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महदेवा गांव के अस्तित्व पर बाढ़ का खतरा

Wed, 25 May 2022 11:52 PM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Wed, 25 May 2022 11:52 PM IST
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Flood threat on the existence of Mahdeva village
महदेवा गांव को कटान से बचाने के लिए गंडक नदी किनारे लगाए जा रहे परक्यूपाइन।संवाद। - फोटो : KUSHINAGAR
महदेवा गांव के अस्तित्व पर बाढ़ का खतरा
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हर साल बाढ़ आने पर एनएच पर विस्थापित होते हैं ग्रामीण
खड्डा(कुशीनगर)। लगातार तीन वर्षों से महदेवा और सालिकपुर गांव के अस्तित्व पर कटान का खतरा बना हुआ है। इस गांव को गंडक नदी के तीव्र कटान से बचाने के लिए एक करोड़ 75 लाख की लागत से पौने दो किलोमीटर लंबा परक्यूपाइन लगाया गया है। इसके बावजूद ग्रामीण कटान को लेकर चिंतित हैं।
खड्डा क्षेत्र के बाढ़ प्रभावित गांवों में शामिल महदेवा व सालिकपुर की जनता तीन वर्षों से गंडक नदी की कटान से त्रस्त है। तीन वर्ष पहले नदी गांव से करीब दो किमी दूर दक्षिण में बह रही थी। गांव व नदी के बीच की जमीन पर खेती होती थी। अचानक नदी की धारा मुड़ी और कटान करते हुए महदेवा गांव के पास पहुंच गई। खेती बर्बाद होने से परेशान ग्रामीणों के घरों के एकदम करीब पहुंच चुकी नदी से पिछले बाढ़ में गांव बाल-बाल बचा था।
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हर वर्ष बाढ़ का पानी गांव में भर जाने से लोगों को परिवार व पशुओं सहित राष्ट्रीय राजमार्ग पर सालिकपुर चौकी के पास शरण लेनी पड़ती है। ग्राम प्रधान पति नथुनी, भीमबली, रामायन, विनोद आदि एवं नदी के विषय में जानकारी रखने वाले लोग बताते हैं कि पनियहवा पुल के पास बने ठोकर से जोड़कर दो किमी लंबा बांध बन जाता तो गांव में बाढ़ का पानी नहीं पहुंचता और कटान नहीं होती। स्थायी समाधान न करके अस्थायी तौर पर परक्यूपाइन लगाने का कार्य किया जा रहा है। इससे कटान शायद ही रुके। लोगों का कहना है कि जितना रकम खर्च किया जा रहा है कुछ और खर्च कर बांध व ठोकर बन जाता तो हर साल विस्थापित नहीं होना पड़ता।
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परक्यूपाइन लगाकर गांव बचाने की तैयारी
कार्यदायी संस्था बाढ़ खंड के एसडीओ मनोरंजन चौधरी का कहना है कि गांव को बाढ़ से बचाने के लिए बाढ़ खंड की तरफ से 1700 मीटर लंबाई में पौने दो करोड़ रुपये खर्च कर नदी के किनारे किनारे परक्यूपाइन लगाया जा रहा है। इसके अंदर पेड़ों की टहनियां या झाड़ी भरी जा रही है। इसे तार की जाली से घेर दिया जाएगा। कटान होने पर यह अवरोध बन जाएगा, जहां तक कटान होगी, वहां यह लुढ़ककर पहुंच जाएगा। इससे कटान रुक जाएगी और किनारे पर प्राकृतिक रूप से सिल्ट जमा हो जाएगा। यह तकनीक बाढ़ से बचाव में काम करेगी।
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