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गलन के कारण घरों में दुबक रहे लोग
अमर उजाला ब्यूरो कौशाम्बी
Updated Fri, 13 Jan 2017 12:10 AM IST
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गुरुवार भोर में अपनी सेहत को लेकर फिक्रमंद लोग घरों से बाहर निकले तो जमीन व हरी घास में जमी ओस यानि बर्फ को देखकर कांप उठे। अपनी सेहत व शौक को भूलकर लोग घरों में दुबक गए। साथ ही घरवालों को हिदायत दी कि वह किसी तरह की लापरवाही न करें। यही हाल था अधिकांश लोगों का। सुबह और शाम की गलन इतनी थी कि लोग थर-थर कांपते रहे।
दोआबा दस दिनों तक घने कोहरे की चादर ओढ़े रहा। इस दौरान सूर्य के ओझल होने से कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। बुधवार की सुबह से खिली धूप निकली तो लोगों के चेहरे भी खिले। लोगों को लगा कि ठंड से अब जल्द निजात मिल सकेगी। यही हाल बुधवार को भी रहा। बुधवार भोर में रिटायर्ड शिक्षक रणछोर सिंह, रामजी लाल गुप्ता, शिक्षक विनोद श्रीवास्तव, राजीव सिंह, सुनील शुक्ला, किसान विजय शुक्ला, श्रवण, उत्तम आदि निकले तो देखा कि ओस जमीन व हरी घास में जमी थी।
यह गलन का असर था। ठंड के इस मिजाज को देखते ही लोग अपने-अपने घरों में ही कैद हो गए। साथ ही परिजनों को सलाह दी कि वह घरों में रहेें और लापरवाही न करें। यही हाल गांव व देहात का रहा। गुरुवार की सुबह आठ बजे से मौसम खुल गया था। धूप निकली तो लोगों ने धूप का आनंद लिया, लेकिन तीन बजे के बाद हवा के साथ गलन बढ़ी तो लोग कांप उठे। शाम को स्थिति ऐसी हुई कि लोगों का वाहनों से सफर करना तो दूर घरों में बैठना तक मुश्किल हो रहा था।
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दोआबा दस दिनों तक घने कोहरे की चादर ओढ़े रहा। इस दौरान सूर्य के ओझल होने से कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। बुधवार की सुबह से खिली धूप निकली तो लोगों के चेहरे भी खिले। लोगों को लगा कि ठंड से अब जल्द निजात मिल सकेगी। यही हाल बुधवार को भी रहा। बुधवार भोर में रिटायर्ड शिक्षक रणछोर सिंह, रामजी लाल गुप्ता, शिक्षक विनोद श्रीवास्तव, राजीव सिंह, सुनील शुक्ला, किसान विजय शुक्ला, श्रवण, उत्तम आदि निकले तो देखा कि ओस जमीन व हरी घास में जमी थी।
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यह गलन का असर था। ठंड के इस मिजाज को देखते ही लोग अपने-अपने घरों में ही कैद हो गए। साथ ही परिजनों को सलाह दी कि वह घरों में रहेें और लापरवाही न करें। यही हाल गांव व देहात का रहा। गुरुवार की सुबह आठ बजे से मौसम खुल गया था। धूप निकली तो लोगों ने धूप का आनंद लिया, लेकिन तीन बजे के बाद हवा के साथ गलन बढ़ी तो लोग कांप उठे। शाम को स्थिति ऐसी हुई कि लोगों का वाहनों से सफर करना तो दूर घरों में बैठना तक मुश्किल हो रहा था।
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