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प्रतापगढ़: बाबुओं की करामात बताकर खुद को बचाने में जुटे अफसर
Sun, 08 Mar 2020 11:53 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाना ब्यूरा, न्यूज डेस्क, प्रतापगढ़
अमर उजाना ब्यूरा, न्यूज डेस्क, प्रतापगढ़
Published by: विनोद सिंह
Updated Sun, 08 Mar 2020 11:53 PM IST
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विकास विभाग के अफसरों और कर्मचारियों ने एमएलसी निधि में 19 लाख रुपये का गोलमाल कर डाला। एमएलसी रहे यशवंत सिंह के फर्जी लेटर पैड पर मिले प्रस्ताव से 19 लाख रुपये खर्च किए गए। निधि की बाबत पत्राचार करने पर एमएलसी यशवंत सिंह को मामले की जानकारी हुई।
उन्होंने दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए शासन को पत्र भेजा है। जल्द ही वह मुख्यमंत्री से मिलकर प्रकरण की जानकारी देंगे। निधि गोलमाल करने में अफसरों के फंसने की आशंका को देखते हुए मामले में लीपापोती तेज हो गई है।
विधान परिषद सदस्य यशवंत सिंह ने वित्तीय वर्ष 2016-17 में कुंडा विधानसभा के स्कूलों के लिए अपनी निधि से 20 लाख रुपये डीआरडीए को दिए थे। प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद यशवंत सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विधान परिषद सदस्य बनने के लिए अपनी सीट से इस्तीफा दे दिया था।
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बाद में उसी सीट पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ विधान परिषद सदस्य बने। स्कूल संचालकों ने तत्कालीन पीडी से संपर्क करते हुए धनराशि निर्गत करने की मांग की थी, लेकिन जवाब मिला था कि यशवंत सिंह के इस्तीफा देने के कारण उनकी निधि अब मुख्यमंत्री की होगी। उनके प्रस्ताव पर ही धनराशि खर्च होगी।
स्कूल संचालकों को लौटाने के बाद डीआरडीए के अफसरों की मिलीभगत से नाजिर शिव प्रसाद द्वारा दोबारा एमएलसी चुने गए यशवंत सिंह के फर्जी पत्र पर प्रस्ताव तैयार कर रामस्वरूप शिक्षा निकेतन इंटर कालेज मढ़ौली, ग्राम्य विकास इंटर कालेज मैनहा कली व श्रीमती सुखराजी ग्राम विकास प्राथमिक विद्यालय खमपुर दुबेपट्टी को 5-5 और डा. बृजेश कुमार पांडेय शिक्षण संस्थान सोनपुर ढकवा को 4 लाख रुपये दिए गए।
हाल ही में यशवंत सिंह ने अपने पूर्व के प्रस्ताव पर धनराशि के बारे में जानकारी मांगी। तब पता चला कि उनके द्वारा दी गई धनराशि दूसरे विद्यालयों को दे दी गई है।
उन्होंने कार्रवाई के लिए जिला प्रशासन को पत्र भेजा। मामला संज्ञान में आने के बाद सीडीओ डा. अमित पाल ने नाजिर शिवप्रसाद को सस्पेंड कर दिया। अब अपनी गर्दन फंसते देख अफसर प्रकरण की लीपापोती करने में जुट गए हैं।
इसके बाद मुख्य विकास अधिकारी के पटल से होकर परियोजना निदेशक तक अग्रसारित होकर पहुंचती है। उसके बाद पत्र लिपिक तक पहुंचता है। पत्र पर धनराशि तब तक जारी नहीं हो सकती है जब तक विकास विभाग के अफसर अपनी स्वीकृति नहीं देते।
नियमानुसार प्रस्ताव की पत्रावली पर जिनके भी हस्ताक्षर हैं, वे सब दोषी हैं। यदि शासन से जांच होती है तो विकास विभाग के कई अफसरों की गर्दन भी फंसेगी।
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उन्होंने दोषियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए शासन को पत्र भेजा है। जल्द ही वह मुख्यमंत्री से मिलकर प्रकरण की जानकारी देंगे। निधि गोलमाल करने में अफसरों के फंसने की आशंका को देखते हुए मामले में लीपापोती तेज हो गई है।
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विधान परिषद सदस्य यशवंत सिंह ने वित्तीय वर्ष 2016-17 में कुंडा विधानसभा के स्कूलों के लिए अपनी निधि से 20 लाख रुपये डीआरडीए को दिए थे। प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद यशवंत सिंह ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विधान परिषद सदस्य बनने के लिए अपनी सीट से इस्तीफा दे दिया था।
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बाद में उसी सीट पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ विधान परिषद सदस्य बने। स्कूल संचालकों ने तत्कालीन पीडी से संपर्क करते हुए धनराशि निर्गत करने की मांग की थी, लेकिन जवाब मिला था कि यशवंत सिंह के इस्तीफा देने के कारण उनकी निधि अब मुख्यमंत्री की होगी। उनके प्रस्ताव पर ही धनराशि खर्च होगी।
स्कूल संचालकों को लौटाने के बाद डीआरडीए के अफसरों की मिलीभगत से नाजिर शिव प्रसाद द्वारा दोबारा एमएलसी चुने गए यशवंत सिंह के फर्जी पत्र पर प्रस्ताव तैयार कर रामस्वरूप शिक्षा निकेतन इंटर कालेज मढ़ौली, ग्राम्य विकास इंटर कालेज मैनहा कली व श्रीमती सुखराजी ग्राम विकास प्राथमिक विद्यालय खमपुर दुबेपट्टी को 5-5 और डा. बृजेश कुमार पांडेय शिक्षण संस्थान सोनपुर ढकवा को 4 लाख रुपये दिए गए।
हाल ही में यशवंत सिंह ने अपने पूर्व के प्रस्ताव पर धनराशि के बारे में जानकारी मांगी। तब पता चला कि उनके द्वारा दी गई धनराशि दूसरे विद्यालयों को दे दी गई है।
उन्होंने कार्रवाई के लिए जिला प्रशासन को पत्र भेजा। मामला संज्ञान में आने के बाद सीडीओ डा. अमित पाल ने नाजिर शिवप्रसाद को सस्पेंड कर दिया। अब अपनी गर्दन फंसते देख अफसर प्रकरण की लीपापोती करने में जुट गए हैं।
उठ रहे सवाल, नाजिर दोषी तो अफसर कैसे पाक-साफ
विधान परिषद सदस्य के फर्जी प्रस्ताव पर 19 लाख रुपये के गोलमाल में केवल नाजिर शिव प्रसाद दोषी है, यह कहना शायद गलत होगा। अकेले लिपिक के वश की बात नहीं कि वह इतनी बड़ी रकम की हेराफेरी कर ले। एमएलसी यशवंत सिंह द्वारा अनुमोदित प्रस्ताव की चिट्ठी पहले जिलाधिकारी के पास पहुंचती है।इसके बाद मुख्य विकास अधिकारी के पटल से होकर परियोजना निदेशक तक अग्रसारित होकर पहुंचती है। उसके बाद पत्र लिपिक तक पहुंचता है। पत्र पर धनराशि तब तक जारी नहीं हो सकती है जब तक विकास विभाग के अफसर अपनी स्वीकृति नहीं देते।
नियमानुसार प्रस्ताव की पत्रावली पर जिनके भी हस्ताक्षर हैं, वे सब दोषी हैं। यदि शासन से जांच होती है तो विकास विभाग के कई अफसरों की गर्दन भी फंसेगी।