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...तो मोहन का भी कुनबा हो जाता खाक
ब्यूरो/अमर उजाला, कौशाम्बी
Updated Sat, 10 Jan 2015 12:02 AM IST
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झोपड़े में लगी आग पति और तीन मासूम बच्चों को गंवाने वाली सुदामा देवी हादसे के बाद बेसुध है। पर, यह उसकी ही चीखें थी। जिससे हादसे का शिकार होने से एक और भट्ठा मजदूर मोहन का परिवार आज जिंदा है। खुद मोहन की बेटी ने सुबकते हुए यह खुलासा किया है। उधर, हादसे में 4 मौतों के इस मंजर से भट्ठा मजदूर सकते में हैं।
बता दें कि बृहस्पतिवार की आधी रात लगी आग में जलने से भट्ठे में काम करने वाली सुदामा देवी के पति राजेंद्र और उसके तीन बच्चों की मौत हो गई। झोपड़ी में आग लगी देख वह चीखते-चिल्लाते सालभर के बेटे को लेकर बाहर भागी थी। उसकी झोपड़ी से ही सटी हुई मजदूर मोहन की झोपड़ी है। जिसमें मोहन के साथ ही उसकी बेटी उर्मिला देवी (25), निर्मला देवी (18), बेटा अरुण (14), प्रमिला (10) के साथ रहता है। रात राजेंद्र के साथ उसकी भी झोपड़ी में आग लग गई थी। पर, उसकी झोपड़ी जलती, इससे पहले ही सुदामा देवी की चीख-पुकार पर वह और उसके बच्चों की नींद खुल गई थी। सभी उठकर बाहर भागे, तो उन्हें झोपड़ी में आग लगी होने की जानकारी हुई। इसके बाद मोहन और उसके बच्चे भी चीखने-चिल्लाने लगे। मोहन और उसकी बेटी उर्मिला सिसकते-सिसकते यही कहते रहे, कि यदि चीखें सुनकर वे लोग बाहर नहीं निकलते, तो शायद आज जिंदा नहीं बचते। उधर, हादसे में पति और तीन मासूम बच्चों को गंवाने वाली सुदामा देवी और उसकी सास गुड़िया देवी घटना के बाद से ही बुत बनी हुई है। उसकी हालत देख आसपास की महिलाएं भी अपने आंसू नहीं रोक पा रही थी।
आग में भट्ठा मजदूर और उसके तीन बच्चों की मौत का गम और गुस्सा पिपरकुंडी गांव के लोगों में भी दिखा। हुआ यह है कि जब पुलिस शव को टेंपो में डालकर पोस्टमार्टम के लिए भेजने लगी, तो तमतमाए गांववाले मुआवजे की मांग को लेकर टेंपो के सामने सड़क पर खड़े हो गए। इस दौरान ग्रामीणों की पुलिस वालों से झड़प भी हुई। एसओ के लाख समझाने के बाद भी वे शव को पोस्टमार्टम के लिए नहीं ले जाने दे रहे थे। उनकी मांग थी कि इस मजदूर के पास एक बिस्वा जमीन नहीं है। पति, बच्चों की जान चली गई है। अब यह महिला कैसे अपनी जिंदगी काटेगी। सूचना पर आए तहसीलदार ने एडीएम से बात की। इसके बाद तहसीलदार ने गांववालों को बताया कि इस पीड़ित परिवार को 1.50 लाख रुपये की आर्थिक मदद शासन से दिलाई जाएगी। साथ ही पारिवारिक लाभ योजना और पेंशन आदि का भी बंदोबस्त किया जाएगा। तहसीलदार के इस आश्वासन के बाद ही ग्रामीण शांत हुए। तब कहीं जाकर पुलिस शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज सकी।
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बता दें कि बृहस्पतिवार की आधी रात लगी आग में जलने से भट्ठे में काम करने वाली सुदामा देवी के पति राजेंद्र और उसके तीन बच्चों की मौत हो गई। झोपड़ी में आग लगी देख वह चीखते-चिल्लाते सालभर के बेटे को लेकर बाहर भागी थी। उसकी झोपड़ी से ही सटी हुई मजदूर मोहन की झोपड़ी है। जिसमें मोहन के साथ ही उसकी बेटी उर्मिला देवी (25), निर्मला देवी (18), बेटा अरुण (14), प्रमिला (10) के साथ रहता है। रात राजेंद्र के साथ उसकी भी झोपड़ी में आग लग गई थी। पर, उसकी झोपड़ी जलती, इससे पहले ही सुदामा देवी की चीख-पुकार पर वह और उसके बच्चों की नींद खुल गई थी। सभी उठकर बाहर भागे, तो उन्हें झोपड़ी में आग लगी होने की जानकारी हुई। इसके बाद मोहन और उसके बच्चे भी चीखने-चिल्लाने लगे। मोहन और उसकी बेटी उर्मिला सिसकते-सिसकते यही कहते रहे, कि यदि चीखें सुनकर वे लोग बाहर नहीं निकलते, तो शायद आज जिंदा नहीं बचते। उधर, हादसे में पति और तीन मासूम बच्चों को गंवाने वाली सुदामा देवी और उसकी सास गुड़िया देवी घटना के बाद से ही बुत बनी हुई है। उसकी हालत देख आसपास की महिलाएं भी अपने आंसू नहीं रोक पा रही थी।
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आग में भट्ठा मजदूर और उसके तीन बच्चों की मौत का गम और गुस्सा पिपरकुंडी गांव के लोगों में भी दिखा। हुआ यह है कि जब पुलिस शव को टेंपो में डालकर पोस्टमार्टम के लिए भेजने लगी, तो तमतमाए गांववाले मुआवजे की मांग को लेकर टेंपो के सामने सड़क पर खड़े हो गए। इस दौरान ग्रामीणों की पुलिस वालों से झड़प भी हुई। एसओ के लाख समझाने के बाद भी वे शव को पोस्टमार्टम के लिए नहीं ले जाने दे रहे थे। उनकी मांग थी कि इस मजदूर के पास एक बिस्वा जमीन नहीं है। पति, बच्चों की जान चली गई है। अब यह महिला कैसे अपनी जिंदगी काटेगी। सूचना पर आए तहसीलदार ने एडीएम से बात की। इसके बाद तहसीलदार ने गांववालों को बताया कि इस पीड़ित परिवार को 1.50 लाख रुपये की आर्थिक मदद शासन से दिलाई जाएगी। साथ ही पारिवारिक लाभ योजना और पेंशन आदि का भी बंदोबस्त किया जाएगा। तहसीलदार के इस आश्वासन के बाद ही ग्रामीण शांत हुए। तब कहीं जाकर पुलिस शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज सकी।
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