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पुत्रों की दीर्घायु के लिए माताओं ने रखा व्रत
Updated Mon, 14 Aug 2017 12:40 AM IST
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पुत्रों की दीर्घायु को रखा ललही छठ व्रत
भुने दानों, खीरा व चीनी से बने मिष्ठान से किया पूजन
जलहरी के पानी से मुंह धोकर छठ माता से मांगी मुराद
अमर उजाला ब्यूरो
मंझनपुर।
भाद्रपद की छठ देवी का रविवार को माताओं ने ब्रत रखा। द्वार पर छठ देवी के रूप में कुश व छिवली-जारी के ढाक की डाली गाड़कर जलहरी में पानी भरकर माताओं ने विधिविधान से पूजन-अर्चन किया। इसके बाद भुने हुए दानों, खीरा व चीनी के बने कुढ़वे का भोग लगाया। बेटों का मुंह जलहरी के पानी से धुलकर माताओं ने उनके दीर्घायु की कामना की।
भाद्रपद की छठ का पुत्रवती महिलाओं के लिए विशेष महत्व है। पौराणिक मान्यताओं पर जाएं तो एक बार गणेश जी खो गए थे। पुत्र मोह में व्याकुल माता पार्वती गणेश जी को ढूंढते-ढूंढते थक गईं पर वह नहीं मिले। इस पर माता पार्वती ने भाद्रपद की छठ को व्रत रखकर गणेश जी के सुरक्षित मिलने की कामना की। शाम तक भगवान लंबोदर प्रकट हो गए। पुत्र मिलने के लालच में रखे गए इस व्रत को तभी से ललही छठ व्रत के रूप में मान्यता मिल गई। तब से आज तक हर साल पुत्रवती महिलाओं द्वारा बेटों की दीर्घायु, स्वस्थ व सुरक्षित रहने की कामना को लेकर यह व्रत किया जाता है। रविवार को ललही छठ के के मौके पर महिलाओं ने व्रत रखते हुए दरवाजे पर कुश, छिवली-जारी गड़वाया और जलहरी में पानी भरकर चना, धान, गेहूं सहित विभिन्न प्रकार के भुने हुए अन्न, चीनी के मिष्ठान (कुढ़वा) व खीरे आदि से पूजन किया। इस दौरान घरों में मौजूद बेटों को पूजन स्थल पर बुलाकर माओं ने उनका मुंह जलहरी के पानी से धुला और ममतामयी आंचल से पोछते हुए बेटों के दीर्घायु की कामना की। रविवार को इस पर्व की गांव-गांव में धूम रही।
पड़ोसियों के घर वितरित किया गया प्रसाद
ललही छठ का व्रत रखने वाली महिलाओं ने विधि-विधान से पूजन-अर्चन करने के बाद प्रसाद का वितरण पड़ोसियों के घरों में किया। प्रसाद का वितरण मिट्टी के छोटे-छोटे कुढ़वे में भरकर व साथ में चीनी का कुढ़वा भी प्रसाद के रूप में वितरित किया गया। महिलाओं के इस प्रसाद वितरण से पड़ोस में आपसी सौहार्द कायम करने को भी बल मिलता है।
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बासमती से महंगा बिका फसही का चावल
छठ व्रत रखने वाली महिलाओं विभिन्न प्रकार के अन्न से छठ माता का पूजन तो करती हैं वह इस दिन खेतों में जुताई करने से पैदा होने वाले अन्न को ग्रहण नहीं करती। इस मौके पर महिलाएं पहाड़ियों पर होने वाले फल जैसे सेब, नाशपाती और ताल-तलैया में धान के सरीखे होने वाली फसही के चावल का सेवन करती हैं। यह ऐसे धान का चावल होता है जो प्राकृतिक पैदा होता है, इसमें खाद व अन्य जैविक नहीं होते हैं। इसीलिए उपवास के दौरान इसका इस्तेमाल विशेष रूप से महिलाएं करती हैं। पर्व के महत्व का देखते हुए फसही के चावल की कीमत भी आसमान छू रही थी। रविवार को दुकानों में इस चावल की कीमत 80 से सौ रुपए तक पहुंच चुकी थी जबकि बासमती चावल भी इतना महंगा नहीं है।
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भुने दानों, खीरा व चीनी से बने मिष्ठान से किया पूजन
जलहरी के पानी से मुंह धोकर छठ माता से मांगी मुराद
अमर उजाला ब्यूरो
मंझनपुर।
भाद्रपद की छठ देवी का रविवार को माताओं ने ब्रत रखा। द्वार पर छठ देवी के रूप में कुश व छिवली-जारी के ढाक की डाली गाड़कर जलहरी में पानी भरकर माताओं ने विधिविधान से पूजन-अर्चन किया। इसके बाद भुने हुए दानों, खीरा व चीनी के बने कुढ़वे का भोग लगाया। बेटों का मुंह जलहरी के पानी से धुलकर माताओं ने उनके दीर्घायु की कामना की।
भाद्रपद की छठ का पुत्रवती महिलाओं के लिए विशेष महत्व है। पौराणिक मान्यताओं पर जाएं तो एक बार गणेश जी खो गए थे। पुत्र मोह में व्याकुल माता पार्वती गणेश जी को ढूंढते-ढूंढते थक गईं पर वह नहीं मिले। इस पर माता पार्वती ने भाद्रपद की छठ को व्रत रखकर गणेश जी के सुरक्षित मिलने की कामना की। शाम तक भगवान लंबोदर प्रकट हो गए। पुत्र मिलने के लालच में रखे गए इस व्रत को तभी से ललही छठ व्रत के रूप में मान्यता मिल गई। तब से आज तक हर साल पुत्रवती महिलाओं द्वारा बेटों की दीर्घायु, स्वस्थ व सुरक्षित रहने की कामना को लेकर यह व्रत किया जाता है। रविवार को ललही छठ के के मौके पर महिलाओं ने व्रत रखते हुए दरवाजे पर कुश, छिवली-जारी गड़वाया और जलहरी में पानी भरकर चना, धान, गेहूं सहित विभिन्न प्रकार के भुने हुए अन्न, चीनी के मिष्ठान (कुढ़वा) व खीरे आदि से पूजन किया। इस दौरान घरों में मौजूद बेटों को पूजन स्थल पर बुलाकर माओं ने उनका मुंह जलहरी के पानी से धुला और ममतामयी आंचल से पोछते हुए बेटों के दीर्घायु की कामना की। रविवार को इस पर्व की गांव-गांव में धूम रही।
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पड़ोसियों के घर वितरित किया गया प्रसाद
ललही छठ का व्रत रखने वाली महिलाओं ने विधि-विधान से पूजन-अर्चन करने के बाद प्रसाद का वितरण पड़ोसियों के घरों में किया। प्रसाद का वितरण मिट्टी के छोटे-छोटे कुढ़वे में भरकर व साथ में चीनी का कुढ़वा भी प्रसाद के रूप में वितरित किया गया। महिलाओं के इस प्रसाद वितरण से पड़ोस में आपसी सौहार्द कायम करने को भी बल मिलता है।
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बासमती से महंगा बिका फसही का चावल
छठ व्रत रखने वाली महिलाओं विभिन्न प्रकार के अन्न से छठ माता का पूजन तो करती हैं वह इस दिन खेतों में जुताई करने से पैदा होने वाले अन्न को ग्रहण नहीं करती। इस मौके पर महिलाएं पहाड़ियों पर होने वाले फल जैसे सेब, नाशपाती और ताल-तलैया में धान के सरीखे होने वाली फसही के चावल का सेवन करती हैं। यह ऐसे धान का चावल होता है जो प्राकृतिक पैदा होता है, इसमें खाद व अन्य जैविक नहीं होते हैं। इसीलिए उपवास के दौरान इसका इस्तेमाल विशेष रूप से महिलाएं करती हैं। पर्व के महत्व का देखते हुए फसही के चावल की कीमत भी आसमान छू रही थी। रविवार को दुकानों में इस चावल की कीमत 80 से सौ रुपए तक पहुंच चुकी थी जबकि बासमती चावल भी इतना महंगा नहीं है।