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Kaushambi News: घर-गांव की समृद्धि के लिए छोड़ दी कुवैत में एक करोड़ की नौकरी
Fri, 26 Jan 2024 03:41 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कौशांबी
संवाद न्यूज एजेंसी, कौशांबी
Updated Fri, 26 Jan 2024 03:41 AM IST
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मंझनपुर में बना बायो एनर्जी प्लांट। संवाद
अपना घर, गांव और जिला समृद्ध होगा तो राष्ट्र की समृद्धि भी तय है। इस सोच के साथ युवा इंजीनियर ने कुवैत में एक करोड़ के सालाना पैकेज वाली सरकारी नौकरी ठुकरा दी। विदेश से लौटकर कौशाम्बी में ग्रीन एनर्जी का प्लांट लगा दिया ताकि, पशुपालन और खेती तक सीमित इस जिले में भी उद्योगाें को बढ़ावा मिल सके।
यह कहानी मंझनपुर के नयानगर द्वितीय के विपिन केसरवानी की है। आईआईटी, धनबाद से वर्ष 2012 में पेट्रोलियम इंजीनियरिंग करने के बाद विपिन ने गुजरात में एक अन्य सहयोगी के साथ रिफाइनरीज टैंक की क्लीनिक का प्लांट लगाया।
इस बीच वर्ष 2017 में कुवैत की ऑयल कंपनी में सरकारी नौकरी लग गई। विपिन बताते हैं, अपने कौशाम्बी में रोजगार का संकट सोचकर कुवैत में मन नहीं लगा रहा था। सो कुछ बेहतर करने के इरादे से वर्ष 2022 में नौकरी छोड़कर वतन लौट आए।
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उद्योगों की स्थापना से ही विकास की राह बनती है, सो मंझनपुर में सिराथू रोड पर कोर्रईं के पास दो करोड़ रुपये की लागत से बायो एनर्जी का प्लांट लगाया। इसमें मंझनपुर के संदीप केसरवानी, सोनू और गुजरात के तपस वाल्दिया का भी सहयोग लिया, जिससे बजट की दिक्कत नहीं आई।
विपिन बताते हैं, करीब एक वर्ष पहले शुरू हुई फैक्टरी से बहुत मुनाफा तो नहीं निकल रहा, लेकिन सुकून इस बात से है कि कम से कम क्षेत्र के 25 लोगों को रोजगार मिल रहा है।
फैक्टरी में बनते हैं प्रदूषण मुक्त बायो पैलेट्स
विपिन के कारखाने में लकड़ी के बुरादे और सरसों की भूसी से बायो पैलेट्स बनाए जाते हैं। इनका प्रयोग कोयले की तरह ईंधन के रूप में होता है। कच्चा माल जिले में ही मिल जाता है। कोयले के जलने पर धुआं तथा कॉर्बनिक गैसें निकलती हैं, लेकिन बायो पैलेट्स में न धुआं होता है और न ही कोई गैस निकलती है। इस तरह यह पैलेट्स मानव शरीर और पर्यावरण दोनों के लिए सुरक्षित हैं।
प्रदेश में हैं सिर्फ दो कारखाने
विपिन बताते हैं कि बॉयो पैलेट्स बनाने वाले कारखाने प्रदेश में कई हैं, लेकिन इन कारखानों में बड़ी-बड़ी फैक्टरियों के लिए ईंधन बनाया जाता है। जबकि, मेरे कारखाने में छह एमएम आकार के बायो पैलेट्स बनते है, जिनका उपयोग होटलों, ढाबों और नमकीन आदि बनाने वाले कारखानों में होता है। प्रदेश में इसके सिर्फ दो कारखाने हैं। एक कौशाम्बी जबकि दूसरा लखनऊ में है।
यूपी के साथ एमपी और बिहार में भी होती आपूर्ति
विपिन केसरवानी कहते हैं, इस बायो पैलेट्स के उपयोग के लिए विशेष भट्ठी आती है। जिले के होटलों में इनका प्रयोग बढ़ रहा है। कोयले और बायो पैलेट्स के दाम में बहुत अंतर नहीं होता। फैक्टरी में प्रतिदिन करीब आठ से 10 टन बायो पैलेट्स बनते हैं। कौशाम्बी के अलावा प्रयागराज, लखनऊ, बिहार, पटना और मध्यप्रदेश के कटनी तक इसकी आपूर्ति हो रही है।
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यह कहानी मंझनपुर के नयानगर द्वितीय के विपिन केसरवानी की है। आईआईटी, धनबाद से वर्ष 2012 में पेट्रोलियम इंजीनियरिंग करने के बाद विपिन ने गुजरात में एक अन्य सहयोगी के साथ रिफाइनरीज टैंक की क्लीनिक का प्लांट लगाया।
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इस बीच वर्ष 2017 में कुवैत की ऑयल कंपनी में सरकारी नौकरी लग गई। विपिन बताते हैं, अपने कौशाम्बी में रोजगार का संकट सोचकर कुवैत में मन नहीं लगा रहा था। सो कुछ बेहतर करने के इरादे से वर्ष 2022 में नौकरी छोड़कर वतन लौट आए।
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उद्योगों की स्थापना से ही विकास की राह बनती है, सो मंझनपुर में सिराथू रोड पर कोर्रईं के पास दो करोड़ रुपये की लागत से बायो एनर्जी का प्लांट लगाया। इसमें मंझनपुर के संदीप केसरवानी, सोनू और गुजरात के तपस वाल्दिया का भी सहयोग लिया, जिससे बजट की दिक्कत नहीं आई।
विपिन बताते हैं, करीब एक वर्ष पहले शुरू हुई फैक्टरी से बहुत मुनाफा तो नहीं निकल रहा, लेकिन सुकून इस बात से है कि कम से कम क्षेत्र के 25 लोगों को रोजगार मिल रहा है।
फैक्टरी में बनते हैं प्रदूषण मुक्त बायो पैलेट्स
विपिन के कारखाने में लकड़ी के बुरादे और सरसों की भूसी से बायो पैलेट्स बनाए जाते हैं। इनका प्रयोग कोयले की तरह ईंधन के रूप में होता है। कच्चा माल जिले में ही मिल जाता है। कोयले के जलने पर धुआं तथा कॉर्बनिक गैसें निकलती हैं, लेकिन बायो पैलेट्स में न धुआं होता है और न ही कोई गैस निकलती है। इस तरह यह पैलेट्स मानव शरीर और पर्यावरण दोनों के लिए सुरक्षित हैं।
प्रदेश में हैं सिर्फ दो कारखाने
विपिन बताते हैं कि बॉयो पैलेट्स बनाने वाले कारखाने प्रदेश में कई हैं, लेकिन इन कारखानों में बड़ी-बड़ी फैक्टरियों के लिए ईंधन बनाया जाता है। जबकि, मेरे कारखाने में छह एमएम आकार के बायो पैलेट्स बनते है, जिनका उपयोग होटलों, ढाबों और नमकीन आदि बनाने वाले कारखानों में होता है। प्रदेश में इसके सिर्फ दो कारखाने हैं। एक कौशाम्बी जबकि दूसरा लखनऊ में है।
यूपी के साथ एमपी और बिहार में भी होती आपूर्ति
विपिन केसरवानी कहते हैं, इस बायो पैलेट्स के उपयोग के लिए विशेष भट्ठी आती है। जिले के होटलों में इनका प्रयोग बढ़ रहा है। कोयले और बायो पैलेट्स के दाम में बहुत अंतर नहीं होता। फैक्टरी में प्रतिदिन करीब आठ से 10 टन बायो पैलेट्स बनते हैं। कौशाम्बी के अलावा प्रयागराज, लखनऊ, बिहार, पटना और मध्यप्रदेश के कटनी तक इसकी आपूर्ति हो रही है।

मंझनपुर में बना बायो एनर्जी प्लांट। संवाद