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Kushinagar News: ठोस सबूत के बाद भी पुलिस खाली हाथ...छका रहा सरगना

Sat, 18 Jan 2025 12:54 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर Updated Sat, 18 Jan 2025 12:54 AM IST
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Despite solid evidence, the police are empty handed...the kingpin is dodging
पडरौना। सचिव की आईडी छेड़छाड़ कर हाटा में हुए फर्जीवाड़े के बाद भी पुलिस अब तक खाली हाथ है। डीएम के निर्देश पर साइबर सेल की जांच में यह पुष्टि हुई कि फर्जीवाड़े का सरगना दूसरे प्रदेश में बैठा कोई शातिर ठग है।
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वह सीएससी और सीएसपी संचालकों से व्हाट्सएप ग्रुप के माध्यम से जुड़ा हुआ है। लंबे समय से चर्चा का केंद्र बने प्रमाणपत्र फर्जीवाड़े को लेकर विभागीय कार्यप्रणाली (पंचायती राज और विकास विभाग) अब सवालों के घेरे में है। अब तमाम ठोस साक्ष्यों के उपलब्ध होने के बावजूद गैर प्रांत में बैठा सरगना नेटवर्क ऑपरेट कर रहा है। जन्म प्रमाणपत्र से लेकर आयुष्मान कार्ड और अन्य ऐसे कई प्रमाणपत्र बनाने के लिए वह मुंहमांगी रकम ली जाती है। सीएससी और सीएसपी संचालकों की ओर से दिए गए टास्क को पूरा करने के बाद वह व्हाट्सएप पर ही पहले क्यूअर कोड भेजकर पैसे मंगवाए जाते हैं। पैसा मिलने के बाद प्रमाणपत्र भेजा जाता है।
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सर्विलांस और यहां के लोगों के चैट्स खंगालने के बाद पुलिस को ठग की बैंक डिटेल के साथ ही उसके ठिकाने की जानकारी हुई है। बावजूद इसके पुलिस अन्य किसी जांच एजेंसी का सहयोग नहीं ले रही है। इससे विकास और पंचायती राज विभाग की कार्यप्रणाली के बाद पुलिस भी संदेह के घेरे में है। सुनसान मकान में प्राइवेट गाड़ी से ले जाकर जिले के सीएससी संचालकों से पूछताछ में वसूली की भी बू आ रही है। चर्चा है कि जिस तरह सचिवों ने बंद लिफाफे भेजकर पंचायती राज विभाग को रोक लिया था, यहां भी पुलिस उसी राह पर है।
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रायबरेली के सलोन में 19 हजार से अधिक फर्जी प्रमाणपत्र बनाने के मामले में एटीएस की गोरखपुर फील्ड यूनिट ने स्थानीय पुलिस की मदद से तरयासुजान के संजीव सिंह और उसके साथ सतीश सोनी को गिरफ्तार किया। बाद में हाथरस में हुए फर्जी जन्म प्रमाणपत्र में तमकुही ब्लॉक में स्वच्छ भारत मिशन के कंप्यूटर ऑपरेटर अरविंद प्रसाद का भी नाम आया।

प्रदेश के दो अलग-अलग जिलों में हुए बड़े पैमाने पर प्रमाणपत्र फर्जीवाड़े में जिले के शातिर युवकों का नाम आने के बाद विभागीय अफसरों की नींद उड़ गई। लापरवाही सामने आने पर खुद के बचाव के लिए पंचायती राज विभाग मामले में सचिवों और कर्मचारियों की भूमिका की जांच करने लगा और त्वरित जांच के बजाय पत्र-पत्र की औपचारिकता में सिमटा रह गया। लिहाजा इनके हाथ अब तक फर्जी प्रमाणपत्रों के जारी होने की संख्या और इसके कनेक्शन का भी पता नहीं लग सका है। विभाग की लापरवाही से तो इतने बड़े स्तर का फर्जीवाड़ा हुआ था। इसके बाद अमर उजाला में ‘अधीनस्थों ने भरोसे का उठाया फायदा अब अफसरों पर कार्रवाई की तलवार..’ और ‘फर्जीवाड़े में पत्राचार तक सिमटी कार्रवाई..’ शीर्षक से खबर प्रकाशित की तो मामले में टाल-मटोल कर रहे पंचायती राज विभाग ने कंप्यूटर ऑपरेटर को निलंबित किया और तत्कालीन डीएम उमेश मिश्रा ने जांच के लिए सीडीओ को नामित किया। बावजूद इसके इस मामले में विकास विभाग जब तक सख्त होता इस बीच तत्कालीन डीएम का स्थानांतरण हो गया और जांच में लीपा-पोती कर दी गई।
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