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हादसे में जख्मी दोआबा के सपूत की थमीं सांसें
अमर उजाला ब्यूरो, कौशाम्बी
Updated Fri, 04 Dec 2015 11:01 PM IST
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ट्रेन से गिरकर जख्मी हुए कौशाम्बी के सीआरपीएफ जवान शिवशंकर दिवाकर की बृहस्पतिवार को इलाज के दौरान दिल्ली में मौत हो गई। झारखंड में तैनात दोआबा का यह सपूत डेढ़ महीने पहले छुट्टी पर घर आते समय सासाराम (बिहार) में घायल हो गया था। शुक्रवार को साथी जवान उसका पार्थिव शरीर लेकर गांव पहुंचे, तो परिवार में कोहराम मच गया। अपराह्न गांव के समीप ही यमुना तट पर अंतिम संस्कार किया गया। साथ आए जवानों ने वीर सपूत को सलामी देकर अंतिम विदाई दी। उस समय घाट पर मौजूद सैकड़ों लोगों की आंखें नम हो गई।
कौशाम्बी के गढ़वा (कोसम खिराज) गांव निवासी शिवशंकर दिवाकर (33) पुत्र छेदीलाल केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की 158 वीं बटालियन में सिपाही था। पांच भाईयों में सबसे छोटे शिवशंकर की तैनाती इन दिनों सतरा (झारखंड) में थी। 17 अक्तूबर को वह छुट्टी पर घर आने से लिए निकला था। रास्ते में सासाराम स्टेशन पर वह उतरते समय पैर फिसलने से गिरकर गंभीररूप से जख्मी हो गया था। तब उसे स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया गया था। बाद में तबीयत बिगड़ने पर पहले उसे वाराणसी, इलाहाबाद फिर दिल्ली के एक निजी हास्पिटल में दाखिल कराया गया।
जहां बृहस्पतिवार को उसकी सांसें थम गईं। दिल्ली से उसका पार्थिव शरीर फाफामऊ (इलाहाबाद) स्थित सीआरपीएफ कार्यालय आया। जहां से एसआई विश्वमोहन 15 जवानों के साथ राजकीय वाहन से पार्थिव शरीर लेकर शुक्रवार की सुबह गढ़वा गांव पहुंचे। पार्थिव शरीर देखते ही पत्नी, मां-बाप, भाई बहन और परिवार के अन्य सदस्य बिलख पड़े। दहाड़ें मार-मारकर रो रहे परिजनों को ढांढस बंधाने वाले ग्रामीण भी अपने आंसू नहीं रोक पा रहे थे। दोपहर तक दरवाजे पर रखे पार्थिव शरीर का अपराह्न दो बजे अंतिम संस्कार किया गया। इस दौरान सीआरपीएफ के साथी जवानों ने शस्त्र झुकाकर सपूत को आखिरी सलामी दी। क्षेत्र के इस सपूत को आखिरी विदाई देने को हजारों की संख्या में लोग मौजूद रहे।
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कौशाम्बी के गढ़वा गांव का सीआरपीएफ का जवान शिवशंकर दिवाकर घायल होने के बाद से 47 दिनों तक जीवन-मौत की जंग लड़ता रहा। 17 अक्तूबर को घर आने के दौरान सासाराम स्टेशन पर ट्रेन से जख्मी होकर गिरने पर उसे बोगी में मौजूद जवानों ने स्थानीय अस्पताल में दाखिल कराते हुए बटालियन के अफसरों और घरवालों को सूचना दी थी। दो दिनों तक सासाराम में भर्ती शिवशंकर ही हालत बिगड़ने पर उसे वाराणसी लाया गया। 10 दिनों तक वाराणसी के निजी हास्पिटल में दाखिल जवान की तबीयत में सुधार नहीं होने पर परिजन उसे लेकर पहले इलाहाबाद आए। यहां भी 15 दिनों तक इलाज कराया गया था। तबीयत में सुधार नहीं होने पर इलाहाबाद से उसे दिल्ली रेफर किया गया। जहां 17 दिनों तक वह जीवन-मौत की जंग लड़ता हुआ दुनिया को अलविदा कह गया।
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कौशाम्बी के गढ़वा (कोसम खिराज) गांव निवासी शिवशंकर दिवाकर (33) पुत्र छेदीलाल केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की 158 वीं बटालियन में सिपाही था। पांच भाईयों में सबसे छोटे शिवशंकर की तैनाती इन दिनों सतरा (झारखंड) में थी। 17 अक्तूबर को वह छुट्टी पर घर आने से लिए निकला था। रास्ते में सासाराम स्टेशन पर वह उतरते समय पैर फिसलने से गिरकर गंभीररूप से जख्मी हो गया था। तब उसे स्थानीय अस्पताल में भर्ती कराया गया था। बाद में तबीयत बिगड़ने पर पहले उसे वाराणसी, इलाहाबाद फिर दिल्ली के एक निजी हास्पिटल में दाखिल कराया गया।
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जहां बृहस्पतिवार को उसकी सांसें थम गईं। दिल्ली से उसका पार्थिव शरीर फाफामऊ (इलाहाबाद) स्थित सीआरपीएफ कार्यालय आया। जहां से एसआई विश्वमोहन 15 जवानों के साथ राजकीय वाहन से पार्थिव शरीर लेकर शुक्रवार की सुबह गढ़वा गांव पहुंचे। पार्थिव शरीर देखते ही पत्नी, मां-बाप, भाई बहन और परिवार के अन्य सदस्य बिलख पड़े। दहाड़ें मार-मारकर रो रहे परिजनों को ढांढस बंधाने वाले ग्रामीण भी अपने आंसू नहीं रोक पा रहे थे। दोपहर तक दरवाजे पर रखे पार्थिव शरीर का अपराह्न दो बजे अंतिम संस्कार किया गया। इस दौरान सीआरपीएफ के साथी जवानों ने शस्त्र झुकाकर सपूत को आखिरी सलामी दी। क्षेत्र के इस सपूत को आखिरी विदाई देने को हजारों की संख्या में लोग मौजूद रहे।
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कौशाम्बी के गढ़वा गांव का सीआरपीएफ का जवान शिवशंकर दिवाकर घायल होने के बाद से 47 दिनों तक जीवन-मौत की जंग लड़ता रहा। 17 अक्तूबर को घर आने के दौरान सासाराम स्टेशन पर ट्रेन से जख्मी होकर गिरने पर उसे बोगी में मौजूद जवानों ने स्थानीय अस्पताल में दाखिल कराते हुए बटालियन के अफसरों और घरवालों को सूचना दी थी। दो दिनों तक सासाराम में भर्ती शिवशंकर ही हालत बिगड़ने पर उसे वाराणसी लाया गया। 10 दिनों तक वाराणसी के निजी हास्पिटल में दाखिल जवान की तबीयत में सुधार नहीं होने पर परिजन उसे लेकर पहले इलाहाबाद आए। यहां भी 15 दिनों तक इलाज कराया गया था। तबीयत में सुधार नहीं होने पर इलाहाबाद से उसे दिल्ली रेफर किया गया। जहां 17 दिनों तक वह जीवन-मौत की जंग लड़ता हुआ दुनिया को अलविदा कह गया।