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Kushinagar News: विकास पर करोड़ों रुपये खर्च, फिर भी मूल स्वरूप खतरे में
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- कुशीनगर को पर्यटन का केंद्र बनाने के लिए चल रही सरकार की कई योजनाएं
- इनके संरक्षण की अब तक नहीं बनी कार्ययोजना, बारिश के पानी में डूब जाते हैं धरोहर
- महापरिनिर्वाण मंदिर, मांथा कुंवर मंदिर और रामाभार स्तूप परिसर का हाल
संवाद न्यूज एजेंसी
कुशीनगर/पकवा इनार। प्रदेश सरकार बुद्ध नगरी को विश्व पटल पर बड़े पर्यटन केंद्र के रुप में विकसित कर रही है। यहां करोड़ों रुपये का विकास और सौंदर्यीकरण का काम किया जा रहा है। पर, हकीकत यह है कि इन धरोहरों को संरक्षित करने के लिए अभी तक कोई कार्ययोजना नहीं बनी है। हाल यह है कि ये सभी धरोहर बारिश के पानी में डूब जाते हैं।
महात्मा बुद्ध की महापरिनिर्वाण स्थली में पुरातात्विक महत्व के कई धरोहर हैं। विश्व पटल पर इन धरोहरों व बौद्धकालीन पुरावशेषों को दिखाने के लिए कार्ययोजना बनी। इसे धरातल पर भी प्रदेश सरकार ने शुरू कर दिया। वहीं, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) के खनन में मिले पुरावशेषों व संरचनाओं को बारिश के पानी में डूबने से बचाने का कोई इंतजाम नहीं है। इसका दर्द पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के विभागीय अधिकारियों का भी है। अधिकारियों की माने तो बारिश में डूबे उत्खनित पुरावशेषों के संरक्षण के लिए कोई विशेष व मरम्मत कार्य की कोई योजना नहीं है।
अधिकारियों की माने तो जिन स्थानों पर पुरावशेष पानी में डूबे थे। पानी हटने के बाद उनकी सफाई की जा रही है। मांथा कुंवर मंदिर परिसर में उत्खनित पुरावशेष में अभी भी तलहटी में पानी लगा है। मुख्य महापरिनिर्वाण मंदिर व रामाभार स्तूप परिसर में पुरावशेष जलभराव खत्म हो गया है। वहां भी काम शुरू हो गया है।
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इनका है ऐतिहासिक व धार्मिक महत्व
19वीं शताब्दी में कुशीनगर की खोज शुरू हुई। फाह्यान, ह्वेनसांग तथा इत्सिंग जैसे चीन के तीर्थ यात्रियों की डायरियों में उपलब्ध विवरण के अनुसार अंग्रेज इतिहासकार कुशीनगर को खोजते हुए 1870 के दशक में इधर आए। विशुनपुर बिंदवलिया ग्राम सभा में ऊंचे-ऊंचे टीलों के बीच सबकुछ तो मिट्टी के नीचे दबा छिपा था। महात्मा बुद्ध की एक प्रतिमा पीपल के वृक्ष के नीचे स्थित थी। इसी से कुशीनगर के खोज के लिए आगे की राह आसान की। 1876 में एसीएल कार्लाइल की अगुवाई में कुशीनगर के टीलों की खुदाई आरंभ हुई। माथा कुंवर की प्राचीन प्रतिमा 03.05 मीटर ऊंची भूमि स्पर्श मुद्रा में आसनस्थ है। भूमि स्पर्श मुद्रा को बुद्ध अभिप्रेरित ज्ञान जगत में अतिमहत्वपूर्ण मुद्राओं में स्थान प्राप्त है। माथा कुंवर बुद्ध मंदिर की यह प्रतिमा उसी ''भूमि स्पर्श मुद्रा'' में है। नालंदा विश्वविद्यालय के अवशेषों के निकट स्थित ''कृष्ण बुद्ध'' (तेलहवा बाबा) मंदिर भी माथा कुंवर मंदिर जैसी काले/नीलाश्म बलुआ पत्थर से बनी भूमिस्पर्श मुद्रा की मूर्ति स्थित है।
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हिंदू धर्म के लोग करते थे पूजा:-
नारायण के 9वें अवतार के रूप में महात्मा बुद्ध को हिंदू समाज भी पूजा करता है। भूमिस्पर्श मुद्रा की इस प्रतिमा के साथ ही आनुषांगिक रूप से अष्टभुजी दुर्गा, पद्मपाणि विष्णु, कुबेर, गंगा तथा यमुना जैसी दैवीय प्रतिमाएं भी उत्कीर्ण हैं, हिंदू तथा बौद्ध धर्म के एक मूल तथा एकनिष्ठता को भी अभिव्यक्त करती हैं। प्रतिमा तथा पूजा यह भी दर्शाती हैं कि हिंदू व बौद्ध धर्म के लोगों में शुरू से ही कोई मतभेद नहीं रहा है और दोनों एक दूसरे के धर्म का आदर करते हुए पूजा पाठ करते रहे हैं।
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बोधि प्राप्ति के लिए बुद्ध ने लिया था कठोर व्रत-
टूरिस्ट गाइड डॉ. अभय राय के मुताबिक राजकुमार सिद्धार्थ को ज्ञान की खोज में घर त्याग के करीब छह साल बीतने को थे। सिद्धार्थ यहां-वहां ज्ञान की खोज में घूमते फिरते तथा विभिन्न आचार्यों के मत-मतांतरों का परीक्षण करते हुए उरुवेला पहुंचे। उरुवेला (धर्मारण्य) की अवस्थिति दो महान नदियों-फल्गू तथा निरंजना के बीच के दोआब में है और उरुवेला के निकट ही इन दोनों नदियों का संगम स्थल स्थित होने के कारण उरुवेला में ये दोनों नदियां समानांतर रूप में एक दूसरे के निकट बहती हैं।
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कोट-
कुशीनगर में उत्खनित पुरावशेषों को बारिश के मौसम में जलभराव से बचाने का कोई ठोस प्रबंध नहीं है। धरोहरों व अवशेषों को जलभराव अथवा संरक्षण करने का मुद्दा विभाग का आंतरिक मामला है। बारिश के बाद अवशेषों के संरक्षण और साफ-सफाई के सवाल पर कहा कि बिना अवलोकन कुछ कहना उचित नहीं होगा। दिसंबर महीने में विजिट कर उत्खनित अवशेषों की अद्यतन स्थिति से अवगत होने के बाद ही कुछ कह सकूंगा।
-अविनाश मोहंती, अधीक्षण पुरातत्वविद्,भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (सारनाथ सर्किल)
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- इनके संरक्षण की अब तक नहीं बनी कार्ययोजना, बारिश के पानी में डूब जाते हैं धरोहर
- महापरिनिर्वाण मंदिर, मांथा कुंवर मंदिर और रामाभार स्तूप परिसर का हाल
संवाद न्यूज एजेंसी
कुशीनगर/पकवा इनार। प्रदेश सरकार बुद्ध नगरी को विश्व पटल पर बड़े पर्यटन केंद्र के रुप में विकसित कर रही है। यहां करोड़ों रुपये का विकास और सौंदर्यीकरण का काम किया जा रहा है। पर, हकीकत यह है कि इन धरोहरों को संरक्षित करने के लिए अभी तक कोई कार्ययोजना नहीं बनी है। हाल यह है कि ये सभी धरोहर बारिश के पानी में डूब जाते हैं।
महात्मा बुद्ध की महापरिनिर्वाण स्थली में पुरातात्विक महत्व के कई धरोहर हैं। विश्व पटल पर इन धरोहरों व बौद्धकालीन पुरावशेषों को दिखाने के लिए कार्ययोजना बनी। इसे धरातल पर भी प्रदेश सरकार ने शुरू कर दिया। वहीं, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) के खनन में मिले पुरावशेषों व संरचनाओं को बारिश के पानी में डूबने से बचाने का कोई इंतजाम नहीं है। इसका दर्द पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के विभागीय अधिकारियों का भी है। अधिकारियों की माने तो बारिश में डूबे उत्खनित पुरावशेषों के संरक्षण के लिए कोई विशेष व मरम्मत कार्य की कोई योजना नहीं है।
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अधिकारियों की माने तो जिन स्थानों पर पुरावशेष पानी में डूबे थे। पानी हटने के बाद उनकी सफाई की जा रही है। मांथा कुंवर मंदिर परिसर में उत्खनित पुरावशेष में अभी भी तलहटी में पानी लगा है। मुख्य महापरिनिर्वाण मंदिर व रामाभार स्तूप परिसर में पुरावशेष जलभराव खत्म हो गया है। वहां भी काम शुरू हो गया है।
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इनका है ऐतिहासिक व धार्मिक महत्व
19वीं शताब्दी में कुशीनगर की खोज शुरू हुई। फाह्यान, ह्वेनसांग तथा इत्सिंग जैसे चीन के तीर्थ यात्रियों की डायरियों में उपलब्ध विवरण के अनुसार अंग्रेज इतिहासकार कुशीनगर को खोजते हुए 1870 के दशक में इधर आए। विशुनपुर बिंदवलिया ग्राम सभा में ऊंचे-ऊंचे टीलों के बीच सबकुछ तो मिट्टी के नीचे दबा छिपा था। महात्मा बुद्ध की एक प्रतिमा पीपल के वृक्ष के नीचे स्थित थी। इसी से कुशीनगर के खोज के लिए आगे की राह आसान की। 1876 में एसीएल कार्लाइल की अगुवाई में कुशीनगर के टीलों की खुदाई आरंभ हुई। माथा कुंवर की प्राचीन प्रतिमा 03.05 मीटर ऊंची भूमि स्पर्श मुद्रा में आसनस्थ है। भूमि स्पर्श मुद्रा को बुद्ध अभिप्रेरित ज्ञान जगत में अतिमहत्वपूर्ण मुद्राओं में स्थान प्राप्त है। माथा कुंवर बुद्ध मंदिर की यह प्रतिमा उसी ''भूमि स्पर्श मुद्रा'' में है। नालंदा विश्वविद्यालय के अवशेषों के निकट स्थित ''कृष्ण बुद्ध'' (तेलहवा बाबा) मंदिर भी माथा कुंवर मंदिर जैसी काले/नीलाश्म बलुआ पत्थर से बनी भूमिस्पर्श मुद्रा की मूर्ति स्थित है।
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हिंदू धर्म के लोग करते थे पूजा:-
नारायण के 9वें अवतार के रूप में महात्मा बुद्ध को हिंदू समाज भी पूजा करता है। भूमिस्पर्श मुद्रा की इस प्रतिमा के साथ ही आनुषांगिक रूप से अष्टभुजी दुर्गा, पद्मपाणि विष्णु, कुबेर, गंगा तथा यमुना जैसी दैवीय प्रतिमाएं भी उत्कीर्ण हैं, हिंदू तथा बौद्ध धर्म के एक मूल तथा एकनिष्ठता को भी अभिव्यक्त करती हैं। प्रतिमा तथा पूजा यह भी दर्शाती हैं कि हिंदू व बौद्ध धर्म के लोगों में शुरू से ही कोई मतभेद नहीं रहा है और दोनों एक दूसरे के धर्म का आदर करते हुए पूजा पाठ करते रहे हैं।
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बोधि प्राप्ति के लिए बुद्ध ने लिया था कठोर व्रत-
टूरिस्ट गाइड डॉ. अभय राय के मुताबिक राजकुमार सिद्धार्थ को ज्ञान की खोज में घर त्याग के करीब छह साल बीतने को थे। सिद्धार्थ यहां-वहां ज्ञान की खोज में घूमते फिरते तथा विभिन्न आचार्यों के मत-मतांतरों का परीक्षण करते हुए उरुवेला पहुंचे। उरुवेला (धर्मारण्य) की अवस्थिति दो महान नदियों-फल्गू तथा निरंजना के बीच के दोआब में है और उरुवेला के निकट ही इन दोनों नदियों का संगम स्थल स्थित होने के कारण उरुवेला में ये दोनों नदियां समानांतर रूप में एक दूसरे के निकट बहती हैं।
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कोट-
कुशीनगर में उत्खनित पुरावशेषों को बारिश के मौसम में जलभराव से बचाने का कोई ठोस प्रबंध नहीं है। धरोहरों व अवशेषों को जलभराव अथवा संरक्षण करने का मुद्दा विभाग का आंतरिक मामला है। बारिश के बाद अवशेषों के संरक्षण और साफ-सफाई के सवाल पर कहा कि बिना अवलोकन कुछ कहना उचित नहीं होगा। दिसंबर महीने में विजिट कर उत्खनित अवशेषों की अद्यतन स्थिति से अवगत होने के बाद ही कुछ कह सकूंगा।
-अविनाश मोहंती, अधीक्षण पुरातत्वविद्,भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (सारनाथ सर्किल)