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गुलाम मानसिकता भारतीय लोक का सबसे बड़ा संकट : प्रो. दिनेश
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गुलाम मानसिकता भारतीय लोक का सबसे बड़ा संकट : प्रो. दिनेश
- लोकरंग महोत्सव के दूसरे दिन आयोजित हुई विचार गोष्ठी
- सामाजिक कार्यकर्ता विद्याभूषण बोले, लोक संस्कृति का लोकतंत्रीकरण जरूरी
अमर उजाला ब्यूरो
फाजिलनगर (कुशीनगर)। यह समय नैराश्य से भरा हुआ है। लोक को प्रशिक्षित करने का कार्य लोक के जिम्मे छोड़ दिया गया है। भक्ति काल में लोक चेतना को प्रशिक्षित करने का काम किया गया। आज जनमत का निर्माण, लोक संस्कृति नहीं शास्त्र कर रहे हैं। शास्त्रों ने जब-जब लोक को सुप्रीम बनाया तब- तब लोक को संकट में डाला है।
ये बातें लोकरंग -2021 के दूसरे दिन रविवार दोपहर जोगिया जनूबीपट्टी में ‘लोक का संकट और लोक साहित्य’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि प्रो. दिनेश कुशवाहा ने कही।
उन्होंने कहा कि हर जगह के लोक का विविध वर्णीय संकट है। लोक और वेद के बीच अंतर्विरोध व संघर्ष पुराना है। भारतीय लोक का सबसे बड़ा संकट गुलाम मानसिकता है। लोक के वैज्ञानिक और जनवादी प्रशिक्षण की जरूरत हमेशा रहती है और इसके लिए संगठित प्रयास करने चाहिए।
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संगोष्ठी के पहले वक्ता संभावना कला मंच के राजकुमार सिंह ने कहा कि लोक कला में आम जीवन के दुख को लाने की जरूरत है। सामाजिक कार्यकर्ता विद्याभूषण रावत ने कहा कि लोग किसी भी भय से लड़ने को तैयार हैं। किसानों ने पूंजीवाद को समझ लिया लेकिन पुरोहितवाद को भी समझना होगा। पुरातनपंथी शक्तियां लोक के नाम पर ही घुसपैठ बना रही हैं। ज्ञान को दूसरे लोगों को दबाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है जबकि यह सबको उपलब्ध होनी चाहिए। जो लोग पढ़े लिखे नहीं हैं उनको अज्ञानी मानना बहुत बड़ी गलती है। उनके पास बहुत ज्ञान है जिसका हमें सम्मान करना होगा। ऐेसे में लोक संस्कृति का लोकतंत्रीकरण जरूरी है।
पत्रकार मनोज कुमार सिंह ने कहा कि लोक साहित्य में आज के दौर के भीषण संकट को किस तरह दर्ज किया जा रहा है, उसे देखने की जरूरत है। देश का गरीब, मजदूर अपने दुख को अब नए तरीके से अभिव्यक्त कर रहा है।
वरिष्ठ पत्रकार अपर्णा ने कहा कि लोक संस्कृति समता, न्याय की बात करती है। उन्होंने लोक संस्कृति के नाम पर परोसी जा रही अश्लीलता, लोक कलाओं के विलुप्त होने की चुनौतियों की चर्चा करते हुए कहा कि साहित्य को ऊर्जा लेने के लिए लोक की तरफ जाना होगा।
सांस्कृतिक कार्यकर्ता जेएन शाह ने लोक साहित्य व लोक संस्कृति के नाम फूहड़पन को स्वीकृति पर चिंता जताई। राजस्थान से आये लोक कलाकार इमामुद्दीन ने लोकरंग के आयोजन को सांस्कृतिक आदान-प्रदान का मंच बताया। उन्होंने टीवी, सिनेमा पर लोकगीत व संगीत को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया।
राजनीतिक कार्यकर्ता राजेश साहनी ने कहा कि आज देश के बड़े हिस्से को उत्पादन प्रक्रिया से अलग कर देने की कोशिश की जा रही है। सत्ता भोगवृत्ति को बढ़ाने के लिए तमाम प्रयत्न कर रही है। आज लोक हारा हुआ महसूस कर रहा है। ऐसे में हमें लोक में सपना जगाने की कोशिश करनी चाहिए। बृजेश कुमार ने देवरिया में नुक्कड़ टीम द्वारा नाटकों व गायन में किए जा रहे प्रयोग के बारे में बताया।
कथाकार मृदुला शुक्ला ने कहा कि ताकतवर ने लोक के लिए संकट पैदा किया है। हम एक विखंडित समाज में रहते हैं जहां कुछ लोगों के पास अपार सम्पदा है और बहुत लोग किसी तरह जिंदगी गुजर बसर कर रहे हैं। उन्होंने कहा स्त्रियों के लिखे को लोक साहित्य माना जाना चाहिए। लोक का रोमांटिसिज्म नहीं होना चाहिए। लोक को पुन: परिभाषित करना होगा। गोष्ठी का संचालन वरिष्ठ पत्रकार रामजी यादव ने किया। धन्यवाद ज्ञापन लोकरंग सांस्कृतिक समिति के अध्यक्ष सुभाष चंद्र कुशवाहा ने किया।
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- लोकरंग महोत्सव के दूसरे दिन आयोजित हुई विचार गोष्ठी
- सामाजिक कार्यकर्ता विद्याभूषण बोले, लोक संस्कृति का लोकतंत्रीकरण जरूरी
अमर उजाला ब्यूरो
फाजिलनगर (कुशीनगर)। यह समय नैराश्य से भरा हुआ है। लोक को प्रशिक्षित करने का कार्य लोक के जिम्मे छोड़ दिया गया है। भक्ति काल में लोक चेतना को प्रशिक्षित करने का काम किया गया। आज जनमत का निर्माण, लोक संस्कृति नहीं शास्त्र कर रहे हैं। शास्त्रों ने जब-जब लोक को सुप्रीम बनाया तब- तब लोक को संकट में डाला है।
ये बातें लोकरंग -2021 के दूसरे दिन रविवार दोपहर जोगिया जनूबीपट्टी में ‘लोक का संकट और लोक साहित्य’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कवि प्रो. दिनेश कुशवाहा ने कही।
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उन्होंने कहा कि हर जगह के लोक का विविध वर्णीय संकट है। लोक और वेद के बीच अंतर्विरोध व संघर्ष पुराना है। भारतीय लोक का सबसे बड़ा संकट गुलाम मानसिकता है। लोक के वैज्ञानिक और जनवादी प्रशिक्षण की जरूरत हमेशा रहती है और इसके लिए संगठित प्रयास करने चाहिए।
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संगोष्ठी के पहले वक्ता संभावना कला मंच के राजकुमार सिंह ने कहा कि लोक कला में आम जीवन के दुख को लाने की जरूरत है। सामाजिक कार्यकर्ता विद्याभूषण रावत ने कहा कि लोग किसी भी भय से लड़ने को तैयार हैं। किसानों ने पूंजीवाद को समझ लिया लेकिन पुरोहितवाद को भी समझना होगा। पुरातनपंथी शक्तियां लोक के नाम पर ही घुसपैठ बना रही हैं। ज्ञान को दूसरे लोगों को दबाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है जबकि यह सबको उपलब्ध होनी चाहिए। जो लोग पढ़े लिखे नहीं हैं उनको अज्ञानी मानना बहुत बड़ी गलती है। उनके पास बहुत ज्ञान है जिसका हमें सम्मान करना होगा। ऐेसे में लोक संस्कृति का लोकतंत्रीकरण जरूरी है।
पत्रकार मनोज कुमार सिंह ने कहा कि लोक साहित्य में आज के दौर के भीषण संकट को किस तरह दर्ज किया जा रहा है, उसे देखने की जरूरत है। देश का गरीब, मजदूर अपने दुख को अब नए तरीके से अभिव्यक्त कर रहा है।
वरिष्ठ पत्रकार अपर्णा ने कहा कि लोक संस्कृति समता, न्याय की बात करती है। उन्होंने लोक संस्कृति के नाम पर परोसी जा रही अश्लीलता, लोक कलाओं के विलुप्त होने की चुनौतियों की चर्चा करते हुए कहा कि साहित्य को ऊर्जा लेने के लिए लोक की तरफ जाना होगा।
सांस्कृतिक कार्यकर्ता जेएन शाह ने लोक साहित्य व लोक संस्कृति के नाम फूहड़पन को स्वीकृति पर चिंता जताई। राजस्थान से आये लोक कलाकार इमामुद्दीन ने लोकरंग के आयोजन को सांस्कृतिक आदान-प्रदान का मंच बताया। उन्होंने टीवी, सिनेमा पर लोकगीत व संगीत को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगाया।
राजनीतिक कार्यकर्ता राजेश साहनी ने कहा कि आज देश के बड़े हिस्से को उत्पादन प्रक्रिया से अलग कर देने की कोशिश की जा रही है। सत्ता भोगवृत्ति को बढ़ाने के लिए तमाम प्रयत्न कर रही है। आज लोक हारा हुआ महसूस कर रहा है। ऐसे में हमें लोक में सपना जगाने की कोशिश करनी चाहिए। बृजेश कुमार ने देवरिया में नुक्कड़ टीम द्वारा नाटकों व गायन में किए जा रहे प्रयोग के बारे में बताया।
कथाकार मृदुला शुक्ला ने कहा कि ताकतवर ने लोक के लिए संकट पैदा किया है। हम एक विखंडित समाज में रहते हैं जहां कुछ लोगों के पास अपार सम्पदा है और बहुत लोग किसी तरह जिंदगी गुजर बसर कर रहे हैं। उन्होंने कहा स्त्रियों के लिखे को लोक साहित्य माना जाना चाहिए। लोक का रोमांटिसिज्म नहीं होना चाहिए। लोक को पुन: परिभाषित करना होगा। गोष्ठी का संचालन वरिष्ठ पत्रकार रामजी यादव ने किया। धन्यवाद ज्ञापन लोकरंग सांस्कृतिक समिति के अध्यक्ष सुभाष चंद्र कुशवाहा ने किया।
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