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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Kannauj News ›   The bravehearts of Itranagari were overpowered by the enemies in Kargil, read the full story of these heroes

Victory Story of Kargil: कारगिल में दुश्मनों पर भारी पड़े थे इत्रनगरी के जांबाज, पढ़ें इन हीरोज की पूरी कहानी

Wed, 26 Jul 2023 05:37 PM IST
हिमांशु अवस्थी तारिक इकबाल, अमर उजाला, कन्नौज
तारिक इकबाल, अमर उजाला, कन्नौज Published by: हिमांशु अवस्थी Updated Wed, 26 Jul 2023 05:37 PM IST
सार

Kannauj News: तीन मई से 26 जुलाई के बीच चले इस बड़े ऑपरेशन का हिस्सा बनने पर खुशी जताते हुए कैप्टन रवींद्र कुमार 23 जुलाई की रात को याद कर सिहर उठते हैं। कहते हैं कि अपने साथियों के साथ किसी तरह ऊंचाई को पारकर पांच पाकिस्तानी फौजियों को ढेर कर दिया।

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The bravehearts of Itranagari were overpowered by the enemies in Kargil, read the full story of these heroes
kargil diwas special - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कन्नौज जिले में देश-दुनिया को अपनी खुशबू से दीवाना बनाने वाले कन्नौज के जांबाजों ने अपनी बहादुरी से भी सभी को कायल किया है। जब-जब देश को जरूरत पड़ी यहां के बहादुर सपूतों ने आगे बढ़कर मोर्चा लिया है। 24 साल पहले 1999 में तीन मई से 26 जुलाई तक चले कारगिल युद्ध में कैप्टन रविंद्र कुमार भी लड़े थे। उनके भी सिर व बाएं पैर में गोली लगी थी। हिम्मत न हारते हुए दुश्मनों का सामना किया।

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उनकी बटालियन के चार साथी इस जंग में शहीद हो गए थे। चार दिन तक वह साथियों के शव के निकट ही रहे। अब भी वह युवाओं को देश सेवा का सबक पढ़ाते हैं। कन्नौज के तहसील छिबरामऊ क्षेत्र के बिराहिमपुर में 14 दिसम्बर 1962 को जन्मे रविंद्र कुमार कारगिल युद्ध में हवलदार थे। रिटायर होने से पहले कैप्टन हो गए थे। वह बताते हैं कि 26 जुलाई को सीज फायर हो गया था।
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इसके बाद में 26 जनवरी को तत्कालीन राष्ट्रपति ने उनको वीरता सेना पदक भेजा था। उस समय वह पैर का ऑपरेशन होने की वजह से अस्पताल में थे। उन्होंने बताया कि इस दौरान डॉक्टरों ने पंजा काट दिया था। वर्ष 2013 में कैप्टन से रिटायर हो गए थे। कारगिल की जंग में पांच पाकिस्तानी सैनिकों को उनकी जिंदगी से हमेशा-हमेशा के लिए छुटकारा दिला दिया था। उन दिनों उनकी तैनाती कारगिल से 200 किलोमीटर दूर सियाचीन गलेशियर में थी।

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वह भी बहुत खतरनाक इलाका है।  इस दौरान कारगिल में पाकिस्तानी फौज ने घुसपैठ कर दिया, तो उनकी टीम को भी कारगिल भेज दिया गया। तीन मई से 26 जुलाई के बीच चले इस बड़े ऑपरेशन का हिस्सा बनने पर खुशी जताते हुए कैप्टन रवींद्र कुमार 23 जुलाई की रात को याद कर सिहर उठते हैं। कहते हैं कि अपने साथियों के साथ किसी तरह ऊंचाई को पारकर पांच पाकिस्तानी फौजियों को ढेर कर दिया।

यह हैं कैप्टन के पास उपलब्धियां

  • कारगिल युद्ध में पांच पाकिस्तानी सैनिकों को मारने के उपलक्ष्य में तत्कालीन राष्ट्रपति के हाथों 26 जनवरी 2000 की पूर्व संध्या पर गैलेंट्री अवार्ड सेना मेडल।
  • श्रीलंका में 1987 से 1989 तक ऑपरेशन पवन का हिस्सा रहे।
  • नागालैंड में 1993 से 1995 तक ऑपरेशन ऑर्चिड का हिस्सा रहे।
  • सियाचीन में ऑपरेशन मेघदूत के तहत 1997 से 1998 तक सेवा दी।
  • उधमपुर में ऑपरेशन पराक्रम के तहत 2001 में अपनी सेवा दी।
  • ऑपरेशन रक्षक के तहत 2003 से 2004 के दौरान जम्मू-कश्मीर में रहे।
  • 2006 में यूनाइटेड नेशन के विशेष मिशन के तहत दक्षिण अफ्रिका के कांगो में तैनाती रही।

सिपाही से कैप्टन तक का सफर
कैप्टन रविंद्र कुमार को बचपन से ही मां भारती की सेवा की ललक थी। 18 साल की उम्र पूरी करने से पहले ही 1964 में बनारस में हुई सेना भर्ती में किस्मत आजमाई और चयनित भी हुए। भर्ती तो सिपाही के पद पर हुई, लेकिन अपनी बहादुरी और पराक्रम से वह तरक्की की सीढ़ियां चढ़ते गए और 30 साल की सेवा के दौरान कई उपलब्धि हासिल करने के बाद जब वह 31 मार्च 2012 में रिटायर हुए तो उनकी पहचान कैप्टन रवींद्र कुमार की थी।

गुगरापुर के रामनरेश यादव ने दुश्मनों से लिया लोहा
कारगिल की जंग में रामनरेश यादव ने भी खूब बहादुरी दिखाई थी। गुगरापुर ब्लॉक के हनुमंत खेड़ा निवासी रामनरेश यादव राष्ट्रीय रायफल मानस वर्ग में तैनात थे। सेना की नौकरी करने के बाद करीब डेढ़ साल पहले यहां उनका निधन हो गया। उनके इकलौते पुत्र प्रवीण यादव अपने पिता की बहादुरी को याद करते हुए भावुक हो जाते हैं। शहर के सरायमीरा में रह रहे प्रवीण बताते हैं कि कारगिल की जंग का जब भी जिक्र होता है, तो उनके पिता की बहादुरी के किस्से भी साझा किए जाते हैं।

अपने पिता से सुनी हुई जंग की कहानी को याद करते हुए प्रवीण बताते हैं कि कारगिल की जंग के दौरान वह दुश्मनों की करतूत का पता लगाते थे। रात में टोली के साथ सफर करते थे, दिन में पहाड़ी की आड़ में छिप जाते थे। 13 जुलाई 1999 की सुबह दुश्मनों ने उनकी टोली पर हमला कर दिया, जिसमें उनके तीन साथी शहीद हो गए। दो जख्मी हुए थे, इसमें उनके पिता भी थे। उनके शरीर में पांच गोलियां लगी थीं।

ठीक 50 मीटर के सामने से हुए हमले में वह जख्मी होकर बेहोश हो गए थे। उसके पहले उनकी टोली ने दो को मार गिराया था। कारगिल की जंग के बाद जम्मू कश्मीर में वर्ष 2003 से 2004 के बीच ऑपरेशन तक्षक का हिस्सा रहे। वर्ष 2006 में यूनाइटेड नेशन के विशेष विमान से दक्षिण अफ्रीका के कांगो में तैनाती पर भेजे गए थे। प्रवीण बताते हैं कि सेवा से रिटायर होने के बाद भी वह भी अक्सर जंग से जुड़ी बातें साझा किया करते थे। अब उनकी बहादुरी के किस्सों को याद कर मन देशप्रेम से भर जाता है।

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