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70 के दशक में बूथ पर गाजे-बाजे के साथ जाते थे मतदाता
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70 के दशक में बूथ पर गाजे-बाजे के साथ जाते थे मतदाता
समाचार पत्रों के जरिए पता चलता था चुनाव परिणाम
गुरवलिया बाजार (कुशीनगर)। 70 के दशक तक मतदाता बूथ पर मतदान करने गाजे-बाजे के साथ पहुंचते थे। तब महिलाएं मतदान करने कम संख्या में जाती थीं। गिनेचुने मतदान केंद्र हुआ करते थे। चुनाव परिणाम की जानकारी अखबार के माध्यम से तीसरे या चौथे दिन मिलती थी। उस दौर के चुनाव की यादें कुछ बुजुर्गों ने संवाददाता के साथ साझा कीं।
बुजुर्ग बताते हैं कि निर्वाचन आयोग ने अब 90 फीसदी ग्राम पंचायतों में मतदान केंद्र बना दिए हैं। बहुत कम गांवों के मतदाताओं को मतदान के लिए एक-दो किमी दूर जाना पड़ता है। पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की दो बैलों की जोड़ी, भारतीय जनसंघ का दीपक निशान, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के हंसिया बाली और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) का चुनाव चिह्न हथौड़ा हंसिया था। कांग्रेस के विभाजन के बाद दो बैलों की जोड़ी का स्थान चरखा चलाती महिला और गाय बछड़ों ने ले लिया था।
नौतन हर्दों के 75 वर्षीय हरि यादव का कहना है कि 70 के दशक तक उनके गांव में मतदान केंद्र नहीं था। तब गांव के लोग मतदान करने सुदूर क्षेत्र में जाते थे। महिलाएं मतदान करने में दिलचस्पी नहीं लेती थीं। संचार व्यवस्था न होने से चुनाव परिणाम की जानकारी तीन-चार दिन बाद मिलती थी।
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छहूं के 68 वर्षीय सदीक शाह ने बताया कि मतदान करने प्रत्येक गांव के मतदाता गाजे बाजे और ध्वज पताका लेकर मतदान केंद्र तक जाते थे। उस समय भाजपा, सपा जैसी पार्टियां नहीं थीं। सोशलिस्ट पार्टी, जनसंघ का जमाना था। तब कुछ शिक्षित महिलाएं ही मतदान में भाग लेती थीं।
महुअवां बुजुर्ग के 70 वर्षीय रमेश शाही का कहना है कि आज के दौर जैसा चुनाव 60 के दशक तक नहीं होता था। उस समय विद्यालय के हेड मास्टर ही प्रथम पोलिंग ऑफिसर होते थे। तब मतदाता पहचान पत्र भी नहीं होता था। मतदाता सूची में जिस व्यक्ति का नाम होता था, हेड मास्टर और राजनीतिक दलों के एजेंट मतदाता की पहचान करने के बाद वोट करने देते थे।
तुर्कपट्टी के 66 वर्षीय रविंद्र प्रसाद रौनियार ने बताया कि मतदान केंद्र दूर होने के कारण गांव के लोग काफी कम संख्या में वोट देने जाते थे। अब गांव के नजदीक मतदान केंद्र हो जाने पर गांव की 80 फीसदी महिलाएं इच्छानुसार जनप्रतिनिधि का चुनाव करती हैं। तब अखबार के माध्यम से चुनाव के संबंध में जानकारी मिलती थी। अब एग्जिट पोल और इंटरनेट के माध्यम से चुनाव का रुझान पता चल जाता है।
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समाचार पत्रों के जरिए पता चलता था चुनाव परिणाम
गुरवलिया बाजार (कुशीनगर)। 70 के दशक तक मतदाता बूथ पर मतदान करने गाजे-बाजे के साथ पहुंचते थे। तब महिलाएं मतदान करने कम संख्या में जाती थीं। गिनेचुने मतदान केंद्र हुआ करते थे। चुनाव परिणाम की जानकारी अखबार के माध्यम से तीसरे या चौथे दिन मिलती थी। उस दौर के चुनाव की यादें कुछ बुजुर्गों ने संवाददाता के साथ साझा कीं।
बुजुर्ग बताते हैं कि निर्वाचन आयोग ने अब 90 फीसदी ग्राम पंचायतों में मतदान केंद्र बना दिए हैं। बहुत कम गांवों के मतदाताओं को मतदान के लिए एक-दो किमी दूर जाना पड़ता है। पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की दो बैलों की जोड़ी, भारतीय जनसंघ का दीपक निशान, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के हंसिया बाली और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) का चुनाव चिह्न हथौड़ा हंसिया था। कांग्रेस के विभाजन के बाद दो बैलों की जोड़ी का स्थान चरखा चलाती महिला और गाय बछड़ों ने ले लिया था।
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नौतन हर्दों के 75 वर्षीय हरि यादव का कहना है कि 70 के दशक तक उनके गांव में मतदान केंद्र नहीं था। तब गांव के लोग मतदान करने सुदूर क्षेत्र में जाते थे। महिलाएं मतदान करने में दिलचस्पी नहीं लेती थीं। संचार व्यवस्था न होने से चुनाव परिणाम की जानकारी तीन-चार दिन बाद मिलती थी।
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छहूं के 68 वर्षीय सदीक शाह ने बताया कि मतदान करने प्रत्येक गांव के मतदाता गाजे बाजे और ध्वज पताका लेकर मतदान केंद्र तक जाते थे। उस समय भाजपा, सपा जैसी पार्टियां नहीं थीं। सोशलिस्ट पार्टी, जनसंघ का जमाना था। तब कुछ शिक्षित महिलाएं ही मतदान में भाग लेती थीं।
महुअवां बुजुर्ग के 70 वर्षीय रमेश शाही का कहना है कि आज के दौर जैसा चुनाव 60 के दशक तक नहीं होता था। उस समय विद्यालय के हेड मास्टर ही प्रथम पोलिंग ऑफिसर होते थे। तब मतदाता पहचान पत्र भी नहीं होता था। मतदाता सूची में जिस व्यक्ति का नाम होता था, हेड मास्टर और राजनीतिक दलों के एजेंट मतदाता की पहचान करने के बाद वोट करने देते थे।
तुर्कपट्टी के 66 वर्षीय रविंद्र प्रसाद रौनियार ने बताया कि मतदान केंद्र दूर होने के कारण गांव के लोग काफी कम संख्या में वोट देने जाते थे। अब गांव के नजदीक मतदान केंद्र हो जाने पर गांव की 80 फीसदी महिलाएं इच्छानुसार जनप्रतिनिधि का चुनाव करती हैं। तब अखबार के माध्यम से चुनाव के संबंध में जानकारी मिलती थी। अब एग्जिट पोल और इंटरनेट के माध्यम से चुनाव का रुझान पता चल जाता है।