अब नहीं लगेगा चीरा और बदल जाएगा दिल का वाल्व, जानें क्या है ये तकनीक
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शुक्रवार को कार्डियोलॉजी के निदेशक डॉ. विनय कृष्ण, इंडियन एसोसिएशन आफ कार्डियक वैस्कुलर एवं थोरेसिक सर्जंस एसोसिएशन (आईएसीटीएस) के अध्यक्ष डॉ. आनंद संचेती, डॉ. एपी जैन ने बताया कि सामान्य तौर पर वाल्व ट्रांसप्लांट के लिए सीने में चीरा लगाने के साथ ही मरीज के ऑपरेशन में घंटों लगते हैं। खून की व्यवस्था रखनी पड़ती है।
ऑपरेशन के बाद संक्रमण की आशंका बनी रहती है और मरीज को ठीक होने में एक-डेढ़ महीने का समय भी लगता है, लेकिन नई तकनीक के हिसाब से ऑपरेशन करने में न तो ज्यादा वक्त लगता और न ही मरीज को तकलीफ होती है। इसे एंजियोप्लास्टी की तरह स्टेंट डालकर किया जाता है। इससे सीने में चीरा नहीं लगाना पड़ता है। यूरोप, अमेरिका में इस तरह से ही ऑपरेशन किए जाते हैं। ऑपरेशन के दौरान कार्डियक सर्जन, कार्डियोलॉजिस्ट, कार्डियक एनेस्थेसिस्ट, परफ्यूजनिस्ट (हार्ट लंग्स मशीन चलाने वाला) शामिल रहते हैं।
डॉक्टरों को करेंगे प्रशिक्षित
कार्डियोलॉजी में कार्डियो थोरेसिक सर्जनों ने बताया कि इंडियन एसोसिएशन आफ कार्डियक वैस्कुलर एवं थोरेसिक सर्जंस एसोसिएशन ने योजना बनाई है कि देश भर के कार्डियो सर्जनों को नई तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसके साथ ही कार्डियोलॉजी ब्रांच में डीएम, एमसीएच करने डॉक्टरों को भी ट्रेनिंग दी जाएगी।
यहां पर डॉक्टरों को प्रशिक्षण डॉ. रमेश ठाकुर देंगे। कार्यशालाओं का आयोजन भी होगा। कार्डियोलॉजी में शुक्रवार को शुरू हुई कार्यशाला शनिवार तक चलेगी। इस मौके पर आईएसीटीएस के सचिव डॉ. राजन (चेन्नई), बंगुलुरू के एसएसएआईएचएमए के चीफ कार्डियक सर्जन डॉ. सीएस हीरेमथ, दिल्ली के यूनिवर्सल हॉस्पिटल के कार्डियक सर्जन डॉ. शैलेश जैन, दिल्ली के डॉ. युगल मिश्रा, कोचीन के डॉ. सिवकुमार नायक, कार्डियोलॉजी के विभागाध्यक्ष डॉ.रमेश ठाकुर आदि शामिल रहे।
देश में कार्डियोथोरेसिक सर्जन - 3000 (लगभग)
इनमें से आईएसीटीएस के सदस्य हैं - 1700