतिसंवेदनशील रहा है जनपद
- मासूमों की मौत और इलाज का समुचित इंतजाम न होने की वजह से बना था पीआईसीयू
- नए वार्ड में भर्ती किए जाने लगे मरीज, कम हुई पुराने वार्ड में मरीजों की भीड़
संवाद न्यूज एजेंसी
कुशीनगर। जिला अस्पताल के पीआईसीयू में इंसेफेलाटिस रोगियों को भर्ती करने और उपचार में आ रही परेशानी अब
दूर हो गई है। यहां के पीआईसीयू की क्षमता बढ़ाकर दस बेड से 25 बेड कर दी गई है। इतना ही नहीं, पुराने पीआईसीयू के आगे ही नया वार्ड बन गया है, जिसे वेंटिलेटर एवं अन्य अत्याधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित कर मरीजों को भर्ती किया जाने लगा है। इसकी क्षमता वृद्धि होने से मरीजों को इलाज में सहूलियत मिलेगी।
कुशीनगर जनपद इंसेफेलाइटिस के मामले में काफी संवेदनशील रहा है। एक समय था, जब प्रतिवर्ष 100 से अधिक मासूम इस जानलेवा बीमारी की चपेट में आने से दम तोड़ देते थे। तत्कालीन डीएम रिग्जियान सैंफिल ने इस बीमारी पर काबू पाने के लिए काफी प्रयास किए। उनकी पहल पर बीमारी के बारे में शोध करने के लिए विशेषज्ञों की टीमें आईं। साधारण हैंडपंपों की जगह इंडिया मार्क टू हैंडपंप लगाए गए। सुअरबाड़े आबादी से दूर किए गए तथा दूषित पेयजल के उपयोग पर रोक लगाने के लिए ओवरहेड टैंकों की स्थापना की गई। इसके अलावा जिला अस्पताल में दस बेड का पीआईसीयू (पीडियाट्रिक इंसेंसिव केयर यूनिट) स्थापित हुआ था, जो वेंटिलेटर सहित अन्य संसाधनों से युक्त था। हाटा और कप्तानगंज सीएचसी में मिनी पीआईसीयू तथा अन्य सीएचसी में ईटीसी (इंसेफेलाइटिस ट्रिटमेंट सेंटर) बनाए गए। सभी जगह प्रशिक्षित डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ तैनात किए गए। इसकी देन है कि अब जनपद में इंसेफेलाइटिस काफी हद तक नियंत्रित हुआ है। फिर भी इस साल जनवरी से अब तक जनपद में 233 मासूम इंसेफेलाइटिस की चपेट में आ चुके हैं। इनमें से छह मासूमों की बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर में मौत हो चुकी है।
कुशीनगर में इंसेफेलाइटिस से हुई मासूमों की मौत (वर्षवार)
पिछले 21 वर्षों इंसेफेलाइटिस ने हर साल सूूनी की माताओं की गोद वर्ष 1995 में 62, 1996 में 96, 1997 में 18, 1998 में 26, 1999 में 53, 2000 में 86, 2001 में 25, 2002 में 41, 2003 में 45, 2004 में 58, 2005 में 280, 2006 में 135, 2007 में 130, 2008 में 128, 2009 में 124, 2010 में 129, 2011 में 133, 2012 में 125, 2013 में 160, 2014 में 145, 2015 में 142, 2016 में 161, 2017 में 126, 2018 में 37, 2019 में छह, 2020 में आठ और 2021 में अब तक छह मासूमों की इस खतरनाक बीमारी से मौत हुई है।
विज्ञापन
00000
जिला अस्पताल के सीएमएस डॉ. एसके वर्मा ने बताया कि पहले पीआईसीयू दस बेड का था। तब इंसेफेलाइटिस रोगियों की संख्या बढ़ने पर भर्ती करने में थोड़ी असुविधा होती थी। गंभीर मरीजों को पीआईसीयू में रखा जाता था, जबकि जिनकी हालत में सुधार हुआ रहता था, उन्हें दूसरे वार्ड में शिफ्ट करना पड़ता था। अब बेड की संख्या 25 हो गई है। डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ भी तैनात है। इसलिए ऐसे मरीजों के इलाज में परेशानी नहीं आएगी।
विज्ञापन
- जेई के लिहाज से अतिसंवेदनशील रहा है जनपद
- मासूमों की मौत और इलाज का समुचित इंतजाम न होने की वजह से बना था पीआईसीयू
- नए वार्ड में भर्ती किए जाने लगे मरीज, कम हुई पुराने वार्ड में मरीजों की भीड़
संवाद न्यूज एजेंसी
कुशीनगर। जिला अस्पताल के पीआईसीयू में इंसेफेलाटिस रोगियों को भर्ती करने और उपचार में आ रही परेशानी अब
दूर हो गई है। यहां के पीआईसीयू की क्षमता बढ़ाकर दस बेड से 25 बेड कर दी गई है। इतना ही नहीं, पुराने पीआईसीयू के आगे ही नया वार्ड बन गया है, जिसे वेंटिलेटर एवं अन्य अत्याधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित कर मरीजों को भर्ती किया जाने लगा है। इसकी क्षमता वृद्धि होने से मरीजों को इलाज में सहूलियत मिलेगी।
कुशीनगर जनपद इंसेफेलाइटिस के मामले में काफी संवेदनशील रहा है। एक समय था, जब प्रतिवर्ष 100 से अधिक मासूम इस जानलेवा बीमारी की चपेट में आने से दम तोड़ देते थे। तत्कालीन डीएम रिग्जियान सैंफिल ने इस बीमारी पर काबू पाने के लिए काफी प्रयास किए। उनकी पहल पर बीमारी के बारे में शोध करने के लिए विशेषज्ञों की टीमें आईं। साधारण हैंडपंपों की जगह इंडिया मार्क टू हैंडपंप लगाए गए। सुअरबाड़े आबादी से दूर किए गए तथा दूषित पेयजल के उपयोग पर रोक लगाने के लिए ओवरहेड टैंकों की स्थापना की गई। इसके अलावा जिला अस्पताल में दस बेड का पीआईसीयू (पीडियाट्रिक इंसेंसिव केयर यूनिट) स्थापित हुआ था, जो वेंटिलेटर सहित अन्य संसाधनों से युक्त था। हाटा और कप्तानगंज सीएचसी में मिनी पीआईसीयू तथा अन्य सीएचसी में ईटीसी (इंसेफेलाइटिस ट्रिटमेंट सेंटर) बनाए गए। सभी जगह प्रशिक्षित डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ तैनात किए गए। इसकी देन है कि अब जनपद में इंसेफेलाइटिस काफी हद तक नियंत्रित हुआ है। फिर भी इस साल जनवरी से अब तक जनपद में 233 मासूम इंसेफेलाइटिस की चपेट में आ चुके हैं। इनमें से छह मासूमों की बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर में मौत हो चुकी है।
विज्ञापन
कुशीनगर में इंसेफेलाइटिस से हुई मासूमों की मौत (वर्षवार)
पिछले 21 वर्षों इंसेफेलाइटिस ने हर साल सूूनी की माताओं की गोद वर्ष 1995 में 62, 1996 में 96, 1997 में 18, 1998 में 26, 1999 में 53, 2000 में 86, 2001 में 25, 2002 में 41, 2003 में 45, 2004 में 58, 2005 में 280, 2006 में 135, 2007 में 130, 2008 में 128, 2009 में 124, 2010 में 129, 2011 में 133, 2012 में 125, 2013 में 160, 2014 में 145, 2015 में 142, 2016 में 161, 2017 में 126, 2018 में 37, 2019 में छह, 2020 में आठ और 2021 में अब तक छह मासूमों की इस खतरनाक बीमारी से मौत हुई है।
विज्ञापन
00000
जिला अस्पताल के सीएमएस डॉ. एसके वर्मा ने बताया कि पहले पीआईसीयू दस बेड का था। तब इंसेफेलाइटिस रोगियों की संख्या बढ़ने पर भर्ती करने में थोड़ी असुविधा होती थी। गंभीर मरीजों को पीआईसीयू में रखा जाता था, जबकि जिनकी हालत में सुधार हुआ रहता था, उन्हें दूसरे वार्ड में शिफ्ट करना पड़ता था। अब बेड की संख्या 25 हो गई है। डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ भी तैनात है। इसलिए ऐसे मरीजों के इलाज में परेशानी नहीं आएगी।