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Kaushambi News: बायोगैस की लौ से जली उम्मीद... गैस संकट से मिली राहत
Mon, 06 Apr 2026 01:00 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कौशांबी
संवाद न्यूज एजेंसी, कौशांबी
Updated Mon, 06 Apr 2026 01:00 AM IST
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बायोगैस प्लांट दिखाती सोना देवी । संवाद
अंतरराष्ट्रीय हालात के चलते एलपीजी आपूर्ति प्रभावित होने से जहां आम उपभोक्ताओं को गैस सिलिंडर के लिए परेशान होना पड़ रहा है, वहीं विकास खंड नेवादा के अमिरसा गांव के किसानों ने इसका कारगर समाधान निकाल लिया है। गांव में लगाया गया बायोगैस प्लांट अब ग्रामीणों के लिए मुख्य ईंधन स्रोत बन चुका है।
ग्राम प्रधान सीमा मिश्रा के अनुसार, समग्र ग्रामीण विकास कार्यक्रम के तहत एचडीएफसी बैंक के सहयोग से वर्ष 2023 में गांव में बायोगैस प्लांट स्थापित किया। एक प्लांट की लागत करीब 50 हजार रुपये है, जिसमें लाभार्थी किसानों को मात्र 10 प्रतिशत यानी पांच हजार रुपये का योगदान देना पड़ता है। शेष राशि योजना के तहत वहन की जाती है।
उन्होंने बताया कि यह प्लांट 10 से 12 सदस्यीय परिवार की दैनिक जरूरतों को पूरा करने में सक्षम है। इसमें प्रतिदिन 20 से 25 किलो गोबर व जैविक कचरा डालने पर लगातार गैस का उत्पादन होता रहता है। पिछले तीन वर्षों से ये प्लांट सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं, जिससे गांव में एलपीजी पर निर्भरता लगभग खत्म हो गई है।
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गांव में अब तक नौ अतिरिक्त बायोगैस प्लांट भी लगाए जा चुके हैं, जिनका लाभ नीलम मिश्रा, गोकर्ण पांडेय, सोना देवी, सोनू सिंह, शिवशंकर, वासुदेव यादव, रजनीश और धर्मेंद्र सहित कई परिवार उठा रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि इस योजना का और विस्तार किया जाए, तो गांव की अधिकांश आबादी को एलपीजी संकट से राहत मिल सकती है।
ऐसे काम करता है बायोगैस
गैस सिलिंडर की किल्लत और बढ़ती कीमतों के बीच गांवों में बायोगैस प्लांट एक सस्ता और टिकाऊ विकल्प बनकर उभरा है। एक बड़े प्लास्टिक ट्यूब आधारित इस प्लांट में टब के माध्यम से गोबर का घोल डाला जाता है, जो अंदर स्टोर होकर धीरे-धीरे गैस में परिवर्तित हो जाता है। इससे तैयार होने वाली गैस पाइप के जरिए सीधे रसोई तक पहुंचती है और चूल्हे के बर्नर पर बिल्कुल एलपीजी जैसी लौ देती है। इससे ग्रामीण परिवार आसानी से नाश्ता और भोजन तैयार कर रहे हैं, जिससे सिलिंडर पर निर्भरता कम हो रही है।
वेस्ट मटेरियल बन रही जैविक खाद
बायोगैस प्लांट का एक और बड़ा फायदा यह है कि इससे निकलने वाला अवशेष खेतों के लिए उत्तम जैविक खाद का काम करता है। इससे फसल की गुणवत्ता बेहतर होती है और रासायनिक खाद पर खर्च भी घटता है।
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ग्राम प्रधान सीमा मिश्रा के अनुसार, समग्र ग्रामीण विकास कार्यक्रम के तहत एचडीएफसी बैंक के सहयोग से वर्ष 2023 में गांव में बायोगैस प्लांट स्थापित किया। एक प्लांट की लागत करीब 50 हजार रुपये है, जिसमें लाभार्थी किसानों को मात्र 10 प्रतिशत यानी पांच हजार रुपये का योगदान देना पड़ता है। शेष राशि योजना के तहत वहन की जाती है।
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उन्होंने बताया कि यह प्लांट 10 से 12 सदस्यीय परिवार की दैनिक जरूरतों को पूरा करने में सक्षम है। इसमें प्रतिदिन 20 से 25 किलो गोबर व जैविक कचरा डालने पर लगातार गैस का उत्पादन होता रहता है। पिछले तीन वर्षों से ये प्लांट सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं, जिससे गांव में एलपीजी पर निर्भरता लगभग खत्म हो गई है।
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गांव में अब तक नौ अतिरिक्त बायोगैस प्लांट भी लगाए जा चुके हैं, जिनका लाभ नीलम मिश्रा, गोकर्ण पांडेय, सोना देवी, सोनू सिंह, शिवशंकर, वासुदेव यादव, रजनीश और धर्मेंद्र सहित कई परिवार उठा रहे हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि इस योजना का और विस्तार किया जाए, तो गांव की अधिकांश आबादी को एलपीजी संकट से राहत मिल सकती है।
ऐसे काम करता है बायोगैस
गैस सिलिंडर की किल्लत और बढ़ती कीमतों के बीच गांवों में बायोगैस प्लांट एक सस्ता और टिकाऊ विकल्प बनकर उभरा है। एक बड़े प्लास्टिक ट्यूब आधारित इस प्लांट में टब के माध्यम से गोबर का घोल डाला जाता है, जो अंदर स्टोर होकर धीरे-धीरे गैस में परिवर्तित हो जाता है। इससे तैयार होने वाली गैस पाइप के जरिए सीधे रसोई तक पहुंचती है और चूल्हे के बर्नर पर बिल्कुल एलपीजी जैसी लौ देती है। इससे ग्रामीण परिवार आसानी से नाश्ता और भोजन तैयार कर रहे हैं, जिससे सिलिंडर पर निर्भरता कम हो रही है।
वेस्ट मटेरियल बन रही जैविक खाद
बायोगैस प्लांट का एक और बड़ा फायदा यह है कि इससे निकलने वाला अवशेष खेतों के लिए उत्तम जैविक खाद का काम करता है। इससे फसल की गुणवत्ता बेहतर होती है और रासायनिक खाद पर खर्च भी घटता है।

बायोगैस प्लांट दिखाती सोना देवी । संवाद