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फुर्सत के दो पल गुजारने का सपना रह जाता अधूरा
कुश्ाीनगर (ब्यूरो)
Updated Sun, 11 Mar 2018 11:37 PM IST
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छोटा पार्क।
- फोटो : कुश्ाीनगर ब्यूरो
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पडरौना। जिंदगी की भागदौड़ के बीच जब मन में फुर्सत के दो पल कहीं खाली जगह में बिताने की इच्छा करती है तो सपने अधूरे ही रह जाते हैं। यह स्थिति है जिला मुख्यालय की जहां बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक परेशान रहते हैं। इसका कारण है पूरे शहर में किसी बड़े पार्क या खेल मैदान का न होना। कुछ वर्ष पहले कठकुइयां मोड़ पर एनएच के किनारे छोटे-छोटे दो पार्क बनाए गए थे, लेकिन अति व्यस्त सड़क के किनारे बने इस पतले पार्क में कभी कोई बैठता नहीं है। यहां भी न तो छांव की व्यवस्था है और न ही बैठने की। इस कारण शहर के लोग सुबह-शाम गंदगी से भरी नहर की पटरी पर टहलने निकलते हैं।
चीनी मिल, रेलवे स्टेशन और कॉलेज के चलते आजादी से पहले ही पडरौना को नगर क्षेत्र का दर्जा मिल गया था। वर्ष 1948 में इसे नगर पालिका घोषित कर दिया गया। तब से शहर की आबादी लगातार बढ़ रही है। परंतु नगर पालिका प्रशासन ने नगर क्षेत्र के लोगों के लिए कभी पार्क या खेल मैदान की उपलब्धता के विषय में शायद सोचने का भी प्रयास नहीं किया। इस वक्त 25 वार्डों में फैले इस शहर की आबादी 50 हजार से अधिक है। विस्तारीकरण की प्रक्रिया पूरी होते ही आबादी एक लाख के आसपास पहुंच जाएगी। परंतु बड़े होते जा रहे शहर में कहीं भी कोई बड़ा पार्क नहीं है। पार्क नहीं होने की वजह से बुजुर्गों व अन्य लोगों को या तो घर के सामने की गलियों में टहलना पड़ता है अथवा सुबह-शाम लोग बड़ी गंडक नहर की पटरी पर टहलते हैं। बच्चों को भी खेलने की जगह नहीं मिलती।
कठकुइयां मोड़ स्थित गांधी प्रतिमा और डॉक्टर अंबेडकर प्रतिमा का सुंदरीकरण कार्य कराने के साथ ही नगरपालिका की ओर से हाइवे की पटरी दो छोटे-छोटे पार्क बनवाए गए लेकिन वे भी लोगों के लिए अनुपयोगी ही हैं। शहर के निवासी कुंवर रैना, धर्मेंद्र शुक्ल, सूर्यप्रकाश शर्मा, नवनीत तिवारी, अमित गुप्ता आदि का कहना है कि कठकुइयां मोड़ पर बने पार्क एक तो मुख्य चौराहे पर हैं और दूसरे वहां न तो छांव की व्यवस्था है और न ही बैठने की। यहां तो घर या मुहल्ले से कई गुना अधिक शोर होता है। सुबह-शाम टहलने वालों को शहर से दूर बड़ी नहर की पटरी पकड़कर अहिरौली दीक्षित गांव की तरफ जाना पड़ता है।
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नगर पालिका परिषद के चेयरमैन विनय जायसवाल का कहना है कि यह काम दो-तीन दशक पहले ही हो जाना चाहिए था। परंतु उस वक्त पार्क निर्माण की बजाय काम्प्लेक्स निर्माण पर अधिक ध्यान दिया गया। अब शहर में कहीं जगह नहीं बची है। शहर के विस्तारीकरण के बाद इस विषय में प्रयास हो सकता है। वैसे तत्काल जरूरत को ध्यान में रखते हुए कुछ विकल्पों पर विचार किया जा रहा है।
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चीनी मिल, रेलवे स्टेशन और कॉलेज के चलते आजादी से पहले ही पडरौना को नगर क्षेत्र का दर्जा मिल गया था। वर्ष 1948 में इसे नगर पालिका घोषित कर दिया गया। तब से शहर की आबादी लगातार बढ़ रही है। परंतु नगर पालिका प्रशासन ने नगर क्षेत्र के लोगों के लिए कभी पार्क या खेल मैदान की उपलब्धता के विषय में शायद सोचने का भी प्रयास नहीं किया। इस वक्त 25 वार्डों में फैले इस शहर की आबादी 50 हजार से अधिक है। विस्तारीकरण की प्रक्रिया पूरी होते ही आबादी एक लाख के आसपास पहुंच जाएगी। परंतु बड़े होते जा रहे शहर में कहीं भी कोई बड़ा पार्क नहीं है। पार्क नहीं होने की वजह से बुजुर्गों व अन्य लोगों को या तो घर के सामने की गलियों में टहलना पड़ता है अथवा सुबह-शाम लोग बड़ी गंडक नहर की पटरी पर टहलते हैं। बच्चों को भी खेलने की जगह नहीं मिलती।
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कठकुइयां मोड़ स्थित गांधी प्रतिमा और डॉक्टर अंबेडकर प्रतिमा का सुंदरीकरण कार्य कराने के साथ ही नगरपालिका की ओर से हाइवे की पटरी दो छोटे-छोटे पार्क बनवाए गए लेकिन वे भी लोगों के लिए अनुपयोगी ही हैं। शहर के निवासी कुंवर रैना, धर्मेंद्र शुक्ल, सूर्यप्रकाश शर्मा, नवनीत तिवारी, अमित गुप्ता आदि का कहना है कि कठकुइयां मोड़ पर बने पार्क एक तो मुख्य चौराहे पर हैं और दूसरे वहां न तो छांव की व्यवस्था है और न ही बैठने की। यहां तो घर या मुहल्ले से कई गुना अधिक शोर होता है। सुबह-शाम टहलने वालों को शहर से दूर बड़ी नहर की पटरी पकड़कर अहिरौली दीक्षित गांव की तरफ जाना पड़ता है।
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नगर पालिका परिषद के चेयरमैन विनय जायसवाल का कहना है कि यह काम दो-तीन दशक पहले ही हो जाना चाहिए था। परंतु उस वक्त पार्क निर्माण की बजाय काम्प्लेक्स निर्माण पर अधिक ध्यान दिया गया। अब शहर में कहीं जगह नहीं बची है। शहर के विस्तारीकरण के बाद इस विषय में प्रयास हो सकता है। वैसे तत्काल जरूरत को ध्यान में रखते हुए कुछ विकल्पों पर विचार किया जा रहा है।