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मनरेगा: 48 सौ मजदूरों ने किया पलायन
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मनरेगा: 48 सौ मजदूरों ने किया पलायन
कौशाम्बी ब्लॉक में 25 हजार 123 है मनरेगा मजदूरों की संख्या
काम नहीं मिल पाने के कारण करना पड़ रहा परेशानी का सामना
अमर उजाला ब्यूरो
बारा। कौशाम्बी विकास खंड क्षेत्र में मनरेगा की हालत बद से बदतर है। हालत यह है कि मजदूरों को काम नहीं मिल पा रहा है। रोजगार की तलाश में करीब 48 सौ श्रमिक शहरों की ओर पलायन कर गए हैं। बड़ी बात है कि इसकी जानकारी होने के बाद भी जिम्मेदार अफसर हाथ पर हाथ धरे बैठे हुए हैं।
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) की शुरूआत दो अक्तूबर 2005 को की गई। इस योजना की शुरूआत करने के पीछे केंद्र सरकार की मंशा प्रत्येक वित्तीय वर्ष में किसी भी ग्रामीण परिवार के उन वयस्क सदस्यों को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराने की थी, जो प्रतिदिन 220 रुपये की न्यूनतम मजदूरी पर सार्वजनिक कार्य करने को तैयार हों। हैरान करने वाली बात है कि कौशाम्बी विकास खंड क्षेत्र में सौ दिन छोड़िए, श्रमिकों को काम मिल ही नहीं पा रहा है। इस ब्लॉक में मनरेगा के जॉब कार्डधारकों की संख्या 25 हजार 123 है। सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि करीब चार हजार 835 मजदूर काम नहीं मिल पाने के कारण शहरों की ओर पलायन कर गए हैं। उदाहरण के तौर पर देखें तो मोहिउद्दीनपुर देवछार में करीब 440 जॉब कार्ड धारक हैं।इनमें 60 को काम नहीं मिल पाया है। गांव के श्रमिक अमृत लाल, अमरनाथ, रामसूरत आदि का कहना है कि परदेश में न कमाया जाए तो बीवी-बच्चों का पेट पालना मुश्किल होगा। ऐसे ही सचवारा में 442 के सापेक्ष 94, कायमपुर में 235 के सापेक्ष 65, सोंधिया में 802 के सापेक्ष 276 और भटवरिया में 278 के सापेक्ष 36 मजदूरों को काम नहीं मिला है। कमोवेश यही हाल इलाके के मुस्तफाबाद, रसूलपुर बड़गांव, मकदूमपुर ढोसकहा आदि गांवों का भी है। मामले में अतिरिक्त कार्यक्रम अधिकारी राहुल मिश्र का कहना है कि बरसात की वजह से कार्य प्रभावित जरूर है, लेकिन, मनरेगा के तहत नाली, समतलीकरण, नाला, चकमार्ग आदि का निर्माण कार्य शुरू है। सभी जॉब कार्डधारकों को रोजगार देने का पूरा प्रयास किया जा रहा है।
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कौशाम्बी ब्लॉक में 25 हजार 123 है मनरेगा मजदूरों की संख्या
काम नहीं मिल पाने के कारण करना पड़ रहा परेशानी का सामना
अमर उजाला ब्यूरो
बारा। कौशाम्बी विकास खंड क्षेत्र में मनरेगा की हालत बद से बदतर है। हालत यह है कि मजदूरों को काम नहीं मिल पा रहा है। रोजगार की तलाश में करीब 48 सौ श्रमिक शहरों की ओर पलायन कर गए हैं। बड़ी बात है कि इसकी जानकारी होने के बाद भी जिम्मेदार अफसर हाथ पर हाथ धरे बैठे हुए हैं।
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) की शुरूआत दो अक्तूबर 2005 को की गई। इस योजना की शुरूआत करने के पीछे केंद्र सरकार की मंशा प्रत्येक वित्तीय वर्ष में किसी भी ग्रामीण परिवार के उन वयस्क सदस्यों को 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराने की थी, जो प्रतिदिन 220 रुपये की न्यूनतम मजदूरी पर सार्वजनिक कार्य करने को तैयार हों। हैरान करने वाली बात है कि कौशाम्बी विकास खंड क्षेत्र में सौ दिन छोड़िए, श्रमिकों को काम मिल ही नहीं पा रहा है। इस ब्लॉक में मनरेगा के जॉब कार्डधारकों की संख्या 25 हजार 123 है। सरकारी आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि करीब चार हजार 835 मजदूर काम नहीं मिल पाने के कारण शहरों की ओर पलायन कर गए हैं। उदाहरण के तौर पर देखें तो मोहिउद्दीनपुर देवछार में करीब 440 जॉब कार्ड धारक हैं।इनमें 60 को काम नहीं मिल पाया है। गांव के श्रमिक अमृत लाल, अमरनाथ, रामसूरत आदि का कहना है कि परदेश में न कमाया जाए तो बीवी-बच्चों का पेट पालना मुश्किल होगा। ऐसे ही सचवारा में 442 के सापेक्ष 94, कायमपुर में 235 के सापेक्ष 65, सोंधिया में 802 के सापेक्ष 276 और भटवरिया में 278 के सापेक्ष 36 मजदूरों को काम नहीं मिला है। कमोवेश यही हाल इलाके के मुस्तफाबाद, रसूलपुर बड़गांव, मकदूमपुर ढोसकहा आदि गांवों का भी है। मामले में अतिरिक्त कार्यक्रम अधिकारी राहुल मिश्र का कहना है कि बरसात की वजह से कार्य प्रभावित जरूर है, लेकिन, मनरेगा के तहत नाली, समतलीकरण, नाला, चकमार्ग आदि का निर्माण कार्य शुरू है। सभी जॉब कार्डधारकों को रोजगार देने का पूरा प्रयास किया जा रहा है।
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