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यूपी: पंचायतों में महिलाओं को कमान तो मिली, पर कामकाज संभाल रहे घरवाले, लेकिन इन प्रधानों ने पेश की मिसाल

Tue, 06 Apr 2021 07:59 AM IST
Vikas Kumar मनीष मिश्र, अमर उजाला, कानपुर देहात/गोंडा/बहराइच/सिद्धार्थनगर
मनीष मिश्र, अमर उजाला, कानपुर देहात/गोंडा/बहराइच/सिद्धार्थनगर Published by: Vikas Kumar Updated Tue, 06 Apr 2021 07:59 AM IST
सार

  • महिलाओं को न तो काम की आजादी, न ही मर्जी से वोट देकर प्रतिनिधि चुनने की
  • ग्राम-क्षेत्र व जिला पंचायत की सीट आरक्षित होने पर महिलाओं को आगे करना मजबूरी

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up panchayat election women got command in panchayats but their family members handle the work
पंचायत चुनाव। - फोटो : amar ujala

विस्तार

पंचायतों में महिलाओं को अधिकार और आरक्षण तो मिला पर काम करने की आजादी नहीं। गांव की सरकार में अधिकतर महिला जन प्रतिनिधियों की बागडोर उनके परिवार के पुरुषों के हाथ में रहती है। न तो उन्हें फैसले लेने की आजादी होती है, न ही दफ्तरों तक पहुंच।

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महिलाओं को एक तिहाई आरक्षण भले ही दिया गया है, लेकिन जमीनी हकीकत कोसों दूर है। वे न त मर्जी से वोट डाल पाती हैं और न ही पंचायत के कामकाज में फैसले लेती हैं। 2015 के चुनावों में कुल 3,00,419 महिला प्रतिनिधियों को चुना गया, लेकिन व्यवस्था में इनकी सक्रिय भागीदारी न के बराबर रही। 
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पंचायत चुनावों में 25 जिलों में महिलाओं की जगह उनके प्रतिनिधियों के काम करने की व्यवस्था के खिलाफ जनजागरुकता अभियान चलाने वाली संस्था, सहभागी शिक्षण संस्थान के अध्यन के अनुसार मात्र 2-3 फीसदी महिला प्रतिनिधि ही सक्रिय भूमिका निभाती हैं। 
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आरक्षण के बाद लड़ सकीं चुनाव
कानपुर देहात की करसा पंचायत की 2015 में प्रधान बनीं शमशीदा बानो इसलिए चुनाव लड़ सकीं, क्योंकि सीट आरक्षित थी। पूरे पांच साल उनके बेटे शाकिर ने उनके साथ काम किया। शमशीदा को पता नहीं था कि उनकी पंचायत में पंच कितने हैं। कानपुर देहात की सखरेज ग्राम पंचायत की निर्वतमान महिला प्रधान रेखा चंदेल बताती हैं, ब्लॉक में 90 फीसदी महिलाएं ऐसी आती थीं, जिनकी पंचायतों के फैसले उनके पति, बेटे या परिवार के दूसरे सदस्य लेते थे।

23 साल पुराना शासनादेश, लेकिन हालात नहीं बदले
यूपी सरकार ने 10 मार्च 1993 को जिलाधिकारियों और मंडलायुक्तों को पत्र लिखकर कहा था कि दफ्तरों में महिला प्रधानों के साथ उनके पति या परिवारीजनों का आना रोका जाए। जिन महिला प्रधानों और सदस्यों से बात की गई उन सभी से पता चला कि महिला सीट आरक्षित होने के बाद ही घऱ के पुरुषों ने उन्हें चुनाव लड़ाया, लेकिन काम अपने हाथ में ही रखा। 

.....लेकिन इन ग्राम प्रधानों ने पेश की मिशाल
 

श्वेता ने लतीफपुर को बनाया पहली डिजिटल पंचायत
लखनऊ जिले के माल ब्लॉक के लतीफपुर गांव को आदर्श ग्राम पंचायत के साथ ही देश को पहली डिजिटल पंचायत बनाने वाली श्वेता सिंह ने शादी के बाद पहली बार गांव देखा था। एमसीए डिग्री धारक श्वेता ने प्रधान बनने के बाद 200-300 महिलाओं को समूहों से जोड़ा। गांव की डिजिटल मैपिंग कराई। हमारे काम की वजह से लतीफपुर को मुख्यमंत्री पंचायत प्रोत्साहन पुरस्कार समेत कई अवार्ड मिल चुके हैं। 

ज्योति ने विकास कार्यों से बढ़ाई पंचायत की आय
बुंदेलखंड की सूखी घरती पर विकास के फूल उगाने वाली ललितपुर जिले की पवा ग्राम पंचायत की निवर्तमान प्रधान ज्योति मिश्रा ने काफी अच्छा काम किया। उन्होंने ग्राम सभा में बाजार की स्थापना कराई। बस स्टैंड बनवाने से पंचायत की आमदनी बढ़ी है। उनके प्रयासों से पंचायत को प्रति माह करीब 60 हजार रुपये आमदनी हो रही है। उनकी पंचायत को दीनदयाल उपाध्याय पुरस्कार, रानी लक्ष्मीबाई पुरस्कार मिले हैं। 



प्रकाशिनी ने किशोरी साइकिल बैंक बनाया
बाराबांकी को चंदवारा ग्राम पंचायत की प्रकाशिनी जायसवाल ने अपने गांव में वाईफाई लगाने के साथ ही लड़कियों के लिए किशोरी साइकिल बैंक बनाया। चंदवारा को तीन बार दीनदयाल उपाध्याय पंचायत सशक्तीकरण पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। 

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