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Kushinagar News: जाति, आय और निवास प्रमाणपत्र की रिपोर्ट लगवाने के लिए देना पड़ता चढ़ावा
Sun, 07 May 2023 12:57 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
Updated Sun, 07 May 2023 12:57 AM IST
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पडरौना तहसील।संवाद
हाल ए तहसील :
आसान नहीं जाति, आय और निवास प्रमाणपत्र बनवाना, लेखपाल से लेकर मालबाबू तक लगानी पड़ती है दौड़
रिपोर्ट के लिए मनमुताबिक काम न करने पर मिलती है तारीख राजस्वकर्मी भी रखें हैं निजी मुंशी, इनसे कराते हैं सरकारी काम
एक सप्ताह में बनाए जाने वाले प्रमाण पत्र में लग जाता है एक महीना से अधिक
जिले की तहसीलों में जाति प्रमाण पत्र के 8,314, निवास के 5,459 और आय प्रमाण पत्र के लंबित हैं 7,074 आवेदन
संवाद न्यूज एजेंसी
कुशीनगर। जाति, आय और निवास प्रमाण पत्र (अधिवास) की जरूरत पड़ जाए तो तहसील का चक्कर लगाते थक जाना पड़ जाता है। क्योंकि आवेदन करने से लेकर लेखपाल की रिपोर्ट लगवाने और प्रमाणपत्र जारी होने तक काफी भागदौड़ करनी पड़ती है।
वर्तमान व्यवस्था में प्रमाणपत्र के लिए ऑनलाइन आवेदन के बाद राजस्वकर्मियों की रिपोर्ट लगती है, लेकिन यह रिपोर्ट लगवाने में लोगों को पसीना छूट जाता है। चढ़ावा नहीं दिया तो सात दिन के भीतर बनने वाले जाति, आय और निवास प्रमाणपत्र के लिए कई दिनों तक चक्कर लगाते रहिए। तहसील से जुड़े लोगों का कहना है कि लेखपालों की ढिलाई से प्रमाण पत्र बनने में विलंब होता है। कई बार कोई न कोई कमी दिखाकर आवेदन लौटा दिया जाता है। पडरौना सहित जिले भर की तहसीलों में जाति प्रमाणपत्र के 8,314, आय प्रमाण पत्र के 7,074 और निवास प्रमाण पत्र के 5,459 आवेदन लंबित हैं।
तहसील संबंधी हर कार्य के लिए दौड़ लगानी पड़ती है, फिर चाहे जमीन की वरासत हो, रजिस्ट्री, खारिज दाखिल या फिर जाति, आय और निवास प्रमाणपत्र बनवाना हो। इन आवेदन पत्रों पर लेखपाल से रिपोर्ट लगवाने से लेकर प्रमाणपत्र पाने तक 20 चक्कर लगाने पड़ जाएं, तो वह भी कम हैं। आवेदन करने के बाद प्रमाणपत्र बनवाने वाले लोगों की मानी जाए तो जब तक राजस्वकर्मियों की फरमाइश पूरी नहीं की जाती, तब तक आसानी से जाति, आय और निवास प्रमाणपत्र नहीं बन पाता है।
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केस-एक
पडरौना मेन बाजार दक्षिणी, बारी टोला निवासी मनोज कुमार बताते हैं कि जाति प्रमाणपत्र के लिए आवेदन किए थे। कुछ दिन बीत जाने के बाद प्रमाणपत्र जारी नहीं हुआ तो लेखपाल से मिले। वह बनाने में हीलाहवाली करते रहे। मिलकर पूछने पर उन्होंने कक्षा आठ की टीसी मांगी। टीसी न होने के कारण उन्होंने आवेदन पत्र ही निरस्त कर दिया।
केस-दो
सदर तहसील क्षेत्र के नरकटिया गांव की निवासी किरन चौहान ने बताया कि आय प्रमाणपत्र के लिए ऑनलाइन आवेदन किए 20 दिन हो गया है, अभी तक लेखपाल रिपोर्ट नहीं लगाए हैं। जबकि एक सप्ताह में इसे जारी कर देना है।
केस-तीन
रोंवारी गांव के निवासी अरविंद कुमार ने बताया कि जाति प्रमाणपत्र के लिए ऑनलाइन आवेदन किए हैं। लेखपाल काफी दिनों से हीलाहवाली कर रहे हैं। रिपोर्ट नहीं लगा रहे हैं।
केस-चार
रोंवारी गांव की निवासी तारा देवी ने बताया कि जाति प्रमाणपत्र के लिए ऑनलाइन आवेदन किए 20 दिन हो गया है। अभी तक प्रमाणपत्र जारी नहीं हुआ है। लेखपाल रिपोर्ट नहीं लगा रहे हैं। पूछने पर भी कोई स्पष्ट जानकारी नहीं देते।
मांग पूरी नहीं होने पर रिपोर्ट लगाने में करते हैं हीलाहवाली
ऐसे तमाम लोग हैं, जिन्हें जाति, निवास और आय प्रमाणपत्र के लिए परेशान होना पड़ रहा है। कई लोगों का आवेदन बिना किसी सूचना या कारण बताए निरस्त कर दिया जाता है। वे समझ ही नहीं पाते हैं कि कौन सा प्रपत्र कम था, जिसकी वजह से ऐसा हुआ। असल में यहां खेल दूसरा चलता है। मांग पूरी नहीं होने पर राजस्व कर्मी रिपोर्ट लगाने में हीलाहवाली करते हैं। प्रमाणपत्र जारी करने की समयसीमा खत्म होने वाली होती है तो आवेदन को निरस्त करके खुद का बचाव कर लेते हैं।
प्रमाणपत्र न बनाने के हैं कई बहाने
जाति, आय और निवास प्रमाणपत्र के लिए आवेदन करने के बाद आवेदक के प्रमाणपत्रों की जांच की जाती है। राजस्वकर्मी संबंधित आवेदक के पास पहुंचकर रिपोर्ट तैयार करते हैं। इसमें राज्य, जिला, किरायेदारी सहित अन्य कारणों का हवाला देकर लेखपाल की रिपोर्ट नहीं लगाई जाती। फिर वसूली के बाद ही काम किया जाता है।
पैसे खर्च नहीं किए तो काटने पड़ेंगे चक्कर
आवेदक ने पैसे नहीं खर्च किए, तो उसे तहसील के चक्कर काटने पड़ेंगे। किसी अधिकारी से शिकायत के बाद भी मामला जांच में अटका रह जाएगा। तहसील अधिवक्ताओं के मुताबिक जिनका जुगाड़ नहीं होता है, उनके आवेदन निरस्त हो जाते हैं। सदर तहसील में हर माह करीब 10 से 15 फीसदी जाति, आय और निवास प्रमाणपत्र अस्वीकृत हो जाते हैं।
तय नहीं कोई कीमत, रकम आवेदक की जरूरत पर निर्भर
प्रमाणपत्र के लिए कितनी कीमत चुकानी होगी, यह आपकी जरूरत पर निर्भर है। आवेदन के समय एक प्रमाणपत्र के लिए 30 रुपये फीस ली जाती है। असली खेल आवेदन की प्रक्रिया के बाद शुरू होता है। पांच सौ रुपये से जांच की शुरुआत होती है। बाद में आवेदक की आवश्यकता और उसकी परिस्थिति के मुताबिक रकम ली जाती है।
तहसीलों में अब तक लंबित जाति, आय व निवास प्रमाणपत्र के आवेदन
तहसील निवास जाति आय कप्तानगंज 839 1,150 1,092 कसया 748 1,467 935 खड्डा 508 814 656 तमकुहीराज 1,164 1,216 938 पडरौना 1,708 2,930 2,690 हाटा 492 737 756
योग- 5,459 8,314 7,074
ये फंसाते है पेच
किराए के कमरे में रहने वाले लोगों के प्रमाणपत्र जैसे आधार इत्यादि को संशोधन के लिए कहते हैं।
नाम और पते में आंशिक बदलाव या गड़बड़ी को आधार बनाकर आवेदन को निरस्त कर देते हैं।
आवेदन के लिए प्रधान और सभासद के प्रमाणपत्र में कोई न कोई कमी बताई जाती है।
लेखपाल की जगह उनके मुंशी आवेदकों से बात करके मामला तय करते हैं। आसपास के लोगों से बात करके रिपोर्ट लगा देते हैं।
प्रधान, सभासद और अन्य किसी से बात करके रिपोर्ट लगाने के दौरान गड़बड़ी आती है।
अनुचित मांग न पूरी होने पर आवेदन को निरस्त कर दिया जाता है। लोगों को दोबारा आवेदन करना पड़ता है।
कई बार लेखपाल अपने आप के बाहर होने या अन्य किसी काम में व्यस्त होने हवाला देकर भी मामला टाल देते हैं।
सरकारी कार्य के लिए निजी मुंशी
राजस्वकर्मियों में लेखपाल हों या कानूनगो, ज्यादातर अपनी सुविधा के लिए निजी मुंशी रखे हुए हैं। ये मुंशी राजस्व संबंधी सरकारी कार्य बेरोकटोक करते हैं। इन्हीं से मिली जानकारी पर रिपोर्ट लग जाती है, फिर चाहे यह जो भी बताएं। सरकारी अभिलेखों के बारे में इतनी अधिक जानकारी रखते हैं कि इस काम से बाहर होने पर इनसे सरकारी अभिलेखों को नुकसान भी हो सकता है।
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आसान नहीं जाति, आय और निवास प्रमाणपत्र बनवाना, लेखपाल से लेकर मालबाबू तक लगानी पड़ती है दौड़
रिपोर्ट के लिए मनमुताबिक काम न करने पर मिलती है तारीख राजस्वकर्मी भी रखें हैं निजी मुंशी, इनसे कराते हैं सरकारी काम
एक सप्ताह में बनाए जाने वाले प्रमाण पत्र में लग जाता है एक महीना से अधिक
जिले की तहसीलों में जाति प्रमाण पत्र के 8,314, निवास के 5,459 और आय प्रमाण पत्र के लंबित हैं 7,074 आवेदन
संवाद न्यूज एजेंसी
कुशीनगर। जाति, आय और निवास प्रमाण पत्र (अधिवास) की जरूरत पड़ जाए तो तहसील का चक्कर लगाते थक जाना पड़ जाता है। क्योंकि आवेदन करने से लेकर लेखपाल की रिपोर्ट लगवाने और प्रमाणपत्र जारी होने तक काफी भागदौड़ करनी पड़ती है।
वर्तमान व्यवस्था में प्रमाणपत्र के लिए ऑनलाइन आवेदन के बाद राजस्वकर्मियों की रिपोर्ट लगती है, लेकिन यह रिपोर्ट लगवाने में लोगों को पसीना छूट जाता है। चढ़ावा नहीं दिया तो सात दिन के भीतर बनने वाले जाति, आय और निवास प्रमाणपत्र के लिए कई दिनों तक चक्कर लगाते रहिए। तहसील से जुड़े लोगों का कहना है कि लेखपालों की ढिलाई से प्रमाण पत्र बनने में विलंब होता है। कई बार कोई न कोई कमी दिखाकर आवेदन लौटा दिया जाता है। पडरौना सहित जिले भर की तहसीलों में जाति प्रमाणपत्र के 8,314, आय प्रमाण पत्र के 7,074 और निवास प्रमाण पत्र के 5,459 आवेदन लंबित हैं।
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तहसील संबंधी हर कार्य के लिए दौड़ लगानी पड़ती है, फिर चाहे जमीन की वरासत हो, रजिस्ट्री, खारिज दाखिल या फिर जाति, आय और निवास प्रमाणपत्र बनवाना हो। इन आवेदन पत्रों पर लेखपाल से रिपोर्ट लगवाने से लेकर प्रमाणपत्र पाने तक 20 चक्कर लगाने पड़ जाएं, तो वह भी कम हैं। आवेदन करने के बाद प्रमाणपत्र बनवाने वाले लोगों की मानी जाए तो जब तक राजस्वकर्मियों की फरमाइश पूरी नहीं की जाती, तब तक आसानी से जाति, आय और निवास प्रमाणपत्र नहीं बन पाता है।
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पडरौना मेन बाजार दक्षिणी, बारी टोला निवासी मनोज कुमार बताते हैं कि जाति प्रमाणपत्र के लिए आवेदन किए थे। कुछ दिन बीत जाने के बाद प्रमाणपत्र जारी नहीं हुआ तो लेखपाल से मिले। वह बनाने में हीलाहवाली करते रहे। मिलकर पूछने पर उन्होंने कक्षा आठ की टीसी मांगी। टीसी न होने के कारण उन्होंने आवेदन पत्र ही निरस्त कर दिया।
केस-दो
सदर तहसील क्षेत्र के नरकटिया गांव की निवासी किरन चौहान ने बताया कि आय प्रमाणपत्र के लिए ऑनलाइन आवेदन किए 20 दिन हो गया है, अभी तक लेखपाल रिपोर्ट नहीं लगाए हैं। जबकि एक सप्ताह में इसे जारी कर देना है।
केस-तीन
रोंवारी गांव के निवासी अरविंद कुमार ने बताया कि जाति प्रमाणपत्र के लिए ऑनलाइन आवेदन किए हैं। लेखपाल काफी दिनों से हीलाहवाली कर रहे हैं। रिपोर्ट नहीं लगा रहे हैं।
केस-चार
रोंवारी गांव की निवासी तारा देवी ने बताया कि जाति प्रमाणपत्र के लिए ऑनलाइन आवेदन किए 20 दिन हो गया है। अभी तक प्रमाणपत्र जारी नहीं हुआ है। लेखपाल रिपोर्ट नहीं लगा रहे हैं। पूछने पर भी कोई स्पष्ट जानकारी नहीं देते।
मांग पूरी नहीं होने पर रिपोर्ट लगाने में करते हैं हीलाहवाली
ऐसे तमाम लोग हैं, जिन्हें जाति, निवास और आय प्रमाणपत्र के लिए परेशान होना पड़ रहा है। कई लोगों का आवेदन बिना किसी सूचना या कारण बताए निरस्त कर दिया जाता है। वे समझ ही नहीं पाते हैं कि कौन सा प्रपत्र कम था, जिसकी वजह से ऐसा हुआ। असल में यहां खेल दूसरा चलता है। मांग पूरी नहीं होने पर राजस्व कर्मी रिपोर्ट लगाने में हीलाहवाली करते हैं। प्रमाणपत्र जारी करने की समयसीमा खत्म होने वाली होती है तो आवेदन को निरस्त करके खुद का बचाव कर लेते हैं।
प्रमाणपत्र न बनाने के हैं कई बहाने
जाति, आय और निवास प्रमाणपत्र के लिए आवेदन करने के बाद आवेदक के प्रमाणपत्रों की जांच की जाती है। राजस्वकर्मी संबंधित आवेदक के पास पहुंचकर रिपोर्ट तैयार करते हैं। इसमें राज्य, जिला, किरायेदारी सहित अन्य कारणों का हवाला देकर लेखपाल की रिपोर्ट नहीं लगाई जाती। फिर वसूली के बाद ही काम किया जाता है।
पैसे खर्च नहीं किए तो काटने पड़ेंगे चक्कर
आवेदक ने पैसे नहीं खर्च किए, तो उसे तहसील के चक्कर काटने पड़ेंगे। किसी अधिकारी से शिकायत के बाद भी मामला जांच में अटका रह जाएगा। तहसील अधिवक्ताओं के मुताबिक जिनका जुगाड़ नहीं होता है, उनके आवेदन निरस्त हो जाते हैं। सदर तहसील में हर माह करीब 10 से 15 फीसदी जाति, आय और निवास प्रमाणपत्र अस्वीकृत हो जाते हैं।
तय नहीं कोई कीमत, रकम आवेदक की जरूरत पर निर्भर
प्रमाणपत्र के लिए कितनी कीमत चुकानी होगी, यह आपकी जरूरत पर निर्भर है। आवेदन के समय एक प्रमाणपत्र के लिए 30 रुपये फीस ली जाती है। असली खेल आवेदन की प्रक्रिया के बाद शुरू होता है। पांच सौ रुपये से जांच की शुरुआत होती है। बाद में आवेदक की आवश्यकता और उसकी परिस्थिति के मुताबिक रकम ली जाती है।
तहसीलों में अब तक लंबित जाति, आय व निवास प्रमाणपत्र के आवेदन
तहसील निवास जाति आय कप्तानगंज 839 1,150 1,092 कसया 748 1,467 935 खड्डा 508 814 656 तमकुहीराज 1,164 1,216 938 पडरौना 1,708 2,930 2,690 हाटा 492 737 756
योग- 5,459 8,314 7,074
ये फंसाते है पेच
किराए के कमरे में रहने वाले लोगों के प्रमाणपत्र जैसे आधार इत्यादि को संशोधन के लिए कहते हैं।
नाम और पते में आंशिक बदलाव या गड़बड़ी को आधार बनाकर आवेदन को निरस्त कर देते हैं।
आवेदन के लिए प्रधान और सभासद के प्रमाणपत्र में कोई न कोई कमी बताई जाती है।
लेखपाल की जगह उनके मुंशी आवेदकों से बात करके मामला तय करते हैं। आसपास के लोगों से बात करके रिपोर्ट लगा देते हैं।
प्रधान, सभासद और अन्य किसी से बात करके रिपोर्ट लगाने के दौरान गड़बड़ी आती है।
अनुचित मांग न पूरी होने पर आवेदन को निरस्त कर दिया जाता है। लोगों को दोबारा आवेदन करना पड़ता है।
कई बार लेखपाल अपने आप के बाहर होने या अन्य किसी काम में व्यस्त होने हवाला देकर भी मामला टाल देते हैं।
सरकारी कार्य के लिए निजी मुंशी
राजस्वकर्मियों में लेखपाल हों या कानूनगो, ज्यादातर अपनी सुविधा के लिए निजी मुंशी रखे हुए हैं। ये मुंशी राजस्व संबंधी सरकारी कार्य बेरोकटोक करते हैं। इन्हीं से मिली जानकारी पर रिपोर्ट लग जाती है, फिर चाहे यह जो भी बताएं। सरकारी अभिलेखों के बारे में इतनी अधिक जानकारी रखते हैं कि इस काम से बाहर होने पर इनसे सरकारी अभिलेखों को नुकसान भी हो सकता है।