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गुणवत्ताविहीन बचाव कार्य से कटान का खतरा
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अहिरौलीदान में कटान रोकने में जुटे मजदूर।
- फोटो : KUSHINAGAR
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गुणवत्ताविहीन बचाव कार्य से कटान का खतरा
1984 में पिरोजहा के पास और 2007 में घघवा जगदीश के निकट कट गया था एपी बांध
अमर उजाला ब्यूरो
तमकुहीरोड। गंडक नदी का डिस्चार्ज कम होने के बावजूद एपी बांध पर कटान का खतरा बरकरार है। बाढ़ खंड की ओर से कराए जा रहे बचाव कार्य की गुणवत्ता पर ग्रामीणों ने सवाल उठाया है। लोगों का कहना है कि यदि डिस्चार्ज बढ़ा तो कई गांवों के साथ एपी बांध को बचाना मुश्किल होगा। लोग 1984 में पिरोजहा के पास और 2007 में घघवा जगदीश के पास बांध के कटने की घटना याद कर सिहर जा रहे रहे हैं।
अहिरौलीदान से पिपराघाट तक 17 किलोमीटर की लंबाई में एपी बांध निरंतर कमजोर होता जा रहा है। उचित रखरखाव के अभाव में एपी बांध के साथ ही बांध की सुरक्षा के लिए बनाए गए सभी स्टड, स्पर, नोज आदि बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। आलम यह है कि यदि कही भी नदी अपना दबाव बढ़ा दे तो वहां का जर्जर बांध टूट सकता है। यह खतरा उस समय और भी बढ़ जाता है, जब नदी में पानी कम होता है। बाढ़ खंड की लापरवाही का ही नतीजा है कि लगातार दूसरे वर्ष भी नदी का दबाव अहिरौलीदान के नोनियापट्टी, खैरखूटा, मदरही, कचहरी टोला और डीह टोला पर बना हुआ है। पिछले साल डेढ़ सौ से अधिक मकान नदी में समा गए थे तो इस साल भी अब तक 50-60 घर विलीन हो चुके हैं। चार पांच दिनों से एपी बांध पर दबाव बढ़ गया है। ऐसी ही स्थिति रही तो 1984 और 2007 की विनाशलीला की पुनरावृत्ति हो सकती है।
वैसे इस बार स्थिति की गंभीरता को देखते हुए बाढ़ खंड द्वारा कही जियों बैग तो कही बोल्डर से कटान को रोकने और एपी बांध को सुरक्षित बनाने में लगा हुआ है। बुधवार को भी कटान जारी रहने के साथ बचाव कार्य भी जारी रहा। गांव के श्रीराम साह, सुखदेव सिंह, जगत यादव, संजय कुमार सिंह, सुरेंद्र गुप्ता, राघव राम, बहारन, मैनेजर, जयप्रकाश आदि का कहना है कि अभी मानसून एक माह से अधिक शेष है। ऐसे में कार्य गुणवत्ता को सही नहीं रखा गया तो नदी कभी भी तबाही ला सकती है। बाढ़ खंड के एक्सईएन भरत राम ने बताया कि बचाव कार्य जारी है और स्थिति पर नजर रखी जा रही है।
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1984 में पिरोजहा के पास और 2007 में घघवा जगदीश के निकट कट गया था एपी बांध
अमर उजाला ब्यूरो
तमकुहीरोड। गंडक नदी का डिस्चार्ज कम होने के बावजूद एपी बांध पर कटान का खतरा बरकरार है। बाढ़ खंड की ओर से कराए जा रहे बचाव कार्य की गुणवत्ता पर ग्रामीणों ने सवाल उठाया है। लोगों का कहना है कि यदि डिस्चार्ज बढ़ा तो कई गांवों के साथ एपी बांध को बचाना मुश्किल होगा। लोग 1984 में पिरोजहा के पास और 2007 में घघवा जगदीश के पास बांध के कटने की घटना याद कर सिहर जा रहे रहे हैं।
अहिरौलीदान से पिपराघाट तक 17 किलोमीटर की लंबाई में एपी बांध निरंतर कमजोर होता जा रहा है। उचित रखरखाव के अभाव में एपी बांध के साथ ही बांध की सुरक्षा के लिए बनाए गए सभी स्टड, स्पर, नोज आदि बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। आलम यह है कि यदि कही भी नदी अपना दबाव बढ़ा दे तो वहां का जर्जर बांध टूट सकता है। यह खतरा उस समय और भी बढ़ जाता है, जब नदी में पानी कम होता है। बाढ़ खंड की लापरवाही का ही नतीजा है कि लगातार दूसरे वर्ष भी नदी का दबाव अहिरौलीदान के नोनियापट्टी, खैरखूटा, मदरही, कचहरी टोला और डीह टोला पर बना हुआ है। पिछले साल डेढ़ सौ से अधिक मकान नदी में समा गए थे तो इस साल भी अब तक 50-60 घर विलीन हो चुके हैं। चार पांच दिनों से एपी बांध पर दबाव बढ़ गया है। ऐसी ही स्थिति रही तो 1984 और 2007 की विनाशलीला की पुनरावृत्ति हो सकती है।
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वैसे इस बार स्थिति की गंभीरता को देखते हुए बाढ़ खंड द्वारा कही जियों बैग तो कही बोल्डर से कटान को रोकने और एपी बांध को सुरक्षित बनाने में लगा हुआ है। बुधवार को भी कटान जारी रहने के साथ बचाव कार्य भी जारी रहा। गांव के श्रीराम साह, सुखदेव सिंह, जगत यादव, संजय कुमार सिंह, सुरेंद्र गुप्ता, राघव राम, बहारन, मैनेजर, जयप्रकाश आदि का कहना है कि अभी मानसून एक माह से अधिक शेष है। ऐसे में कार्य गुणवत्ता को सही नहीं रखा गया तो नदी कभी भी तबाही ला सकती है। बाढ़ खंड के एक्सईएन भरत राम ने बताया कि बचाव कार्य जारी है और स्थिति पर नजर रखी जा रही है।
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