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बेजुबान राष्ट्रीय पक्षी प्रशासन से मांग रहे मौत की भीख
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प्यास बुझाने के लिए परेशान मोर हो रहे मौत का शिकार
जंगली कुत्ते राष्ट्रीय पक्षी को बना रहे निवाला
फोटो नं. 14
अमर उजाला ब्यूरो
अजुहा। सिराथू तहसील के अजुहा इलाके में बहुतायत में पाए जाने वाले राष्ट्रीय पक्षी इन दिनों पीने के पानी के संकट से जूझ रहे हैं। प्यास से बेहाल यह जीव गश खाकर गिरते हैं। मोर की मौत का इंतजार जंगल में घूम रहे जंगली कुत्ते कर रहे हैं। बुधवार को एक मोर इसी तरह गश खाकर गिरा, जिसे कुत्तों ने काट कर जख्मी कर दिया। सबकुछ जानने के बाद भी जिले के अफसर पूरे मामले से उदासीन बने हुए हैं।
अजुहा इलाके भौंतर स्थित गुंगवा की बाग और धुमाई के बड़ी बाग में बहुत संख्या में मोर पाए जाते हैं। इन राष्ट्रीय पक्षी की सुरक्षा और संरक्षण के लिए पूर्व में तमाम कदम उठाए गए लेकिन अब राष्ट्रीय पक्षी को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है। जिसका नतीजा है कि यह पक्षी गर्मी और धूप से बेहाल होकर मरने को मजबूर हैं। बुधवार को गुंगवा की बाग में एक मोर जख्मी हालत में मिला। सुबह चरवारे मवेशियों को चराने के लिए गए थे, तभी उनकी नजर मोर को नोंच रहे जंगली कुत्तों पर पड़ी। चरवाहों ने कुत्तों को भगाने के साथ ही घटना की जानकारी वार्ड नंबर एक को सभासद को दी। सभासद ने जख्मी मोर का इलाज कराया है। बताते चले कि इस इलाके में फैले 60 बीघे जंगल में बड़ी संख्या में मोर रहते हैं। इनके संरक्षण का प्रशासन ने जिम्मा उठाया था लेकिन अब हालात पुराने ढर्रे पर हैं।
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12 साल पहले सैकड़ों मोर की हुई थी मौत
अजुहा। वर्ष 2007 में बड़ी संख्या में धुमाई के जंगल में राष्ट्रीय पक्षियों की मौत हुई थी। उस दौरान पता चला कि मोर का किसी शिकारी ने शिकार किया होगा। बताया गया कि मोर के दिल के पास रहने वाला लिक्विड एक खास दवा के काम आता है। मामला मीडिया में छाने के बाद तत्कालीन डीएफओ गणेश एस भट्ट ने मृत मोरों के शव को जांच के लिए पुणे भेजा। जांच में पता चला कि मोर की मौत प्यास से हो रही है। इसके बाद से वहां के पांच तलाबों में हर साल पानी भरवाया जाता था। लेकिन इस बार यह व्यवस्था नहीं कराई जा सकी है। वर्ष 2007 में राष्ट्रीय पक्षियों की लगातार हो रही मौत की जांच रिपोर्ट आने के बाद तत्कालीन प्रशासन के अफसरों ने बाग में सीमेंट का हौज रखवाया। इन हौज में टैंकर के जरिए पानी भरवाया जाया था। डीएफओ गणेश एस भट्ट के तबादले के बाद सारी कवायद फाइलों में सिमट कर रह गई।
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कैंप लगाकर वन कर्मी देते थे संरक्षण
अजुहा। राष्ट्रीय पक्षियों की मौत के बाद जागे प्रशासन ने धुमाई गांव में वन विभाग की अस्थाई चौकी खोली थी। यहां पर वन कर्मी रहकर मोर को संरक्षण देते थे। मकसद था कि कोई इनका शिकार नहीं कर पाए। डीएफओ गणेश एस भट्ट के तबादले के बाद धुमाई और भौंतर के जंगल में राष्ट्रीय पक्षी के संरक्षण की दिशा में कोई काम नहीं किया गया।
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आए दिन मरते हैं मोर, शव खा जाते हैं कुत्ते
अजुहा। धुमाई के जंगल में राष्ट्रीय पक्षी के बिखरे पड़े पंख इस बात की गवाही देते हैं कि यहां आए दिन कई मोर मौत का शिकार हो रहे हैं। जंगली कुत्ते मोर के मरने का इंतजार करते हैं। मोर की मौत हुई और उनका शव कुत्तों का निवाला बन जाता है। धुमाई स्थित जंगल में जहां बहुत संख्या में मोर पाए जाते हैं वह पर पांच तलाब स्थित हैं। गर्मी के दिनों में वहां पर पानी भरवाया जाता था। इस बार सारे तलाब सूखे पड़े हैं। इसकी वजह से मोरों को प्यास बुझाने के लिए जान तक देना पड़ रहा है।
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क्या कहते हैं अधिकारी
मुख्य विकास अधिकारी को पत्र लिखकर यह कहा गया कि ठंडे स्थान के समीप स्थित बाग के पास तलाबों में पानी भरवाया जाए। जिससे मोर और अन्य जीव जंतुओं को पानी के लिए नहीं भटकना पड़े। इसके अलावा वन रेंजरों से कहा गया कि जहां पर मोर की संख्या ज्यादा है वहां पर चौकी स्थापित किया जाए। जिसकी वजह से कोई उनका शिकार नहीं कर सके।
ओपी अम्बस्ट, डीएफओ
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जंगली कुत्ते राष्ट्रीय पक्षी को बना रहे निवाला
फोटो नं. 14
अमर उजाला ब्यूरो
अजुहा। सिराथू तहसील के अजुहा इलाके में बहुतायत में पाए जाने वाले राष्ट्रीय पक्षी इन दिनों पीने के पानी के संकट से जूझ रहे हैं। प्यास से बेहाल यह जीव गश खाकर गिरते हैं। मोर की मौत का इंतजार जंगल में घूम रहे जंगली कुत्ते कर रहे हैं। बुधवार को एक मोर इसी तरह गश खाकर गिरा, जिसे कुत्तों ने काट कर जख्मी कर दिया। सबकुछ जानने के बाद भी जिले के अफसर पूरे मामले से उदासीन बने हुए हैं।
अजुहा इलाके भौंतर स्थित गुंगवा की बाग और धुमाई के बड़ी बाग में बहुत संख्या में मोर पाए जाते हैं। इन राष्ट्रीय पक्षी की सुरक्षा और संरक्षण के लिए पूर्व में तमाम कदम उठाए गए लेकिन अब राष्ट्रीय पक्षी को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है। जिसका नतीजा है कि यह पक्षी गर्मी और धूप से बेहाल होकर मरने को मजबूर हैं। बुधवार को गुंगवा की बाग में एक मोर जख्मी हालत में मिला। सुबह चरवारे मवेशियों को चराने के लिए गए थे, तभी उनकी नजर मोर को नोंच रहे जंगली कुत्तों पर पड़ी। चरवाहों ने कुत्तों को भगाने के साथ ही घटना की जानकारी वार्ड नंबर एक को सभासद को दी। सभासद ने जख्मी मोर का इलाज कराया है। बताते चले कि इस इलाके में फैले 60 बीघे जंगल में बड़ी संख्या में मोर रहते हैं। इनके संरक्षण का प्रशासन ने जिम्मा उठाया था लेकिन अब हालात पुराने ढर्रे पर हैं।
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12 साल पहले सैकड़ों मोर की हुई थी मौत
अजुहा। वर्ष 2007 में बड़ी संख्या में धुमाई के जंगल में राष्ट्रीय पक्षियों की मौत हुई थी। उस दौरान पता चला कि मोर का किसी शिकारी ने शिकार किया होगा। बताया गया कि मोर के दिल के पास रहने वाला लिक्विड एक खास दवा के काम आता है। मामला मीडिया में छाने के बाद तत्कालीन डीएफओ गणेश एस भट्ट ने मृत मोरों के शव को जांच के लिए पुणे भेजा। जांच में पता चला कि मोर की मौत प्यास से हो रही है। इसके बाद से वहां के पांच तलाबों में हर साल पानी भरवाया जाता था। लेकिन इस बार यह व्यवस्था नहीं कराई जा सकी है। वर्ष 2007 में राष्ट्रीय पक्षियों की लगातार हो रही मौत की जांच रिपोर्ट आने के बाद तत्कालीन प्रशासन के अफसरों ने बाग में सीमेंट का हौज रखवाया। इन हौज में टैंकर के जरिए पानी भरवाया जाया था। डीएफओ गणेश एस भट्ट के तबादले के बाद सारी कवायद फाइलों में सिमट कर रह गई।
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कैंप लगाकर वन कर्मी देते थे संरक्षण
अजुहा। राष्ट्रीय पक्षियों की मौत के बाद जागे प्रशासन ने धुमाई गांव में वन विभाग की अस्थाई चौकी खोली थी। यहां पर वन कर्मी रहकर मोर को संरक्षण देते थे। मकसद था कि कोई इनका शिकार नहीं कर पाए। डीएफओ गणेश एस भट्ट के तबादले के बाद धुमाई और भौंतर के जंगल में राष्ट्रीय पक्षी के संरक्षण की दिशा में कोई काम नहीं किया गया।
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आए दिन मरते हैं मोर, शव खा जाते हैं कुत्ते
अजुहा। धुमाई के जंगल में राष्ट्रीय पक्षी के बिखरे पड़े पंख इस बात की गवाही देते हैं कि यहां आए दिन कई मोर मौत का शिकार हो रहे हैं। जंगली कुत्ते मोर के मरने का इंतजार करते हैं। मोर की मौत हुई और उनका शव कुत्तों का निवाला बन जाता है। धुमाई स्थित जंगल में जहां बहुत संख्या में मोर पाए जाते हैं वह पर पांच तलाब स्थित हैं। गर्मी के दिनों में वहां पर पानी भरवाया जाता था। इस बार सारे तलाब सूखे पड़े हैं। इसकी वजह से मोरों को प्यास बुझाने के लिए जान तक देना पड़ रहा है।
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क्या कहते हैं अधिकारी
मुख्य विकास अधिकारी को पत्र लिखकर यह कहा गया कि ठंडे स्थान के समीप स्थित बाग के पास तलाबों में पानी भरवाया जाए। जिससे मोर और अन्य जीव जंतुओं को पानी के लिए नहीं भटकना पड़े। इसके अलावा वन रेंजरों से कहा गया कि जहां पर मोर की संख्या ज्यादा है वहां पर चौकी स्थापित किया जाए। जिसकी वजह से कोई उनका शिकार नहीं कर सके।
ओपी अम्बस्ट, डीएफओ