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केन-बेतवा लिंक पर लगा ब्रेक, जन विरोध के डर से नहीं शुरू हो पा रहा काम
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
Updated Mon, 10 Jul 2017 08:09 PM IST
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केन-बेतवा लिंक परियोजना पर कानूनी अड़चनें दूर हो जाने और औपचारिकताएं पूरी हो जाने के बाद भी इस पर काम शुरू नहीं हो पा रहा। यूपी और एमपी में इस परियोजना का लगातार विरोध हो रहा है। परियोजना में काफी दिलचस्पी ले रहीं केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती 31 सितंबर 2015 को पन्ना टाइगर्स में परियोजना के बांध का शिलान्यास कर चुकी हैं। लेकिन काम आगे नहीं शुरू हुआ।
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तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में नदियों को जोड़ने की परियोजना तैयार हुई थी। इसमें केन-बेतवा लिंक भी शामिल है। केंद्र सरकार की इस परियोजना में देश की 30 नदियों को आपस में जोड़ा जाना प्रस्तावित है। शुरूआत केन-बेतवा लिंक से की गई है। इसकी लागत 7615 करोड़ रुपये है। राष्ट्रीय जल विकास अभिकरण ने परियोजना में शामिल गांवों में जन सुनवाई की औपचारिकता कर ली। हालांकि ग्रामीणों का जबर्दस्त विरोध झेलना पड़ा। नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने और उमा भारती के जल संसाधन मंत्री बनने के बाद इस परियोजना की औपचारिकता पूरी करने में तेजी आ गई। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी कर दिया। वन विभाग और वन्य जीव संरक्षण विभागों ने भी अपनी मुहर लगा दी। यूपी और एमपी की सरकारें पहले ही इस समझौते पर केंद्र सरकार के साथ हस्ताक्षर कर चुकी हैं।
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कुछ संगठनों द्वारा इस परियोजना के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी। इस पर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में उच्च स्तरीय वन सलाहकार समिति ने परियोजना में शामिल की जा रही 6017 हेक्टेयर वन भूमि की इस शर्त पर एनओसी दी है कि इस क्षेत्र में मौजूद वन्य जीवों और पर्यावरण को नुकसान न पहुंचे। केंद्रीय मंत्री उमा भारती जल संसाधन मंत्रालय के उच्चाधिकारियों के साथ 31 सितंबर 2015 को पन्ना टाइगर्स रिजर्व परिसर में प्रस्तावित बांध के लिए लाल पत्थर लगाकर शिलान्यास की रस्म अदा कर चुकी हैं। लेकिन उसके बाद भी बांध का काम शुरू नहीं हुआ है। माना जा रहा है कि प्रभावित हो रहे एमपी के लगभग 10 गांवों के ग्रामीणों के विरोध के चलते फिलहाल काम नहीं शुरू हो पा रहा। दो दिन पूर्व मध्य प्रदेश के पन्ना राजघराने की राजमाता दिलहर कुमारी ने भी इसके विरुद्ध बगावत का बिगुल बजाते हुए पन्ना में जोरदार प्रदर्शन का नेतृत्व किया।
क्या है केन-बेतवा लिंक परियोजना
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केन नदी पर बने गंगऊ बैराज के अप स्ट्रीम से 2.5 किलोमीटर दूर स्थित डोढन गांव के पास 173.2 मीटर ऊंचा ग्रेटर गंगऊ बांध बनाया जाएगा। इस बांध से बरुवा सागर (झांसी) तक 212 किलोमीटर लंबी पक्की नहर बनाकर केन नदी का 10.2 लाख क्यूसिक पानी बेतवा नदी में डाला जाएगा। बेतवा में 72 मेगावाट क्षमता की दो बिजली परियोजना लगाई जाएगी। संपर्क नहर के रास्ते में पड़ने वाली 6.45 लाख हेक्टेयर जमीन को सींचने के लिए 31,960 लाख घनमीटर पानी इस्तेमाल होगा। सिंचित होने वाली जमीन में 1.55 लाख हेक्टेयर उत्तर प्रदेश में और 4.90 हेक्टेयर जमीन मध्य प्रदेश में है। उत्तर प्रदेश की पड़ने वाली भूमि में हमीरपुर और महोबा जिले की 7 हजार हेक्टेयर और बांदा जिले की 1.48 लाख हेक्टेयर जमीन शामिल है।
केन-बेतवा गठजोड़ का खाका
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डोढन गांव के पास बांध के नीचे 30005 मिलीयन घनमीटर (क्यूसिक) पानी की जरूरत है। जबकि बांध स्थल पर 4443 क्यूसिक पानी शेष बच जाता है। इससे 1600 क्यूसिक पानी बरियारपुर वीयर से केन नहर को मिलेगा। इससे यूपी के हिस्से वाले बांदा, महोबा और हमीरपुर आदि में 2.52 लाख हेक्टेयर की सिंचाई होगी। इसी तरह मध्य प्रदेश को 1405 क्यूसिक पानी मिलेगा। डोढन बांध का जल स्तर 288 मीटर और संचयन क्षमता 2853 क्यूसिक निर्धारित की गई है। बांध की अधिकतम ऊंचाई 77 मीटर है। बांध से पानी निकाल कर नदी में गिराने के लिए 16 मीटर ऊंचे और 18.50 मीटर चौड़े साइज के 27 फाटक लगाए जाएंगे।
क्यों हो रहा है विरोध ?
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परियोजना का विरोध कर रहे स्वयंसेवी संगठन और उजाड़े जा रहे 10 गांवों के ग्रामीणों का कहना है कि परियोजना की विस्तृत रिपोर्ट (डीपीआर) उन्हें नहीं दी गई। न ही विस्थापित होने वाले परिवारों के लिए कोई बेहतर विकल्प दिया जा रहा है। जो जमीन किसानों से ली जा रही है वह बेहद उपजाऊ है। केंद्र सरकार मुआवजे के तौर पर सिंचित भूमि पर 6 लाख और असिंचित भूमि पर तीन लाख रुपये का मामूली मुआवजा दे रही है। यह बेहद कम है। मुआवजा 50 हजार हेक्टेयर से कम नहीं होना चाहिए। उधर, पन्ना रिजर्व टाइगर्स में दुर्लभ प्रजाति के जीव-जंतु हैं। यह सब उजड़ जाएंगे। ग्रामीणों का कहना है कि 1980 में पन्ना नेशनल पार्क के लिए उनकी जमीनें लेकर विस्थापित कर दिया गया। फिर उनकी कोई सुध नहीं ली गई। आज भी वह स्थाई आशियाने के लिए भटक रहे हैं। अब केन-बेतवा परियोजना में फिर वही किया जा रहा है।
जैव विविधता और प्राकृतिक संपदा को बर्बाद करने वाली परियोजना
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केन-बेतवा परियोजना को हजारों किसानों और आदिवासियों तथा यूपी-एमपी में बसे बुंदेलखंड को तबाह और बर्बाद करने वाली परियोजना बताते हुए कई स्वयंसेवी संगठन इसका लगातार विरोध कर रहे हैं। परियोजना क्षेत्र का कई बार जायजा ले चुके प्रवास सोसाइटी के आशीष सागर का कहना है कि केन नदी की जैव विविधता और पन्ना टाइगर रिजर्व की प्राकृतिक संपदा को बर्बाद करने वाली इस योजना में 18 हजार करोड़ रुपये विश्व बैंक से लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि बुंदेलखंड में दर्जनों बड़े बांध हैं। यही जर्जर हालत में हैं। रख-रखाव न होने से अक्सर टूटते हैं और बाढ़ की तबाही लाते हैं। इसके अलावा बुंदेलखंड भविष्य परिषद के पुष्पेंद्र भाई, वरिष्ठ प्रगतिशील किसान प्रेम सिंह (बड़ोखर खुर्द), पूर्व विधायक चंद्रप्रकाश शर्मा और केन रीवर ग्रुप संगठन आदि ने भी इसका विरोध किया है।