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Photos-आलू, टमाटर, प्याज, नोटबंदी, राजनीति से लेकर राम और राम नाम पर उपराष्ट्रपति की 10 बड़ी बातें
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
Updated Tue, 05 Dec 2017 03:42 PM IST
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उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू
- फोटो : अमर उजाला
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देश में कृषि क्षेत्र कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। देश की बढ़ती आबादी कृषि क्षेत्र के लिए बड़ी चुनौती है। जमीन सीमित है और खाद्यान्न की मांग बढ़ रही है। देश का कृषि उत्पादन तो बढ़ा है, लेकिन कई मामलों में हम विदेश पर निर्भर हैं। कृषि वैज्ञानिकों को शोध और नवीन माध्यमों को बढ़ावा देना चाहिए। उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने सोमवार को चंद्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय (सीएसए) के 19वें दीक्षांत समारोह को संबोधित करते हुए यह बातें कहीं।
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एक सरकार तो प्याज के चक्कर में ही गिर गई
दीक्षांत समारोह में मौजूद लोग
- फोटो : अमर उजाला
उन्होंने कहा कि डॉक्टर, वैज्ञानिक, अधिकारी अपनी संतानों को डॉक्टर, वैज्ञानिक, अधिकारी बनाना चाहते हैं। किसी किसान से पूछो तो वह अपने बेटे को किसान नहीं बनाना चाहता क्योंकि खेती घाटे का सौदा साबित होती है। कृषि क्षेत्र से जुड़े युवाओं को इसे लाभदायक बनाने की दिशा में काम करना होगा। सब्जियों के दाम के अंतर को समझाते हुए उन्होंने कहा कि कुछ माह पहले एक गांव (चित्तौर) गया। वहां टमाटर का दाम पूछा तो किसान ने कहा 10 रुपये का 10 किलो। वहां से 120 किलोमीटर दूर बंगलूरू में रहने वाली बहन से टमाटर के रेट लिए तो उसने बताया कि 12 से 16 रुपये किलो।
उसी दिन जब वापस दिल्ली आकर पत्नी से टमाटर के दाम पूछे तो उन्होंने 20 से 22 रुपये किलो दाम बताए। यानी किसान को तो सिर्फ एक रुपये किलो के दाम मिले, जगह केसाथ टमाटर की कीमतें बदल गईं। यही हाल प्याज और आलू का भी है। एक सरकार तो प्याज के चक्कर में ही गिर गई। इसे रोकने के लिए गांवों में सरकारी निवेश भी बढ़ाना होगा। गांवों में कोल्ड स्टोरेज, भंडारण के गोदाम बनाने होंगे। रेफ्रिजरेटेड वैन के जरिए कृषि उत्पादन का त्वरित आवागमन सुनिश्चित होना चाहिए। किसानों को समय पर सस्ता कर्ज भी मिलना चाहिए।
उसी दिन जब वापस दिल्ली आकर पत्नी से टमाटर के दाम पूछे तो उन्होंने 20 से 22 रुपये किलो दाम बताए। यानी किसान को तो सिर्फ एक रुपये किलो के दाम मिले, जगह केसाथ टमाटर की कीमतें बदल गईं। यही हाल प्याज और आलू का भी है। एक सरकार तो प्याज के चक्कर में ही गिर गई। इसे रोकने के लिए गांवों में सरकारी निवेश भी बढ़ाना होगा। गांवों में कोल्ड स्टोरेज, भंडारण के गोदाम बनाने होंगे। रेफ्रिजरेटेड वैन के जरिए कृषि उत्पादन का त्वरित आवागमन सुनिश्चित होना चाहिए। किसानों को समय पर सस्ता कर्ज भी मिलना चाहिए।
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नोटबंदी से बैंक हुए मालामाल, किसान मांगें कर्ज
उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू
- फोटो : अमर उजाला
कर्ज की बात को आगे बढ़ाते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि आठ नवंबर 2016 को नोटबंदी के बाद से बैंक मालामाल हो गए हैं। किसान बैंकों से कर्ज ले सकते हैं। इसकी वजह यह है कि बेडरूम, बाथरूम, तकिया, टाइल्स के नीचे दबा रुपया बैंकों में पहुंच गया है। कुछ लोग कह रहे हैं कि नोटबंदी का फायदा नहीं हुआ, क्योंकि पूरा पैसा वापस आ गया है। हां पैसा वापस तो आया है, लेकिन किसके जरिए आया है यह सरकार को पता चल गया है। सरकार भी यही चाहती थी। अब रिजर्व बैंक पता लगा रहा है कि यह पैसा काला है या सफेद।
गाउन की जगह भारतीय परिधान से गर्व
दीक्षांत समारोह में मौजूद लोग
- फोटो : अमर उजाला
उपराष्ट्रपति ने कहा कि अंग्रेजों के शासन से पहले देश की सकल घरेलू दर (जीडीपी) 27 फीसदी थी। आज हम सात फीसदी के लिए परेशान हैं। देश से वापस जाते समय अंग्रेज हमारा दिमाग भी खराब कर गए। अभी हम विदेशी मानसिकता से बाहर नहीं आ पाए हैं।
दीक्षांत समारोह में विदेशी गाउन और टोपी की जगह भारतीय पोशाक देखकर गर्व की अनुभूति हो रही है। उन्होंने कहा कि जब वह उपराष्ट्रपति बने तो कई लोगों ने कहा कि अब आप अपनी ड्रेस बदल देंगे। इस पर मैंने कहा था कि चेंज ऑफ ड्रेस नहीं, सिर्फ चेंज ऑफ एड्रेस होगा। उन्होंने कहा कि मातृभाषा, मातृभूमि के सम्मान से बढ़कर कुछ नहीं है। यदि आप कमाने के लिए विदेश जाएं भी तो वहां जाएं, सीखें, कमाएं और मातृभूमि के लिए वापस आ जाएं। हालांकि अब स्थितियां बदल गई हैं, विदेशी भारत आ रहे हैं।
दीक्षांत समारोह में विदेशी गाउन और टोपी की जगह भारतीय पोशाक देखकर गर्व की अनुभूति हो रही है। उन्होंने कहा कि जब वह उपराष्ट्रपति बने तो कई लोगों ने कहा कि अब आप अपनी ड्रेस बदल देंगे। इस पर मैंने कहा था कि चेंज ऑफ ड्रेस नहीं, सिर्फ चेंज ऑफ एड्रेस होगा। उन्होंने कहा कि मातृभाषा, मातृभूमि के सम्मान से बढ़कर कुछ नहीं है। यदि आप कमाने के लिए विदेश जाएं भी तो वहां जाएं, सीखें, कमाएं और मातृभूमि के लिए वापस आ जाएं। हालांकि अब स्थितियां बदल गई हैं, विदेशी भारत आ रहे हैं।
स्त्रीलिंग-पुल्लिंग थोड़ा गड़बड़
उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू
- फोटो : अमर उजाला
उन्होंने कहा कि भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गई है। देश के लोग अभी भी बच्चों को मम्मी-डैडी सिखा रहे हैं। अम्मा या मां में क्या बुराई है। अम्मा-बप्पा अंदर से निकलता है, मम्मी-डैडी मुंह से। डैडी, बीडी, सीडी, एलडी क्या है।
स्त्रीलिंग-पुल्लिंग थोड़ा गड़बड़
उपराष्ट्रपति ने हिंदी के अपने सीमित ज्ञान पर भी हल्के-फुल्के अंदाज में छात्रों से संवाद किया। उन्होंने कहा कि दक्षिण भारतीय व्यक्ति हिंदी बोल रहा है, इसलिए स्त्रीलिंग-पुल्लिंग की गड़बड़ी हो सकती है। दरअसल जब मैं पढ़ रहा था, तब हिंदी विरोध आंदोलन चल रहा था। काफी दिनों के विरोध के बाद हमने हिंदी कहां है यह जानने की कोशिश की। काफी दिनों बाद पता चला कि हिंदी सिर्फ दो जगह थी एक डाकघर और दूसरा रेलवे स्टेशन। हमने डाकघर में जाकर ताला डाल दिया।
1993 में मैं जब भाजपा का महामंत्री बनकर दिल्ली आया तो पता चला कि बिना हिंदी के तो आगे बढ़ा ही नहीं जा सकता। फिर मैंने हिंदी सीखी। हम सभी को अंग्रेजी समेत अन्य भाषाएं सीखनी चाहिए, लेकिन अपनी संस्कृति की कीमत पर नहीं। चीन, रशिया, जापान आदि से आने वाले प्रतिनिधि अंग्रेजी जानने के बावजूद अपनी मातृभाषा बोलते हैं। अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ना ही सफलता की गारंटी नहीं हैं। मैं किसान का बेटा हूं, कभी अंग्रेजी स्कूल में नहीं पढ़ा फिर भी उपराष्ट्रपति हूं। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाय बेचते थे, उन्होंने भी कभी कान्वेंट में पढ़ाई नहीं की।
स्त्रीलिंग-पुल्लिंग थोड़ा गड़बड़
उपराष्ट्रपति ने हिंदी के अपने सीमित ज्ञान पर भी हल्के-फुल्के अंदाज में छात्रों से संवाद किया। उन्होंने कहा कि दक्षिण भारतीय व्यक्ति हिंदी बोल रहा है, इसलिए स्त्रीलिंग-पुल्लिंग की गड़बड़ी हो सकती है। दरअसल जब मैं पढ़ रहा था, तब हिंदी विरोध आंदोलन चल रहा था। काफी दिनों के विरोध के बाद हमने हिंदी कहां है यह जानने की कोशिश की। काफी दिनों बाद पता चला कि हिंदी सिर्फ दो जगह थी एक डाकघर और दूसरा रेलवे स्टेशन। हमने डाकघर में जाकर ताला डाल दिया।
1993 में मैं जब भाजपा का महामंत्री बनकर दिल्ली आया तो पता चला कि बिना हिंदी के तो आगे बढ़ा ही नहीं जा सकता। फिर मैंने हिंदी सीखी। हम सभी को अंग्रेजी समेत अन्य भाषाएं सीखनी चाहिए, लेकिन अपनी संस्कृति की कीमत पर नहीं। चीन, रशिया, जापान आदि से आने वाले प्रतिनिधि अंग्रेजी जानने के बावजूद अपनी मातृभाषा बोलते हैं। अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ना ही सफलता की गारंटी नहीं हैं। मैं किसान का बेटा हूं, कभी अंग्रेजी स्कूल में नहीं पढ़ा फिर भी उपराष्ट्रपति हूं। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाय बेचते थे, उन्होंने भी कभी कान्वेंट में पढ़ाई नहीं की।
अभिव्यक्ति की आजादी की भी है सीमा
दीप प्रज्जवलित करते सांसद मुरली मनोहर जोशी
- फोटो : अमर उजाला
उपराष्ट्रपति ने कहा कि विश्वविद्यालयों में हंगामों की खबरों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने पर भी उपराष्ट्रपति ने तंज कसा। उन्होंने कहा कि देश में 760 विश्वविद्यालय हैं। सिर्फ छह में हंगामे की बात मीडिया उछालने लगता है। हंगामा करने वाले नारा लगाते हैं कि अजफल गुरू, तुम्हारा काम अधूरा, हम करेंगे पूरा। अफजल क्या करना चाहता था। वह संसद को उड़ाना चाहता था।
किस्मत से हम सभी (राज्यपाल राम नाईक और कानपुर से सांसद डा. मुरली मनोहर जोशी की ओर इशारा करते हुए) बच गए। तो क्या अधूरा काम हमको उड़ाकर पूरा करेंगे। लोकतंत्र में सबको बोलने का अधिकार है, लेकिन इसकी भी सीमाएं तय हैं। देश को बांटने वाली मानसिकता को बदलना ही होगा। कुछ लोग वंदे मातरम का विरोध करते हैं। इसका मतलब होता है मां को नमस्ते। अब इसमें क्या आपत्ति है। भारत माता की जय बोलने पर लोगों को एतराज है। धर्म व्यक्तिगत मामला है, देश की संस्कृति सबकी है।
किस्मत से हम सभी (राज्यपाल राम नाईक और कानपुर से सांसद डा. मुरली मनोहर जोशी की ओर इशारा करते हुए) बच गए। तो क्या अधूरा काम हमको उड़ाकर पूरा करेंगे। लोकतंत्र में सबको बोलने का अधिकार है, लेकिन इसकी भी सीमाएं तय हैं। देश को बांटने वाली मानसिकता को बदलना ही होगा। कुछ लोग वंदे मातरम का विरोध करते हैं। इसका मतलब होता है मां को नमस्ते। अब इसमें क्या आपत्ति है। भारत माता की जय बोलने पर लोगों को एतराज है। धर्म व्यक्तिगत मामला है, देश की संस्कृति सबकी है।
लोग राम के नाम पर सवाल उठाते हैं
नरेंद्र सिंह राठौड़ को सम्मानित करते राज्यपाल राम नाईक
- फोटो : अमर उजाला
उपराष्ट्रपति ने कहा कि पहले तो लोग भगवान राम के अस्तित्व पर सवाल उठाते घूमते थे, अब मंदिर-मंदिर घूम रहे हैं। कई आज भी उनके अस्तित्व पर सवाल उठाते हैं। इस बहस में पड़ने की बजाय सिर्फ यही कहना चाहूंगा कि राम भाऊ (राम नाईक), कानपुर से चुने गए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और तो और राम गोपाल यादव का नाम भी उनके पिता ने राम ही रखा।
कृषि क्षेत्र में बेटियों के आने से खुशी
उपराष्ट्रपति ने कहा कि दीक्षांत समारोह में कई छात्राओं ने कृषि क्षेत्र में काम करने के लिए डिग्री ली है। यह सुखद है, लेकिन कई लोग कह देते हैं कि महिलाएं भला इस क्षेत्र में क्या करेंगी। ऐसे लोगों को बताना चाहूंगा कि देश का नाम भारत माता है, पिता नहीं। देश की सारी नदियों के नाम भी महिलाओं के ही नाम पर हैं। कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी और बढ़नी चाहिए।
कृषि-संस्कृति का पाठ्यक्रम बने
उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू
- फोटो : अमर उजाला
उपराष्ट्रपति ने कहा कि कृषि और देश की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए वह इन दोनों विषयों को पाठ्यक्रम में शामिल कराने के लिए प्रयास करेंगे। इससे संबंधित प्रस्ताव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देंगे।
स्वच्छता से भी सबको जुड़ना चाहिए
उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू
- फोटो : अमर उजाला
उपराष्ट्रपति ने बताया कि नीम कोटिंग करा देने के बाद यूरिया केमिकल फैक्ट्रियों के किसी काम की नहीं रही और इसकी कालाबाजारी रुक गई। ऐसे ही नये-नये विचारों को अपनाकर युवा देश की स्थिति बदल सकते हैं। इसी तरह स्वच्छता से भी सबको जुड़ना चाहिए। स्वच्छता से वातावरण बेहतर होगा और लोग स्वस्थ रहेंगे। उन्होंने कहा अपने टीचर की हमेशा इज्जत करें। गुरू की जगह गूगल कभी नहीं ले सकता। उन्होंने संबोधन की शुरुआत शहीद चंद्रशेखर आजाद समेत अन्य शहीदों को यादकर और समापन गौतम बुद्ध के जीवन दर्शन आप्पो दिप्पो भव (अपना प्रकाश खुद बनो) से की।
52 मिनट तक बोले उपराष्ट्रपति
उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू
- फोटो : अमर उजाला
युवाओं के बीच पहुंचे उपराष्ट्रपति ने समय के बंधन को संवाद के आड़े नहीं आने दिया। वह लगातार 52 मिनट तक बोले। वाटर टू एवरी लैंड, वर्क टू एवरी हैंड, मेरा गांव, मेरा गौरव, बहुमुखी-चहुंमुखी विकास, चेंज ऑफ ड्रेस नहीं, चेंज ऑफ एड्रेस, एकता में अनेकता, यही देश की विशेषता जैसे तुकबंदी बनाकर धाराप्रवाह बोले गए उनके वाक्यों पर जमकर तालियां बजीं। उन्होंने छात्रों को आउट ऑफ बॉक्स (नवीन विचारों) आइडिया अपनाने के संबंध में यूरिया की कालाबाजारी रोकने के लिए उस पर नीम कोटिंग कराने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आइडिया का जिक्र किया।