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Kaushambi News: जड़ों की ओर लौटने का प्रयास...उगाया अति प्राचीन प्रजाति का गेहूं
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सरसवां ब्लॉक के शाहपुर के किसान कुंवर संदीप सिंह ने गेहूं की पुरातन फसल खपली (इम्मर) तैयार की है। इसके बीज के लिए वह कई सालों से प्रयासरत थे। पिछले साल नवंबर में एग्रीकल्चर इंस्टिट्यूट ऑफ पुणे के सहयोग से बीज मिला है। उनके प्रयास को नवाचार का प्रथम पुरस्कार मिला है।
करीब दो क्विंटल बीज के लिए संदीप ने 40 हजार रुपये खर्च किए। घर तक लाने में 35 हजार रुपये गाड़ी का किराया दिया। इस गेहूं का उत्पादन सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान भी मिलने का दावा किया जा रहा है। खपली गेहूं में फाइबर, प्रोटीन, मैग्नीशियम और आयरन की मात्रा अधिक होती है। यह शुगर को नियंत्रित करने और पाचन में सुधार करने में मदद करता है। खपली गेहूं के आटे को पोषण पावर हाउस के नाम भी जाना जाता है।
संदीप के प्रयोग को नवाचार के लिए जिले में प्रथम पुरस्कार मिला है। डीएम ने 24 मार्च को डायट मैदान में आयोजित सरस मेले में उन्हें सम्मानित किया। कृषि वैज्ञानिक डॉ. आशीष कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि इनकी फसल अति प्राचीन है। फसल को तैयार करने के लिए अपनाया गया तरीका पूरी तरह से पुरातन है।
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गायत्री मंत्र के साथ हुई बोआई
मंझनपुर। संदीप का दावा है कि यह गेहूं पूरी तरह से आयुर्वेदिक विधि से तैयार हुआ है। बोआई के पहले खेत में हवन कुंड की भस्म डाली गई। इससे खेत में नमी बनी रहती है। करीब दो किलो भस्म का प्रयोग एक बीघा खेत में किया गया।
बोआई से पहले उसे बीज भस्म ( गोमूत्र व चूने के साथ अन्य सामग्री) से शोधित किया गया। इसके बाद खेत में घन जीवामृत (सूखा गोबर व 10 फीसदी बीज भस्म) डाला गया।एक बीघा में करीब 200 लीटर जीवामृत का प्रयोग हुआ। इसके बाद गायत्री मंत्र का पाठ करते हुए बीज की बोआई की गई। एक बीघे में करीब छह से सात क्विंटल गेहूं का उत्पादन होता है। करीब छह बीघे में गेहूं को बोया गया है।
खाद के रूप में गोमूत्र व गोबर का प्रयोग
मंझनपुर। खपली के उत्पादन में संदीप ने बाजार के रासायनिक उर्वरक का प्रयोग नहीं किया। इनका कहना है कि जिस खेत में खपली की बोआई होनी थी। उसमें कई सालों से रासायनिक खाद का प्रयोग नहीं किया गया।
खपली की वृद्धि के लिए जीवामृत (गोमूत्र, बेसन व गुड़ ) का प्रयोग किया गया। करीब 200 लीटर जीवामृत का स्प्रे 15-15 दिनों में ढाई बीघा खेत में तीन बार किया गया। इसके साथ ही कीटनाशक के तौर पर नीमास्त, अग्निस्त ब्रम्हास्त्र का प्रयोग हुआ। तीनों अलग-अलग प्रकार की विधि से तैयार किया गया।
लंबी होती है फसल
वैसे तो इस फसल को केवल दो पानी की जरूरत होती है। कौशाम्बी में गर्मी अधिक होती है। इसलिए तीन बार पानी देना पड़ा। आम गेहूं की फसल की तरह ही इसमें भी तीन माह का समय लगता है। जहां सामान्य तौर पर गेहूं के पौधे 100 सेंटीमीटर के होते हैं। वहीं, इसके पौधों की लंबाई 120 सेंटीमीटर से अधिक होती है।
मूसल में होती है कुटाई
खपली गेहूं का छिलका आसानी से अलग नहीं होता। संदीप बताते हैं कि इसे थ्रेसरिंग से अलग नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार जौ की फसल परत के अंदर होती है। इसी प्रकार खपली में कई परत होती है। इसे मूसल से कूटकर अलग किया जाएगा। इसके कारण इसमें समय और लागत अधिक आती है। इसके लिए यूपी में बाजार भी कम है।
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करीब दो क्विंटल बीज के लिए संदीप ने 40 हजार रुपये खर्च किए। घर तक लाने में 35 हजार रुपये गाड़ी का किराया दिया। इस गेहूं का उत्पादन सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान भी मिलने का दावा किया जा रहा है। खपली गेहूं में फाइबर, प्रोटीन, मैग्नीशियम और आयरन की मात्रा अधिक होती है। यह शुगर को नियंत्रित करने और पाचन में सुधार करने में मदद करता है। खपली गेहूं के आटे को पोषण पावर हाउस के नाम भी जाना जाता है।
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संदीप के प्रयोग को नवाचार के लिए जिले में प्रथम पुरस्कार मिला है। डीएम ने 24 मार्च को डायट मैदान में आयोजित सरस मेले में उन्हें सम्मानित किया। कृषि वैज्ञानिक डॉ. आशीष कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि इनकी फसल अति प्राचीन है। फसल को तैयार करने के लिए अपनाया गया तरीका पूरी तरह से पुरातन है।
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गायत्री मंत्र के साथ हुई बोआई
मंझनपुर। संदीप का दावा है कि यह गेहूं पूरी तरह से आयुर्वेदिक विधि से तैयार हुआ है। बोआई के पहले खेत में हवन कुंड की भस्म डाली गई। इससे खेत में नमी बनी रहती है। करीब दो किलो भस्म का प्रयोग एक बीघा खेत में किया गया।
बोआई से पहले उसे बीज भस्म ( गोमूत्र व चूने के साथ अन्य सामग्री) से शोधित किया गया। इसके बाद खेत में घन जीवामृत (सूखा गोबर व 10 फीसदी बीज भस्म) डाला गया।एक बीघा में करीब 200 लीटर जीवामृत का प्रयोग हुआ। इसके बाद गायत्री मंत्र का पाठ करते हुए बीज की बोआई की गई। एक बीघे में करीब छह से सात क्विंटल गेहूं का उत्पादन होता है। करीब छह बीघे में गेहूं को बोया गया है।
खाद के रूप में गोमूत्र व गोबर का प्रयोग
मंझनपुर। खपली के उत्पादन में संदीप ने बाजार के रासायनिक उर्वरक का प्रयोग नहीं किया। इनका कहना है कि जिस खेत में खपली की बोआई होनी थी। उसमें कई सालों से रासायनिक खाद का प्रयोग नहीं किया गया।
खपली की वृद्धि के लिए जीवामृत (गोमूत्र, बेसन व गुड़ ) का प्रयोग किया गया। करीब 200 लीटर जीवामृत का स्प्रे 15-15 दिनों में ढाई बीघा खेत में तीन बार किया गया। इसके साथ ही कीटनाशक के तौर पर नीमास्त, अग्निस्त ब्रम्हास्त्र का प्रयोग हुआ। तीनों अलग-अलग प्रकार की विधि से तैयार किया गया।
लंबी होती है फसल
वैसे तो इस फसल को केवल दो पानी की जरूरत होती है। कौशाम्बी में गर्मी अधिक होती है। इसलिए तीन बार पानी देना पड़ा। आम गेहूं की फसल की तरह ही इसमें भी तीन माह का समय लगता है। जहां सामान्य तौर पर गेहूं के पौधे 100 सेंटीमीटर के होते हैं। वहीं, इसके पौधों की लंबाई 120 सेंटीमीटर से अधिक होती है।
मूसल में होती है कुटाई
खपली गेहूं का छिलका आसानी से अलग नहीं होता। संदीप बताते हैं कि इसे थ्रेसरिंग से अलग नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार जौ की फसल परत के अंदर होती है। इसी प्रकार खपली में कई परत होती है। इसे मूसल से कूटकर अलग किया जाएगा। इसके कारण इसमें समय और लागत अधिक आती है। इसके लिए यूपी में बाजार भी कम है।